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आंध्र प्रदेश की राजनीति को तय करेंगे पोलावरम, अमरावती और स्पेशल स्टेटस

Sun, 03 Jun 2018 12:26 AM IST
Harendra Chaudhary हरेन्द्र, विजयवाड़ा से लौट कर। 
हरेन्द्र, विजयवाड़ा से लौट कर।  Published by: Harendra Chaudhary Updated Sun, 03 Jun 2018 12:26 AM IST
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polavaram amravati and special status will decide the politics of Andhra Pradesh

साल 2019 आंध्र प्रदेश की तकदीर के लिए बेहद अहम साबित होने वाला है। राज्य में अगले साल आम चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं। लेकिन वहां की जनता के हाथ खाली हैं, क्योंकि केन्द्र और राज्य की लड़ाई में वहां के तीन अहम मुद्दों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।

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पोलावरम बांध, अमरावती और राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग, ये तीनों ही मुद्दे लोकसभा और विधान सभा चुनावों के परिणामों को प्रभावित करेंगे। तेलगु देशम पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, कांग्रेस, पवन कल्याण की जन सेना पार्टी और बीजेपी अपने-अपने तरीकों से इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन पांचों पार्टियों की राजनीतिक जंग में प्रदेश की जनता को बस चुनावों का इंतजार है। 
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हाल ही में संपन्न हुए टीडीपी के सालाना होने वाले 36वें महानाडू सम्मेलन में राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इन तीनों ही मुद्दों को केन्द्र सरकार की सियासत का शिकार बताया। राज्य के विकास से जुड़े पोलावरम बांध और अमरावती प्रोजेक्ट पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, तो वहीं राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग काफी पुरानी है, जिसे लेकर कई आंदोलन भी हो चुके हैं।

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स्पेशल स्टेटस देने की मांग

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पिछले एक दशक से केन्द्र के सामने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग लंबित है। यूपीए सरकार ने भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को स्वीकार किया था। देश में जब एनडीए की सरकार बनी तो टीडीपी ने इसी शर्त पर समर्थन दिया कि सरकार राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देगी। लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार ने टीडीपी की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केंद्र एक विशेष श्रेणी राज्य के बराबर आंध्र प्रदेश को वित्तीय सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है। जिसके बाद टीडीपी ने एनडीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। 

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि वह इस आकलन से सहमत हैं कि राज्य के बंटवारे के बाद आंध्र प्रदेश आर्थिक रूप से जूझ रहा है। उनकी सरकार केंद्र सरकार द्वारा विभाजन के समय किए गए वादे को लेकर प्रतिबद्ध है। 

केन्द्र सरकार के मुताबिक आंध्र प्रदेश का जिस समय बंटवारा हुआ, उस समय यह दर्जा दिया जा सकता था। लेकिन, 14वें वित्त आयोग के बाद ऐसा कोई भी दर्जा सिर्फ नॉर्थ-ईस्ट और पहाड़ी राज्यों के लिए ही वैधानिक है। 

विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को केंद्र की योजनाओं में 90 प्रतिशत फंड मिलता है, जबकि सामान्य राज्यों को 60 प्रतिशत मिलता है। शेष फंड राज्य सरकारों को मुहैया कराना होता है। आंध्र प्रदेश के मामले में केंद्र सरकार फंड का 90 प्रतिशत हिस्सा देने के लिए तैयार है, जो विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलता है। 

भारतीय संविधान में किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रावधान नहीं है। लेकिन अगर देश के कुछ हिस्से अन्य राज्यों की तुलना में संसाधनों के लिहाज से पिछड़े हैं, ऐसे राज्यों को केंद्र ने विशेष राज्यों का दर्जा देने का फैसला कर सकता है। 

नैशनल डिवेलपमेंट काउंसिल ने पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या घनत्व या बड़ा आदिवासी बहुल इलाका, अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर से जुड़ी सीमा, प्रति व्यक्ति आय और गैर कर राजस्व कम के आधार पर ऐसे राज्यों को विशेष दर्जा देने की सिफारिश की है।

वहीं राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि राज्य के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं और बेहद पिछड़े हुए हैं। रीआर्गेनाइजेशन एक्ट के सेक्शन 46(2) के मुताबिक केन्द्र सरकार स्पेशल डेवलेपमेंट पैकेज के रूप में राज्य के पिछड़े इलाकों को फंड उपलब्ध करा सकती है। 

खासतौर पर रायलसीमा और उत्तरी तटीय इलाकों में सेक्शन 46(3) के तहत फंड दे सकती है। वहीं विशेष राज्य के मसले पर जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर भी राज्य सरकार पर हमलावर है। जगन मोहन रेड्डी इस मुद्दे पर पैदल यात्रा भी निकाल चुके हैं। वहीं नायडू भी कह चुके हैं कि जब बुंदेलखंड को राहत पैकेज दिया जा सकता है, तो रायलसीमा के लिए क्यों नहीं जारी किया जा सकता। 

