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कानों देखी: मुश्किल में सरकार

Tue, 23 Oct 2018 11:37 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Tue, 23 Oct 2018 11:37 PM IST
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political analysis: The government is in trouble

सरकार मुश्किल में हैं। यह नया कोड वर्ड है। मंत्रालय, सचिवालय में खूब चल रहा है। सीबीआई ही नहीं ईडी में भी रार चल रही है जो कभी भी नया रूप ले सकती है। बताते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीब होने का दावा करने वाले अफसरों के खिलाफ अब संस्थानों में आवाज तेज होने लगी है। सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना एक तरह से सीबीआई चला रहे थे। अब सीबीआई उनको चला रही है। 

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अस्थाना के सारे अधिकार लेकर निदेशक आलोक वर्मा ने एडिशनल डायरेक्टर एके शर्मा को दे दिया। इतना ही नहीं राकेश अस्थाना के सताए अजय बस्सी के पास ही उनके खिलाफ सीबीआई में जांच का जिम्मा है। यह भी राकेश अस्थाना के लिए परेशानी का सबब है। परेशानी इसलिए भी कि अस्थाना को काफी उम्मीद थी, लेकिन पीएमओ ने फिलहाल स्थिति की गंभीरता को देखकर खामोशी ही उचित माना है। 
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कलेजे को ठंडक
राकेश अस्थाना के खिलाफ सीबीआई में मामला दर्ज होने के बाद कई नेताओं के कलेजे को ठंडक पहुंची है। राकेश अस्थानान ने चारा घोटाला मामले की जांच में लालू प्रसाद यादव को एसी में पसीना ला दिया था। इसी तरह से बसपा प्रमुख मायावती भी सीबीआई की अनावश्यक दबंगई से तंग थीं। बताते हैं इस तरह के तमाम नेताओं के कलेजे को काफी ठंडक पहुंची है। लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती और उनके परिवार की सेवा में तैनात सूत्र के मुताबिक राकेश अस्थाना की मुश्किल बढ़ती देखकर मीसा भारती का परिवार काफी खुश था। 
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बसपा सुप्रीमो के लखनऊ स्थित आवास पर तैनात एक सदस्य का कहना है कि जो जैसा करता है, एक न एक दिन उसे वैसा ही भरना पड़ता है। यही कुदरत का न्याय है। सूत्र का कहना है कि चाहे तो आप राकेश अस्थाना से पूछ लें। इस समय उन्हें पता होगा किसी को फंसाने और गिरफ्तारी की तलवार लटकाने के बाद उसे कितना दर्द होता है।

दिग्विजय सिंह की सांसत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह नई सांसत में चल रहे हैं। नई पत्नी अमृता सिंह चुनाव लड़ना चाहती हैं। वह दिग्विजय सिंह की सीट से चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं। यह दिग्विजय सिंह के पुत्र और पुत्री दोनों को पसंद नहीं है। वैसे भी दिग्विजय सिंह पुत्री और पत्नी में कोई बोलचाल नहीं है। राजा साहब के लिए परिवार का यह तनाव झेलना काफी मुश्किल होता जा रहा है। अमृता चाहती हैं कि दिग्विजय सिंह उनके लिए कोशिश करें। दिग्विजय सिंह अभी परिवार की कलह को किसी भी तरीके से बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए वह इस मामले में टालमटोल की रणनीति को लेकर चल रहे हैं। जबकि पुत्र और मध्यप्रदेश में विधानसभा के निवर्तमान विधायक जयवर्धन सिंह अपने भविष्य को लेकर काफी संवेदनशील हो चले हैं।

जाता राजस्थान, ठहरता छत्तीसगढ़, हिलता मध्यप्रदेश
भाजपा के नेता करीब-करीब मान चुके हैं कि राजस्थान में सत्ता की राह मुश्किल हो रही है। इसके दो बड़े कारण हैं। पहला तो यह कि न वसुंधरा राजे भाव दे रही हैं और न ही वसुंधरा के विरोधी बहुत सीधे हो रहे हैं। नये भाजपा अध्यक्ष मदल लाल सैनी वसुंधरा के आगे झुके ही रहते हैं। ऐसे में एक वाच्या की राह पर राजस्थान में पार्टी चलती नहीं दिखाई दे रही है। यह हालत तब है जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सारी जुगत लगा दी है और प्रधानमंत्री ने भी खुली छूट दे रखी है। लेकिन इन सबके बावजूद भाजपा राजस्थान में पूरी बाजी पलट देने का प्लान तैयार कर रही है। 100 विधायकों तक के टिकट कट जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि राजस्थान में जबरदस्त सरकार विरोधी लहर है, लेकिन वहां सत्ता में लौटने की स्थिति बनने पर कांग्रेस के हौसले पश्त होने लगेंगे। हालांकि यह बहुत मुश्किल टास्क है।

