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पीएम मोदी डिग्री मामला: अरविंद केजरीवाल को लगा झटका, गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की अपील; जुर्माना बरकरार
Tue, 29 Sep 2026 03:55 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, अहमदाबाद
पीटीआई, अहमदाबाद
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 29 Sep 2026 03:55 PM IST
सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़े मामले में गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अरविंद केजरीवाल की अपील खारिज कर दी। अदालत ने एकल पीठ के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें केंद्रीय सूचना आयोग के 2016 के निर्देश को रद्द किया गया था। साथ ही केजरीवाल पर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को भी कायम रखा गया।
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आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाईकोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री की जानकारी सार्वजनिक करने के निर्देश से जुड़े मामले में केजरीवाल की अपील मंगलवार को खारिज कर दी।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। इसके साथ ही केजरीवाल पर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा गया।
जुर्माने का आदेश बरकरार रख हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर अपीलकर्ता की ओर से उठाए गए किसी भी आधार पर चुनौती दिए गए फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई जा सकती। अपील इसी के साथ खारिज की जाती है।"
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गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 31 मार्च 2023 को केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआईसी के 2016 के निर्देश को रद्द कर दिया था। साथ ही केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का खर्च लगाया था। अदालत ने आरटीआई प्रावधानों के कथित दुरुपयोग को लेकर उनकी आलोचना भी की थी और उनके रवैये को गंभीरता से नहीं लेने वाला बताया था।
केजरीवाल के वकील ने दी क्या दलील?
अपील की सुनवाई के दौरान केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने के आधार पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि उनके मुवक्किल ने प्रधानमंत्री की डिग्री हासिल करने की मांग पर "लगातार जोर नहीं दिया" था, जबकि एकल पीठ ने इसके विपरीत टिप्पणी की थी।
सिंघवी ने यह भी दलील दी थी कि सीआईसी ने खुद यानी स्वत संज्ञान के आधार पर कार्यवाही शुरू की थी और एक औपचारिक आवेदन के बजाय एक पत्र के आधार पर केजरीवाल को प्रतिवादी बनाया गया था।
पीएम मोदी की डिग्री पर गुजरात विश्वविद्यालय ने दिया क्या जवाब?
गुजरात विश्वविद्यालय ने एकल पीठ के सामने कहा था कि प्रधानमंत्री की डिग्री पहले से ही ऑनलाइन उपलब्ध है। हालांकि, एकल पीठ के समक्ष दायर पुनर्विचार याचिका में केजरीवाल के वकीलों ने कहा था कि डिग्री कभी ऑनलाइन उपलब्ध कराई ही नहीं गई। अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया था।
केजरीवाल के वकील ने दलील दी थी कि अगर डिग्री वास्तव में ऑनलाइन उपलब्ध है, तो उसे आरटीआई कानून के दायरे में आना चाहिए और ऐसी स्थिति में इस मामले को आगे चलाने का आधार समाप्त हो जाना चाहिए। गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि केजरीवाल ने मामले को लगातार आगे बढ़ाया और संस्थान को बदनाम करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कीं।
मेहता ने अदालत से केजरीवाल पर जुर्माना लगाने की मांग करते हुए कहा था कि इससे आरटीआई कानून के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और सरकारी अधिकारियों का कामकाजी समय ऐसे अनुरोधों में नहीं लगेगा, जो कानून के उद्देश्य को पूरा नहीं करते।
क्या है पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ा पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2016 का है। उस समय केजरीवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक किए जाने की मांग की थी। अप्रैल 2016 में तत्कालीन सीआईसी एम श्रीधर आचार्युलु ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वे मोदी की डिग्रियों से जुड़ी जानकारी केजरीवाल को उपलब्ध कराएं।
इसके करीब तीन महीने बाद गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से हाईकोर्ट का रुख किए जाने पर अदालत ने सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी। सीआईसी का आदेश केजरीवाल के पत्र के एक दिन बाद आया था। केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा था कि उन्हें अपने बारे में सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि आयोग मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी क्यों "छिपाना" चाहता है।
आरटीआई कानून के तहत बचकानी जिज्ञासा :गुजरात विश्वविद्यालय
इसी पत्र के आधार पर सीआईसी ने गुजरात विश्वविद्यालय को पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े रिकॉर्ड केजरीवाल को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। गुजरात विश्वविद्यालय ने सीआईसी के आदेश का कड़ा विरोध किया था। विश्वविद्यालय ने कहा था कि किसी व्यक्ति की "गैर-जिम्मेदाराना बचकानी जिज्ञासा" आरटीआई कानून के तहत जनहित नहीं बन सकती। मई 2016 में गुजरात विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एमएन पटेल ने बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 1983 में राजनीति विज्ञान में एमए की डिग्री 62.3 प्रतिशत अंकों के साथ बाहरी छात्र के रूप में पूरी की थी।
गुजरात विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर डिग्री से जुड़ी जानकारी डालने के साथ ही सीआईसी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसके बाद एकल पीठ ने सीआईसी के निर्देश को रद्द कर दिया था। अदालत ने सीआईसी के "न्यायिक सक्रियता" में जाने पर भी टिप्पणी की थी और केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का खर्च लगाया था। इसके बाद केजरीवाल ने एकल पीठ के फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी थी। मंगलवार को खंडपीठ ने उनकी अपील खारिज कर दी।
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मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। इसके साथ ही केजरीवाल पर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा गया।
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जुर्माने का आदेश बरकरार रख हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर अपीलकर्ता की ओर से उठाए गए किसी भी आधार पर चुनौती दिए गए फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई जा सकती। अपील इसी के साथ खारिज की जाती है।"
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गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 31 मार्च 2023 को केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआईसी के 2016 के निर्देश को रद्द कर दिया था। साथ ही केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का खर्च लगाया था। अदालत ने आरटीआई प्रावधानों के कथित दुरुपयोग को लेकर उनकी आलोचना भी की थी और उनके रवैये को गंभीरता से नहीं लेने वाला बताया था।
केजरीवाल के वकील ने दी क्या दलील?
