No Money for Terror: आतंकी फंडिंग को इस तरह रोकेगा भारत, 75 देशों के आगे मोदी और शाह रखेंगे ये प्लान
No Money for Terror: टेरर फंडिंग पर रोक लगाने के लिए विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तालमेल कैसे बढ़ाया जाए और नई तकनीक जैसे क्रिप्टो करेंसी व क्राउडफंडिंग का तोड़ कैसे निकाला जाए, इस पर गहन विचार विमर्श करने के लिए नई दिल्ली में पहली बार दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन में 75 देश भाग लेंगे...
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'आतंकी फंडिंग' पर अंकुश लगाने के लिए भारत अब एक बड़ी भूमिका में दुनिया के सामने आ रहा है। आतंकी एवं चरमपंथी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता का इंतजाम करना और उसे दशहतगर्दों तक पहुंचाना, ये बातें अधिकांश देशों के लिए चुनौती बनी हैं। इन गतिविधियों में औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं। टेरर फंडिंग पर रोक लगाने के लिए विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तालमेल कैसे बढ़ाया जाए और नई टेक्नीक जैसे क्रिप्टो करेंसी व क्राउडफंडिंग का तोड़ कैसे निकाला जाए, इस पर गहन विचार विमर्श करने के लिए नई दिल्ली में पहली बार दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन में 75 देश भाग लेंगे। पीएम नरेंद्र मोदी 18 नवंबर को इस सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। 19 नवंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, सम्मेलन के अंतिम सत्र को संबोधित करेंगे। वहीं सम्मेलन में कुछ बातों पर सहमति बनाने की कोशिशें की जा रही हैं।
आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में प्रयोग हो रहे ये तरीके
आतंकी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता का इंतजाम करना और उसे दशहतगर्दों तक पहुंचाना, इस पर रोक लगाना बहुत जरूरी है। इसके लिए औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं। ये सब वित्त और प्रेषण के आधिकारिक चैनल के जरिए भी हो सकता है। इसके लिए अनियमित चैनल और 'यूज ऑफ कैश कूरियर' का उपयोग संभव है। पारंपरिक वित्तीय सेवाओं के लिए अनौपचारिक सिस्टम, कम खर्चीला है। इसके अलावा उसकी तेज स्पीड, भरोसा, उपभोक्ता पहचान चेक व ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड की कमी और टैक्स चोरी, आदि कारण भी इस्तेमाल को प्रोत्साहन दे सकते हैं। ये सब तरीके आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में प्रयोग किए जाते हैं। दोनों तरह के मामलों में इन तरीकों के इस्तेमाल के पीछे एक ही मकसद होता है कि किसी भी तरीके से ट्रांजेक्शन को संबंधित राज्य की एजेंसियों की जांच से छिपा लिया जाए।
आतंक वित्त पोषण में क्रिप्टो करेंसी और क्राउडफंडिंग भी
आतंकी फंडिंग (टीएफ) और मनी लॉन्ड्रिंग (एमएल), ऐसी गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मनी लॉंड्रिंग का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों और ड्रग ट्रैफिकिंग में अधिक होने लगा है। वे इसे वित्त और कॉमर्स का वैध तरीका साबित करने का प्रयास करते हैं। इसके जरिए अपराधियों को गैर कानूनी तरीके से लाभ कमाने का मौका मिलता है। आतंकी एवं अन्य अपराधी, अब धन शोधन के नए-नए तरीके अपना रहे हैं। आतंकी एवं चरमपंथी संगठन, नई टेक्नीक जैसे क्रिप्टो करेंसी और क्राउडफंडिंग का तरीका इस्तेमाल में ला रहे हैं। आतंकी फंडिंग व क्राउड सोर्स आदि के लिए 'डार्क वेब' प्रयोग किया जाने लगा है। अमेरिका ने डार्क वेब का 'फुल प्रूफ' सिस्टम अपनी सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों के लिए तैयार किया था। जैसे ही यह सिस्टम इन एजेंसियों से बाहर गया, तो लोगों ने इसे अपने तरीके से इसे तोड़ दिया और मनमर्जी पूर्वक इस्तेमाल करने लगे। इसे 'टोर' और 'द ओनियन राउटर' भी कहा जाता है। इस नेटवर्क में 'यूजर' को छिपा दिया जाता है। आतंक, नशा, हथियार और साइबर क्राइम, ऐसे अपराधों में अब यही तकनीक इस्तेमाल होने लगी है। कौन ले रहा है और कौन दे रहा है, 'द ओनियन राउटर' में यह कोई नहीं जान पाता।
वो तकनीक, जिसमें ट्रैकिंग और सर्विलांस बनी चुनौती
इसे 'प्याज के छिलके' उतारने वाली तकनीक भी कहा जाता है। जांच एजेंसियों के लिए अभी यह तकनीक एक चुनौती है। व्हाट्सएप चैट, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और सोशल मीडिया के दूसरे माध्यम भी आतंकियों द्वारा प्रयोग किए जा रहे हैं। साइबर विशेषज्ञ रक्षित टंडन के अनुसार, डार्क वेब या डार्क नेट, आतंकी गतिविधियों, मनी लॉंड्रिंग व ड्रग्स की बुकिंग और सप्लाई का बड़ा जरिया बन गया है। इसके इस्तेमाल से इंटरनेट पर असली यूजर सामने नहीं आता। यूजर कहां पर है, उसकी ट्रैकिंग और सर्विलांस, जांच एजेंसियों के लिए यह काम बहुत मुश्किल होता है। सूत्रों के मुताबिक, साइबर क्राइम को लेकर वैश्विक स्तर पर कानून और नियमों को लेकर कोई सहमति नहीं बन सकी है। बहुपक्षीय और बहु हितधारक अप्रोच, आतंक वित्त पोषण जैसे खतरों की पहचान और उससे निपटने में मददगार साबित हो सकती है। एक प्रभावी कानूनी फ्रेमवर्क, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे संस्थानों की मॉनिटरिंग, कंट्रोल और सुधार के लिए आवश्यक है। कुछ वर्षों से डार्क वेब जैसी तकनीक का दुरुपयोग बढ़ रहा है। आतंकी एवं चरमपंथी समूह, अपनी गतिविधियों के लिए अब एनजीओ जैसी संस्थाओं का उपयोग भी करने लगे हैं।
क्यों विवादों में फंसे रहते हैं पाकिस्तान व अफगानिस्तान?
