ग्राउंड रिपोर्टः चंदौली- गांव की पगडंडियों पर दम तोड़ रहीं सेहत सुधार की योजनाएं
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- चंदौली के गांवों तक नहीं पहुंच पा रही हैं सुविधाएं
- कोरोना काल में नौनिहालों का न हुआ वजन, न पहुंच पा रहा पुष्टाहार
- जनप्रतिनिधि और शासन-प्रशासन की ओर से समस्याओं के निस्तारण के दावे खूब किए जाते हैं, लेकिन हकीकत जुदा है
- हकीकत दावे से कहीं दूर, कुपोषण के खिलाफ अमर उजाला का साझा अभियान
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विस्तार
महिलाओं और बच्चों की सेहत सुधारने की सरकारी योजनाएं कई चल रही हैं। जनप्रतिनिधि और शासन-प्रशासन की ओर से अंतिम पायदान तक इनके पहुंचने और समस्याओं के निस्तारण के दावे भी खूब किए जाते हैं। लेकिन हकीकत जुदा है। चंदौली जिले में अब भी ऐसी बहुत सी योजनाएं हैं, जो कागज पर तो सरपट दौड़ रहीं हैं, लेकिन गांवों की पगडंडियों तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती हैं। हम बात कर रहे हैं चंदौली जिले में कुपोषण मिटाने के लिए चल रहे सरकारी प्रयासों की।
चंदौली में महिला और बाल स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत जानने के लिए गांवों में पहुंचने पर कई चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। यहां पहाड़ी इलाकों में कई ऐसे गांव हैं, जहां चार पहिया वाहन की कौन कहे घरों तक बमुश्किल दोपहिया भी जा पाएगी। और तो और यहां रहने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में पता तक नहीं है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिकारियों के दावे में कितनी सच्चाई है।
कोरोना काल की ही बात करें तो पहाड़ों पर बसे कई गांवों में तो न तो नौनिहालों का वजन हुआ, न ही सेहत के बारे में किसी ने सुधि ली। पुष्टाहार भी तीन-चार महीनों से नहीं मिल पा रहा है। जैसे-तैसे लोग खुद और बच्चों का गुजर कर रहे हैं। यही कारण है कि जिले में कुपोषित बच्चों की संख्या 100-200 नहीं बल्कि पांच हजार के करीब है। बच्चों की तरह ही महिलाओं की सेहत की स्थिति भी ठीक नही है।
रक्षामंत्री के गांव के पास ही सुविधाओं का टोटा
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के गांव भभौरा के पास ही ग्राम पंचायत मुजफ्फरपुर के गांव डिबरीपर का हाल तो बेहद खराब है। यहां करीब 80 से अधिक परिवार रहते हैं, जिन्हें पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। लोगों ने बताया कि तीन-चार महीने से कोई हालचाल जानने भी नहीं आया है, सुविधाओं की तो बात ही दूर है। लोगों ने 14 अगस्त 2020 को जिलाधिकारी को शिकायती पत्र देकर पोषाहार, वजन, गृहभ्रमण, कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली सुविधाओं समेत छह सुविधाओं के न मिलने, आंगनबाड़ी के कार्यों से संतुष्ट न होने की शिकायत की थी।
इसमें कई लोगों के घरों में कुपोषित बच्चे भी हैं। इसके बाद जिला कार्यक्रम अधिकारी ने जांच भी कराई। हालत यह है कि चार महीने बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। शिकायत करने वालों में से एक चिंता देवी ने बताया कि घर में एक साल का पोता (बेटे का बेटा) है, जिसका तीन माह से न तो वजन हुआ है और न ही पुष्टाहार के नाम पर कुछ मिला है। यहां तक कि घर पर कोई हाल जानने कब आया था, यह भी याद नहीं है।
बच्चे करते हैं पुष्टाहार का इंतजार
चंदौली जिले के मुजफ्फरपुर में रहने वाली एक महिला ने बताया कि करीब तीन माह से किसी ने कोई सुधि नहीं ली है। मजदूरी कर किसी तरह पति पांच बच्चों सहित परिवार का भरण-पोषण करते हैं। एक बच्ची बहुत ही कमजोर है। आंगनबाड़ी केंद्र की अगर बात करें तो लॉकडाउन के बाद नवंबर में ही दो किलो चावल, दो किलो गेहूं, एक पाव दाल मिला, इसके पहले किसी को कुछ नहीं मिला। यहां तक कि बच्चों को भी पुष्टाहार का इंतजार रहता है। सुविधाओं के बारे में कोई पूछने तक नहीं आता है।
नौ महीने में पुनर्वास केंद्र पहुंचे महज 19 अतिकुपोषित बच्चे
