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कौन हैं हंसा मेहता? जिनके अदम्य साहस की चर्चा पीएम मोदी ने 'मन की बात' में की
Sun, 23 Feb 2025 12:04 PM IST
दीपक कुमार शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Sun, 23 Feb 2025 12:04 PM IST
सार
हंसा जीवनराज मेहता सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और एक लेखिका थीं। उनका जन्म 3 जुलाई 1897 को बॉम्बे राज्य (वर्तमान में गुजरात) के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हंसा के पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा और बीकानेर रियासतों के दीवान थे और उनके दादा नंदशंकर मेहता गुजराती भाषा के पहले उपन्यास करण घेलो के लेखक थे। हंसा की शादी प्रख्यात चिकित्सक और प्रशासक जीवराज नारायण मेहता से हुई थी।
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हंसा मेहता
- फोटो : X@PMO_India
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में हंसा मेहता के अदम्य साहस की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने हमारे राष्ट्र ध्वज के निर्माण से लेकर उसके लिए बलिदान देने वाली देश-भर की महिलाओं के योगदान को सामने रखा था। उनका मानना था कि हमारे तिरंगे में केसरिया रंग से भी ये भावना उजागर होती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि हमारी नारी-शक्ति भारत को सशक्त और समृद्ध बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान देगी। आज उनकी बातें सच साबित हो रही हैं। पीएम मोदी ने संविधान सभा में राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत करते समय हंसा मेहता के भाषण की ऑडियो-क्लिप भी साझा की।
बता दें कि हंसा जीवनराज मेहता सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और एक लेखिका थीं। उनका जन्म 3 जुलाई 1897 को बॉम्बे राज्य (वर्तमान में गुजरात) के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हंसा के पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा और बीकानेर रियासतों के दीवान थे और उनके दादा नंदशंकर मेहता गुजराती भाषा के पहले उपन्यास करण घेलो के लेखक थे। हंसा की शादी प्रख्यात चिकित्सक और प्रशासक जीवराज नारायण मेहता से हुई थी।
हंसा ने 1918 में दर्शनशास्त्र में स्ननातक किया। जिसके बाद वह 1919 में इंग्लैंड चली गईं। जहां से उन्होंने पत्रकारिता और समाजशास्त्र में उच्च शिक्षा ली।
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सरोजनी नायडू और महात्मा गांधी से मिलने के बाद राजनीति में रखा कदम
1918 में सरोजनी नायडू और 1922 में महात्मा गांधी से मिलने के बाद हंसा मेहता ने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों का बहिष्कार किया। महात्मा गांधी की सलाह पर उन्होंने अन्य स्वतंत्रता आंदोलन गतिविधियों में भी भाग लिया। 1932 में हंसा और उनके पति को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। बाद में वह बॉम्बे विधान परिषद से प्रतिनिधि चुनी गईं।
अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद हंसा को भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने वाली घटक विधानसभा की 15 महिलाओं में शामिल किया गया। वह सलाहकार समिति और मौलिक अधिकारों पर बनी उप-समिति की सदस्य भी रहीं। उन्होंने भारत में महिलाओं के लिए समानता और न्याय की वकालत की।
भारत में 1945 से 1960 तक कई मुख्य पदों पर रहीं
हंसा 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गईं। 1946-46 तक वह अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष रहीं। इस दौरान उन्होंने हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में भाषण दिया और महिला अधिकारों का एक चार्टर प्रस्तावित किया। 1945 से 1960 तक हंसा भारत में विभिन्न पदों पर रहीं, जिनमें एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की कुलपति, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सदस्य, इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड ऑफ इंडिया की अध्यक्ष के अलावा महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा की कुलपति का पद शामिल है।
संयुक्त राष्ट्र में भी मेहता का रहा योगदान
हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र में भी अपना योगदान दिया। 1946 में उन्होंने महिलाओं की स्थिति पर एकल उप-समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1947-48 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। बाद में, 1950 में हंसा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की उपाध्यक्ष भी बनीं। इसके अलावा, वह यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड की सदस्य भी थीं।
साहित्य में भी दिया योगदान
हंसा मेहता का साहित्य में भी अभूतपूर्व योगदान रहा है। उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखीं। जिनमें अरुणू अदभुत स्वप्न, बबलाना पराक्रमो, बलवर्तावली आदि शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, बालकाण्ड और सुंदरकाण्ड का अनुवाद भी किया।
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बता दें कि हंसा जीवनराज मेहता सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और एक लेखिका थीं। उनका जन्म 3 जुलाई 1897 को बॉम्बे राज्य (वर्तमान में गुजरात) के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हंसा के पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा और बीकानेर रियासतों के दीवान थे और उनके दादा नंदशंकर मेहता गुजराती भाषा के पहले उपन्यास करण घेलो के लेखक थे। हंसा की शादी प्रख्यात चिकित्सक और प्रशासक जीवराज नारायण मेहता से हुई थी।
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हंसा ने 1918 में दर्शनशास्त्र में स्ननातक किया। जिसके बाद वह 1919 में इंग्लैंड चली गईं। जहां से उन्होंने पत्रकारिता और समाजशास्त्र में उच्च शिक्षा ली।
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PM @narendramodi shares an audio clip of speech of Hansa Mehta ji while presenting National Flag in the Constituent Assembly. #MannKiBaat @PMOIndia pic.twitter.com/4flgfRmDqw
— Mann Ki Baat Updates मन की बात अपडेट्स (@mannkibaat) February 23, 2025
सरोजनी नायडू और महात्मा गांधी से मिलने के बाद राजनीति में रखा कदम
1918 में सरोजनी नायडू और 1922 में महात्मा गांधी से मिलने के बाद हंसा मेहता ने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों का बहिष्कार किया। महात्मा गांधी की सलाह पर उन्होंने अन्य स्वतंत्रता आंदोलन गतिविधियों में भी भाग लिया। 1932 में हंसा और उनके पति को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। बाद में वह बॉम्बे विधान परिषद से प्रतिनिधि चुनी गईं।
अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद हंसा को भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने वाली घटक विधानसभा की 15 महिलाओं में शामिल किया गया। वह सलाहकार समिति और मौलिक अधिकारों पर बनी उप-समिति की सदस्य भी रहीं। उन्होंने भारत में महिलाओं के लिए समानता और न्याय की वकालत की।
भारत में 1945 से 1960 तक कई मुख्य पदों पर रहीं
हंसा 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गईं। 1946-46 तक वह अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष रहीं। इस दौरान उन्होंने हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में भाषण दिया और महिला अधिकारों का एक चार्टर प्रस्तावित किया। 1945 से 1960 तक हंसा भारत में विभिन्न पदों पर रहीं, जिनमें एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की कुलपति, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सदस्य, इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड ऑफ इंडिया की अध्यक्ष के अलावा महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा की कुलपति का पद शामिल है।
संयुक्त राष्ट्र में भी मेहता का रहा योगदान
हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र में भी अपना योगदान दिया। 1946 में उन्होंने महिलाओं की स्थिति पर एकल उप-समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1947-48 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। बाद में, 1950 में हंसा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की उपाध्यक्ष भी बनीं। इसके अलावा, वह यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड की सदस्य भी थीं।
साहित्य में भी दिया योगदान
हंसा मेहता का साहित्य में भी अभूतपूर्व योगदान रहा है। उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखीं। जिनमें अरुणू अदभुत स्वप्न, बबलाना पराक्रमो, बलवर्तावली आदि शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, बालकाण्ड और सुंदरकाण्ड का अनुवाद भी किया।