समकालीन विश्व में ऐसे खतरे काफी अधिक बढ़ रहे हैं। आतंकी एवं चरमपंथी समूह, इस बाबत ज्यादा विविध होते जा रहे हैं। आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए चरमपंथी और जिहादी, राजनीतिक एवं सामाजिक सांस्कृतिक समूहों की आड़ में अपनी गैर कानूनी गतिविधियों को वैध बताने का प्रयास करते हैं। विश्व स्तर पर मौजूद विद्रोही समूह, सांप्रदायिक विवादों से जुड़े रहते हैं। संजाति विषयक और सांप्रदायिक आधार वाले ये समूह बढ़ते जा रहे हैं। इन समूहों की एक संतोषजनक संख्या है। ये समूह लोकल स्तर पर हमलों को बढ़ावा देते हैं। इनका निशाना स्टेट मशीनरी होता है। इस तरह की हिंसा की प्रकृति, चक्रीय होती है। उतार-चढ़ाव भरी भू-राजनैतिक परिस्थितियों में कई देश जैसे पाकिस्तान व अफगानिस्तान, हथियारबंद संजाति विषयक समूहों के विवादों में फंसे रहते हैं। नतीजा, वहां कमजोर शासन, राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी, ये सब आतंकवाद फैलाने वालों को अनुकूल माहौल प्रदान करने में मदद करते हैं। बहुत से केसों में राजनीतिक व्यवस्था की भंगुरता, इस तरह की हिंसा को एक इष्टतम वातावरण प्रदान करती है। ये समूह अपनी गतिविधियों को लोकल स्तर से बाहर निकालकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय अलगाववादी मूवमेंट के स्तर पर ले जाने का प्रयास करते हैं।
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट के बीच बढ़ाना होगा तालमेल
आतंकी फंडिंग को लेकर विश्व स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। ये सभी देशों के सामने एक बड़ी चुनौती है। प्राइवेट सेक्टर का समावेशी और विनियमन तरीके से विकसित होना व तकनीक का छोटे वित्तीय संस्थानों तक पहुंचना, ये भी अतिरिक्त चुनौतियों में शुमार है। विभिन्न देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय लेवल पर आपसी सहयोग होना बेहद जरुरी है। आतंकी गतिविधियों एवं मनी लॉन्ड्रिंग के बदलते तरीकों पर सभी देशों की कानूनी प्रवर्तन एजेंसियों के बीच एकजुटता होनी चाहिए। प्राइवेट एवं सरकारी क्षेत्र के बीच सूचनाओं के बेहतर आदान-प्रदान की व्यवस्था करनी होगी। विभिन्न देशों की फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट के बीच तालमेल बढ़ाना होगा। आतंकी फंडिंग को रोकने के लिए जो काम होना चाहिए और जो मौजूदा समय में हो रहा है, उसके बीच बड़ा अंतर है। विभिन्न देशों द्वारा जो कदम उठाए गए हैं, वे तय क्षमता से बहुत पीछे हैं। विकासशील राष्ट्रों को ऐसी बैठकों को प्राथमिकता देनी होगी। इन सबके लिए देशों में राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना बहुत आवश्यक है। संस्थागत क्षमता की कमी के चलते विकासशील देशों में प्रभावी कदम नहीं उठाए जा सके हैं। पिछले दो दशक में आतंकी फंडिंग के नए तौर तरीके सामने आए हैं। इसके लिए प्राइवेट और सरकारी, दोनों क्षेत्रों को सतर्क रहना होगा। उन्हें नई तकनीकें अपनानी पड़ेंगी। सिस्टम में ऐसे छिद्रों की पहचान करनी होगी, जिसके माध्यम से वहां पर आतंकी संगठनों की सेंध न लग सके।