अपील की सुनवाई के दौरान केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने के आधार पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि उनके मुवक्किल ने प्रधानमंत्री की डिग्री हासिल करने की मांग पर "लगातार जोर नहीं दिया" था, जबकि एकल पीठ ने इसके विपरीत टिप्पणी की थी।
सिंघवी ने यह भी दलील दी थी कि सीआईसी ने खुद यानी स्वत संज्ञान के आधार पर कार्यवाही शुरू की थी और एक औपचारिक आवेदन के बजाय एक पत्र के आधार पर केजरीवाल को प्रतिवादी बनाया गया था।
पीएम मोदी की डिग्री पर गुजरात विश्वविद्यालय ने दिया क्या जवाब?
गुजरात विश्वविद्यालय ने एकल पीठ के सामने कहा था कि प्रधानमंत्री की डिग्री पहले से ही ऑनलाइन उपलब्ध है। हालांकि, एकल पीठ के समक्ष दायर पुनर्विचार याचिका में केजरीवाल के वकीलों ने कहा था कि डिग्री कभी ऑनलाइन उपलब्ध कराई ही नहीं गई। अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया था।
केजरीवाल के वकील ने दलील दी थी कि अगर डिग्री वास्तव में ऑनलाइन उपलब्ध है, तो उसे आरटीआई कानून के दायरे में आना चाहिए और ऐसी स्थिति में इस मामले को आगे चलाने का आधार समाप्त हो जाना चाहिए। गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि केजरीवाल ने मामले को लगातार आगे बढ़ाया और संस्थान को बदनाम करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कीं।
मेहता ने अदालत से केजरीवाल पर जुर्माना लगाने की मांग करते हुए कहा था कि इससे आरटीआई कानून के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और सरकारी अधिकारियों का कामकाजी समय ऐसे अनुरोधों में नहीं लगेगा, जो कानून के उद्देश्य को पूरा नहीं करते।
क्या है पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ा पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2016 का है। उस समय केजरीवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक किए जाने की मांग की थी। अप्रैल 2016 में तत्कालीन सीआईसी एम श्रीधर आचार्युलु ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वे मोदी की डिग्रियों से जुड़ी जानकारी केजरीवाल को उपलब्ध कराएं।
इसके करीब तीन महीने बाद गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से हाईकोर्ट का रुख किए जाने पर अदालत ने सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी। सीआईसी का आदेश केजरीवाल के पत्र के एक दिन बाद आया था। केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा था कि उन्हें अपने बारे में सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि आयोग मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी क्यों "छिपाना" चाहता है।
आरटीआई कानून के तहत बचकानी जिज्ञासा :गुजरात विश्वविद्यालय
इसी पत्र के आधार पर सीआईसी ने गुजरात विश्वविद्यालय को पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े रिकॉर्ड केजरीवाल को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। गुजरात विश्वविद्यालय ने सीआईसी के आदेश का कड़ा विरोध किया था। विश्वविद्यालय ने कहा था कि किसी व्यक्ति की "गैर-जिम्मेदाराना बचकानी जिज्ञासा" आरटीआई कानून के तहत जनहित नहीं बन सकती। मई 2016 में गुजरात विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एमएन पटेल ने बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 1983 में राजनीति विज्ञान में एमए की डिग्री 62.3 प्रतिशत अंकों के साथ बाहरी छात्र के रूप में पूरी की थी।
गुजरात विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर डिग्री से जुड़ी जानकारी डालने के साथ ही सीआईसी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसके बाद एकल पीठ ने सीआईसी के निर्देश को रद्द कर दिया था। अदालत ने सीआईसी के "न्यायिक सक्रियता" में जाने पर भी टिप्पणी की थी और केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का खर्च लगाया था। इसके बाद केजरीवाल ने एकल पीठ के फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी थी। मंगलवार को खंडपीठ ने उनकी अपील खारिज कर दी।