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की होशियारी और राजनीतिक बाजीगरी से रास्ता सरल सा है। पार्टी के नेताओं को जहां राह आसान लग रही है, वहीं अंदरुनी सर्वे भी पक्ष में है। सबको लग रहा है कि चौथी बार वहां सरकार बनेगी। लेकिन मध्यप्रदेश में शिवराज का आसन डोलने लगा है। कमलनाथ के चेहरा बनने के बाद से भाजपा काफी हीट महसूस कर रही है। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि चुनाव करीब आने के बाद कांग्रेस के मध्यप्रदेश के तीनों दिग्गजों (दिग्विजय, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य) की गुटबाजी सतह पर आएगी। फिलहाल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस तरह की किसी गुटबाजी पर नकेल कस रखी है। 

रास्ता देख रहे हैं 

चौधरी अजीत सिंह उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं। उम्मीद बहुत बड़ी है, हैसियत घटकर छोटी हो गई है। लेकिन कहते हैं उम्मीद के सहारे दुनिया जीती है। चौधरी साहब के साथ भी ऐसा ही है। उन्हें उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनेगा। कांग्रेस, बसपा, सपा साथ आएंगे और रालोद इसका हिस्सा बनेगा। कांग्रेस साथ न आई तब भी बसपा, सपा के साथ रालोद चुनाव लड़ेगी। लेकिन यदि किसी ने रालोद को लेने में दिलचस्पी न दिखाई तो चौधरी साहब अकेले चुनाव में जाने की बात कहने में देर नहीं लगाते। रालोद के एक पुराने नेता अभी उनसे मिलने गए थे तो चौधरी साहब ने कहा कि इंतजार कीजिए। बात नहीं बनी तो रालोद अकेले भी चुनाव में उतर सकता है। 15 सीट पर फोकस करके लड़ेगा तो चार-पांच जीत सकता है। कोई 2014 का चुनाव तो है नहीं। 

भाई अमर सिंह

शरीर भले शिथिल हो गया है, लेकिन दिमाग पूरा चलता है। जी हां, बात अमर सिंह की हो रही है। आजकल अमर सिंह खुश चल रहे हैं। शिवपाल को सरकारी बंगला मिलना, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव का कद थोड़ा नीचा होना सब अमर सिंह को अच्छा लग रहा है। अमर सिंह को यह भी लग रहा है कि अब मुलायम सिंह यादव कुछ नहीं कर सकते। प्रो. राम गोपाल यादव में कोई दम न था और न है। वह इंतजार कर रहे हैं 2019 के लोकसभा चुनाव का। अमर सिंह का कहना है कि यह चुनाव हो जाने दीजिए। इसी में अखिलेश यादव को आटे दाल का भाव पता चल जाएगा। अमर सिंह यह कहने में जरा भी देर नहीं लगाते कि उनकी औकात क्या है।, लेकिन मजे की बात यह भी है कि अगले पल चर्चा में वह अपनी औकात भी बताने लगते हैं। अखिलेश की बात आते ही वह अचानक उत्साह और उत्तेजना से भर जाते हैं। आजम खां का नाम लेते ही नाक पर गुस्सा आने में देर नहीं लगती।


सब है, समय नहीं है

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पास सब है, समय नहीं है। अकेले जो हैं। स्टार प्रचारक के रूप में राहुल की मांग भी बहुत ज्यादा है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव है और तीन में प्रतिष्ठा दांव पर है। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी का स्वास्थ्य प्रचार की इजाजत नहीं दे रहा है। सोनिया गांधी अब पार्टी के मामलों में भी दखलंदाजी नहीं करना चाहतीं। कांग्रेस पार्टी ने अभी भी प्रियंका गांधी वाड्रा पर चिरपरिचित रहस्य बनाए रखा है। ऐसे में एआईसीसी से लेकर युवक कांग्रेस और पार्टी के नेताओं, कमेटियों को कांग्रेस अध्यक्ष उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। जिन राज्यों में चुनाव नहीं हैं, वहां के नेताओं के मिलने के आवेदन लंबे समय से अटके पड़े हैं। 

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