PM Modi US Visit: यूक्रेन मामले में तीसरे पक्ष के लिए दुनिया देख रही भारत की तरफ, अमेरिका को है बड़ी उम्मीद
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विस्तार
लंबे समय से चल रहे रूस और यूक्रेन के युद्ध को खत्म करने के लिए अमेरिका ने भारत की ओर बड़ी उम्मीद से निगाहें लगाई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी प्रशासन को इस बात का भरोसा है कि भारत ही रूस और यूक्रेन के युद्ध को रोकने में उस तीसरे पक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिसकी समूचे विश्व को दरकार है। प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन की मुलाकात के दौरान रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर बातचीत होनी तय मानी जा रही है। विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत और अमेरिका के करीब आने के बाद भी अमेरिकी सरकार को इस बात का एहसास है कि भारत और रूस के कितने नजदीकी और पुराने रिश्ते हैं। शायद यही वजह है की प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे से अमेरिका यह उम्मीद भी लगा बैठा कि भारत ही वह तीसरा पक्ष हो सकता है, जो रूस से बातचीत कर शांति के लिए युद्ध खत्म करने की पहल करें।
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भारत से इतनी बड़ी उम्मीद लगाई है अमेरिका ने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस के अधिकारी जॉन किर्बी ने कहा कि वह काफी समय से कहते आ रहे हैं कि रूस और यूक्रेन युद्ध की शांति प्रक्रिया में शामिल किसी भी तीसरे देश का स्वागत किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन की मुलाकात को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी देश चाहते हैं कि रूस और यूक्रेन का युद्ध समाप्त हो ताकि शांति बनी रहे। दोनों नेता दो देशों के बीच चल रहे युद्ध शांति को लेकर किस स्तर की वार्ता करेंगे, इस पर जॉन किर्बी ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि दोनों नेताओं के पास मौजूदा हालात को देखते हुए बातचीत करने का एक मौका है। व्हाइट हाउस के अधिकारी की ओर से आए इन बयानों को विदेशी मामलों के जानकार अमेरिका की ओर से भारत की तरफ लगाई जाने वाली नई उम्मीद के तौर पर देख रहे हैं। रूस में तैनात एक वरिष्ठ राजनयिक बताते हैं कि अमेरिका ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान पूरी योजना बनाई है कि वह रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में भारत को आगे लाएं, ताकि युद्ध भारत की ओर से शांति प्रक्रिया करवा कर खत्म हो सके।
इसलिए भारत को देख रहा है अमेरिका ताकतवर नजरिए से
वरिष्ठ राजनयिक और कई देशों के दूतावासों में अहम जिम्मेदारी निभा चुके जीपी सिन्हा कहते हैं कि अमेरिका को इस बात का अंदाजा है कि भारत और रूस के बीच इतने मजबूत रिश्ते हैं कि वह इस युद्ध को रोकने में मदद कर सकते हैं। सिन्हा कहते हैं कि अमेरिका यूक्रेन के पक्ष में खड़ा हुआ है। नाटो के सभी देश यूक्रेन के साथ खड़े होकर रूस को भड़का रहे हैं। यही वजह है कि इन देशों की सुनने के लिए रूस बिल्कुल तैयार नहीं है। वह कहते हैं कि भारत और रूस के रिश्ते छह दशक पुराने हैं। वहीं रूस और यूक्रेन के युद्ध के बाद जब पूरी दुनिया ने रूस के ऊपर तमाम तरह की पाबंदियां लगा दीं तो भारत ने अपने रिश्तों को न्यूट्रल रखते हुए रूस के साथ उन्ही रिश्तों को आगे बढ़ाया जो पहले से बने हुए थे। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि तमाम दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल आयात करने में कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का दबाव महसूस नहीं किया। इस बात को रूस भी भलीभांति समझता है। रूस के मजबूत रिश्तों की नींव पर ही अमेरिका चाहता है कि भारत उस तीसरे पक्ष की भूमिका भूमिका निभाए, जिससे शांति के लिए रूस और यूक्रेन का युद्ध समाप्त हो सके।
भारत की मध्यस्थता के बाद भी अमेरिका देना चाहता है यह संदेश