आंध्र की लाइफ लाइन पोलावरम बांध 

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1941 में ब्रिटिश काल में पोलावरम बांध बनाने की योजना पर विचार हुआ, लेकिन कई साल तक प्रोजेक्ट केन्द्र और राज्य की सियासत की भेंट चढ़ गया। आखिरकार साल 2005 में पोलावरम बांध की नींव रखी गई और काम शुरू हुआ। यह अकेला ऐसा प्रोजेक्ट है, जो दो नदियों कृष्णा और गोदावरी को आपस में जोड़ता है। 

आंध्र के रायलसीमा इलाके के 4 जिले अनंतपुर, कुडप्पा, नेल्लोर और चित्तूर भीषण सूखे से प्रभावित हैं। अहम बात यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके वाईएसआर रेड्डी भी इसी इलाके से थे और वाईएसआर कांग्रेस का मुख्य गढ़ यही इलाका है। चंद्रबाबू नायडू ने इस इलाके में पानी की कमी को दूर करने के लिए गोदावरी नदी के पानी को कृष्णा बेसीन तक पहुंचाने के लिए महत्वाकांक्षी पट्टीसीमा लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट शुरु किया। 

2015 में रिकॉर्ड टाइम में बन कर तैयार हुए इस प्रोजेक्ट के जरिए गोदावरी नदी में बाढ़ के दौरान आए 80 टीएमसी पानी को पंपों के जरिए 160 किमी दूर कृष्णा नदी तक पहुंचाया जाता है, ताकि रायलसीमा के किसानों तक यह पानी पहुंच सके। लेकिन समस्या यह थी कि यह पंप केवल साल में 4 महीने ही गोदावरी में बाढ़ आने के दौरान ही काम करते हैं, और हर साल तकरीबन 3000 टीएमसी पानी बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। बाकी वक्त में रायलसीमा के ये इलाके फिर सूखे की चपेट में आ जाते हैं। इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए राज्य सरकार ने पोलावरम बांध पर काम करने का फैसला किया। वहीं कृष्णा नदी में भी पानी का स्तर लगातार कम हो रहा है, जो राज्य के लिए चिंता का विषय है। लेकिन पोलावरम प्रोजेक्ट से 13 जिलों के 5 करोड़ लोगों की जरूरतें पूरी हो सकती हैं और रायलसीमा इलाके को पूरी तरह से सूखे से मुक्त किया जा सकता है।

सरदार सरोवर बांध के बाद पोलावरम दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा। 50 हजार करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट में 75.2 टीएमसी को स्टोरेज करने की क्षमता है और 194 टीएएमसी पानी से 7.2 लाख एकड़ जमीन को सींचा जा सकता है। इस बांध से न केवल विशाखापटनम को 23.44 टीएमसी पानी की सप्लाई हो सकेगी, साथ ही 540 गांवों के 28.5 लाख आबादी को पीने का पानी मुहैया हो सकेगा। इसके अलावा कृष्णा बेसिन में एकत्रित पानी को कर्नाटक और महाराष्ट्र के साथ भी शेयर किया जाएगा। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में दो कैनाल लेफ्ट और राइट बनाई हैं, राइट कैनाल से 178 किमी दूर कृष्णा डेल्टा रीजन के 14 लाख एकड़ भूमि और चार जिलों की पानी की जरूरत को पूरा करेंगी, वहीं लेफ्ट कैनाल से 213 किमी दूर पूर्वी गोदावरी, विजाग, श्रीकाकुलम और विजयनगरम क्षेत्र की 2.5 लाख एकड़ जमीन की पानी की जरूरत को पूरा करेगी। इसके अलावा इस प्रोजेक्ट से 960 मैगावॉट बिजली का उत्पादन होगा। 

राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि यह उनका सपना है कि यह प्रोजेक्ट 2019 से शुरू हो जाए। इस प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए उन्होंने प्रोजेक्ट साइटट पर रियल टाइम कैमरा भी लगाए हुए हैं, जहां से प्रोजेक्ट का लाइव स्टेटस देखा जा सकता है। 

केन्द्र सरकार आंध्र प्रदेश रिऑर्गेनाइजेशन एक्ट, 2014 के सेक्शन 90 तहत इसे नेशनल प्रोजेक्ट घोषित कर चुकी है, क्योंकि इससे कई जिलों को फायदा पहुंचेगा। इसके बाद केन्द्र की जिम्मेदारी है कि वह इस प्रोजेक्ट समय से पूरा करने के साथ फंडिग भी उपलब्ध कराए। 

इस प्रोजेक्ट का 57 फीसदा काम पूरा हो चुका है और इसका अधिकांश खर्च राज्य वहन कर रहा है, लेकिन विस्थापितों के पुर्नवास और जमीन अधिग्रहण के 33 हजार करोड़ रुपए की राशि केन्द्र सरकार को देनी है और इस राशि को देने में ढिलाई बरत रहा है। केन्द्र में बैठी बीजेपी इसे स्वर्णिम अवसर के तौर पर देख रही है कि कैसे टीडीपी सरकार पर प्रभावित परिवारों की अनदेखी का आरोप लगा कर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है। तो वहीं टीडीपी भी केन्द्र पर प्रभावितों को मदद न देने का आरोप लगाकर फिर से सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का सपना देख रही है, लेकिन केन्द्र और राज्य की इस राजनैतिक लड़ाई में 222 गांवों की 2 लाख आबादी पिस रही है।

इंडिया का सिंगापुर 'अमरावती'

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साल 2014 में राज्य की जनता के लिए आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद का तेलंगााना में शामिल होना किसी शॉक से कम नहीं था। हालांकि शिवरामाकृष्णन कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक नई राजधानी बनने तक राज्य के पास विकल्प था कि वह हैदराबाद को 10 साल तक राजधानी के तौर पर इस्तेमाल कर सकता था। लेकिन चंद्रबाबू नायडू ने इस सिफारिश को सिरे से नकारते हुए अमरावती को राज्य की नई राजधानी बनाने का फैसला किया। 

नायडू को इस बात का मलाल है कि हैदराबाद को साइबर हैदराबाद बनाने में उनका बड़ा योगदान है। हालांकि हैदराबाद के अलग होने के बाद उन्होंने 49 दिनों तक बस से ही पूरा सचिवालय चलाया। लेकिन अब नायडू अमरावती को सिंगापुर की तर्ज पर विकसित करना चाहते हैं। यहां तक कि अमरावती बनाने के लिए उन्होंने 10 रुपए की कीमत की एक ई-ब्रिक्स दान देने की गुजारिश की, ताकि इस चुनौती को असलियत में तब्दील किया जा सके। महानाडू में नायडू ने ऐलान किया कि 2022 तक वे स्मार्ट सिटी अमरावती को पुरी तरह से डेवलप कर देंगे। 

नई राजधानी अमरावती तकरीबन 217 वर्ग किमी और तकरीबन 1375 एकड़ जमीन पर बसेगी। वहीं इसमें एम्स भी बनाया जाएगा, जो 2019 तक बन कर तैयार हो जाएगा। वहीं इसे 9 थीम्स की तर्ज पर बनाया जाएगा, जिसमें कल्चर, हेल्थ, इलैक्ट्रानिक, फाइनेंस, जस्टिस, टूरिज्म, स्पोर्ट्स और एजुकेशन शामिल होंगे। 

वर्ल्ड क्लास स्टेट कैपिटल बनाने के लिए राज्य सरकार ने आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजन डेवलपमेंट एक्ट 2014 के जरिए 29 गावों की तकरीबन 33 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया। जिसे किसानों ने स्वैच्छिक रूप से सरकार को सौंप दिया, बदले में सरकार ने हर महीने प्रति एकड़ 30 हजार रुपए दस साल तक देने और हर साल 10 फीसदी बढ़ोतरी के प्रस्ताव के साथ विकसित आबादी में जमीन देने का भी ऑफर दिया। 

आंध्र प्रदेश की यह लैंड पूलिंग स्कीम पूरे देश के लिए एक मिसाल है। वहीं इसमें 19 हजार परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें से 3900 परिवारों का पुर्नवास किया जा चुका है। 

सेक्शन 94(3) एक्ट के तहत यह केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि नई राजधानी में राजभवन, हाई कोर्ट, सेक्रेटिएट, विधान सभा, विधान परिषद और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए राज्य सरकार को जरूरी धनराशि मुहैया कराएगी। अमरावती को बनाने में पहले फेज में 50 हजार करोड़ का खर्चा आने का अनुमान है।

नायडू ने पहले फेज के लिए 2019 का लक्ष्य रखा है। लेकिन केन्द्र सरकार ने नई राजधानी बनाने के लिए मात्र 2500 करोड़ रुपए जारी किए, जिसमें से 1500 करोड़ केन्द्र सरकार दे चुकी है। साथ ही केन्द्र सरकार राज्य सरकार पर आरोप लगा रही है कि जारी की गई धनराशि का अन्यत्र इस्तेमाल किया जा रहा है और राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए यूटिलिटी सर्टिफिकेट को गलत ठहरा रही है।

केन्द्र और राज्य की लड़ाई आंध्र की जनता पर भारी पड़ रही है, क्योंकि नई राजधानी बनने तक सभी सरकारी विभाग अस्थाई रूप से विजयवाड़ा और आसपास के जिलों से दैनिक कामकाज निबटा रहे हैं और जनता को तकलीफ झेलनी पड़ रही हैं।

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