मास्को स्थित भारतीय दूतावास में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने वाले वरिष्ठ राजनयिक अमरेंद्र कठुआ कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं है कि भारत और रूस के रिश्ते तमाम अंतरराष्ट्रीय दखलंदाजी और कूटनीति के बाद भी बेहतर बने हुए हैं। वह कहते हैं इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रूस और यूक्रेन के युद्ध के दौरान भारत की ओर से उसके प्रति बरते गए व्यवहार के चलते हुई है। कठुआ कहते हैं कि जब पूरी दुनिया ने रूस के ऊपर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए तो भारत ने अपने दोस्त देश के साथ खड़े रहना ज्यादा मुनासिब समझा। अब अमेरिका इसी भारत और रूस के मजबूत रिश्ते को एक अलग नजरिए से भुनाने में लगा हुआ है। वरिष्ठ राजनयिक अधिकारियों का मानना है कि भारत से रूस और यूक्रेन के युद्ध में शांति की अपील करवाकर अमेरिका एक साथ कई निशाने साधने की तैयारी कर रहा है। पहला यह कि अमेरिका चाहता है कि भारत के साथ रूस और यूक्रेन के युद्ध को समाप्त करने या मध्यस्थता करने की बात करके व समूची दुनिया में एक यह भी संदेश देने की कोशिश करे कि अमेरिका ने भारत के माध्यम से कितनी महत्वपूर्ण पहल की है। ताकि पूरे विश्व में संदेश जाए कि अमेरिका शांति के लिए किस तरीके से प्रयासरत था। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा करके अमेरिका यूक्रेन को अपने पाले में और मजबूती से खड़ा करना चाहेगा, ताकि यूरोपीय देशों में अमेरिका की और मजबूत स्थिति बन सके और वह अपने सैन्य ठिकानों के साथ बड़ी व्यापारिक गतिविधियों को यूक्रेन से समूचे यूरोप में साध सके।
अमेरिका करना चाहता है मजबूत दोस्ती
विदेशी मामलों के जानकार और रिटायर्ड भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी ओपी धर कहते हैं कि बीते कुछ दिनों में इस तरीके से भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हुए हैं, उससे रूस को अंदरूनी तौर पर कुछ असहजता जरूर महसूस हुई है। लेकिन भारत में कभी भी रूस को किसी भी स्तर पर असहज महसूस होने नहीं दिया है। यही वजह है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय गतिरोध और चीन के परोक्ष और अपरोक्ष दखल के बाद भी भारत और रूस के रिश्ते एक अलग मजबूती के साथ आगे बढ़ते रहे। धर कहते हैं कि यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है कि आखिर भारत और रूस के मजबूत रिश्तों के बाद भी अमेरिका भारत से अपने रिश्ते क्यों मजबूत करना चाहता है। वह कहते हैं इसके पीछे कई कारण हैं। उसमें प्रमुख कारण अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था में भारत को वह अपना एक बहुत बड़ा सपोर्टर मानकर चल रहा है। क्योंकि भारत की लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था और यंग टैलेंट के साथ-साथ टेक्नोलॉजी से लेकर सैन्य उपकरणों की खरीद वाला भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है। अमेरिका जानता है कि बीते कुछ समय में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत जिस तरह से अपनी पहचान बनाई है और आगे बढ़ रहा है, उससे अमेरिका को न सिर्फ मजबूती मिलेगी, बल्कि साउथ एशिया के क्षेत्र में उसका एक मजबूत सहयोगी दोस्त भी तैयार होगा। यह जानते हुए कि बीते कुछ समय में चीन ने रूस के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की कवायद शुरू की है और भारत के पहले से रूस से मजबूत रिश्ते हैं, बावजूद इसके अमेरिका की भारत के साथ दोस्ती बढ़ाना न सिर्फ मजबूरी है, बल्कि अमेरिका उसको अपने हित में भी देख रहा है।
क्या भारत इस मामले में खुलकर करेगा रूस से बात
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका की मंशा के अनुरूप भारत रूस से यूक्रेन युद्ध को लेकर शांति समझौते की पहल पर बात करेगा। वरिष्ठ राजनयिक अमरेंद्र कठुआ कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले भी शांति की अपील करते हुए इस बात को कह चुके हैं कि युद्ध कोई विकल्प नहीं है। उनका कहना है कि भारत युद्ध के पक्ष में पहले भी कभी नहीं रहा है। वह कहते हैं कि क्योंकि अमेरिका के पास इस वक्त रूस से बात करने के लिए कोई भी डिप्लोमेटिक आधार मजबूत नहीं है। दरअसल अमेरिका जिस तरह से यूक्रेन के साथ खड़ा है, उससे यूक्रेन और अमेरिका के रिश्ते समूची दुनिया के सामने कैसे हैं, दिख ही रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका भारत से इस युद्ध को खत्म करने की कोशिश में लगा हुआ है। अमरेंद्र कहते हैं कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से प्रधानमंत्री मोदी इस युद्ध को खत्म करने की अपील करते हैं, तो निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति की राह पर दो कदम आगे बढ़कर रूस से बात करने की हामी भर सकते हैं। लेकिन वह कहते हैं कि ग्राउंड पर भारत और रूस के किस स्तर की बात होती है यह कह पाना अभी बहुत मुश्किल होगा।