चंदौली जिले में संयुक्त जिला चिकित्सालय में कुपोषित बच्चों को भर्ती करने के लिए बने पोषण पुनर्वास केंद्र का हाल यह है कि यहां अप्रैल से दिसंबर यानी नौ महीने में केवल 19 अतिकुपोषित बच्चे ही पहुंच सके हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों की सेहत को लेकर जिला प्रशासन, बाल विकास विभाग और खुद स्वास्थ्य विभाग कितना संजीदा है।
दस बेड वाले केंद्र में 20 दिसंबर को चार बच्चे भर्ती मिले, जिसमें दो एक ही परिवार के हैं। इस तरह की स्थिति तब है जब बच्चों के सेहत की मानीटरिंग के लिए ब्लॉकवार राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों के सेहत की जांच और जरूरत पड़ने पर उन्हें एनआरसी तक भिजवाना है। एक ओर जहां पुनर्वास केंद्र में बच्चे नहीं आ रहे हैं वहीं दूसरी ओर गांवों में पोषण संबंधी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
पुनर्वास केंद्र में इनका चल रहा इलाज
अंशिका (3 साल)- चकिया के मुड़हुआ उत्तरी निवासी रितेश विश्वकर्मा की बेटी अंशिका का वजन 9.700 किलोग्राम रहा जो कि 12.600 किलोग्राम होना चाहिए। सात दिसंबर से ही एनआरसी में भर्ती है।
श्रेया (18 माह)- रितेश विश्वकर्मा की दूसरी बेटी श्रेया भी अतिकुपोषित है। इसका वजन 6.400 किलोग्राम है जबकि मानक के अनुसार 8.400 किलोग्राम होना चाहिए।
सती (साढ़े तीन साल)- नियमताबाद के शिवनाथपुर निवासी बेचु की बिटिया सती भी 16 दिसंबर से ही एनआरसी में भर्ती है। चिकित्सकों के अनुसार इसका वजन 7.620 किलोग्राम है जबकि 9.700 किलोग्राम मानक है।
अनुष्का (15 माह)- सकलडीहा निवासी राहुल की बेटी अनुष्का भी अतिकुपोषित है। 18 दिसंबर को जब भर्ती कराया गया तो उसका वजन 5.680 किलोग्राम रहा जो कि मानक के अनुसार 7.500 ग्राम होना चाहिए।
स्वयंसेवी संस्था ने रुकवाया बाल विवाह
चकिया ब्लॉक में बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण के साथ ही गर्भवती महिलाओं के सेहत को लेकर काम करने वाले रोजा संस्थान के सदस्य लगातार पोषण की अलख जगाने के साथ ही बाल विवाह रुकवाने में लगे हैं। स्वयंसेवी संस्था की पहल पर ही लॉकडाउन में 18 साल से कम उम्र के तीन बच्चियों का बाल विवाह भी रुका। संस्था के मुख्य कार्यकारी मुश्ताक अहमद ने बताया कि फिरोजपुर सिताबे में 14 साल की एक बच्ची की शादी 20 जून, 15 साल की बच्ची की 27 जून और 16 साल की बच्ची जिसकी शादी 30 जून को तय थी। जानकारी मिलने के बाद पुलिस को इसकी सूचना दी गई, जिसके बाद तीनों बच्चियों की शादी रुक गई। अब लोग खुद जागरूक हो गए हैं।
नक्सलवाद खत्म, जगा रहे शिक्षा की अलख
चंदौली जिले के नौगढ़ विधानसभा क्षेत्र में एक गांव ऐसा है, जो कभी नक्सलवादियों के गढ़ के रूप में जाना जाता था। हम बात कर रहे हैं जमसोती गांव की। शाम की बात कौन करे, इस गांव के रास्ते पर दोपहर बाद भी कोई जाने में डरता था। अब नक्सलवाद यहां खत्म हो गया है। इसकी सूचना भी पुलिस प्रशासन की ओर से गांव के प्रवेश द्वार पर ही लगवाई गई है कि नक्सलवाद अब नहीं है।
जमसोती पहुंचने के बाद जो दृश्य देखने को मिला, वह बहुत प्रेरणादायक लगा। यहां प्राथमिक विद्यालय जमसोती के परिसर में दो शिक्षक, एक महिला शिक्षामित्र कॉपी-किताब सहित अन्य कागजातों के साथ बैठे मिले। उनसे बात करने की कोशिश की गई तो पहले तो कतराते रहे, बाद में शिक्षक ने जो बात बताई, वो बहुत ही रोचक कहानी थी।
सहायक अध्यापक सतीश कुमार और इनके साथ मौजूद रामअजोर ने बताया कि पूरे कोरोना काल में इस गांव में कभी बच्चों की पढ़ाई बंद नहीं हुई है। मोबाइल का नेटवर्क भले ही आता जाता रहा हो, लेकिन बच्चों के अभिभावकों के मोबाइल पर बच्चों का होमवर्क भेजा जा रहा है। बच्चे भी पढ़ाई के प्रति बहुत संजीदा है। अपना होमवर्क करने के बाद अभिभावकों के माध्यम से स्कूल तक या मोबाइल पर भिजवा रहे हैं। शिक्षकों ने बताया कि मोहल्ला पाठशाला के माध्यम से शिक्षा की अलख जगाने का जो बीड़ा उठाया है, उसमें अभिभावकों के साथ ही बच्चों का बहुत सहयोग मिल रहा है।
इन समस्याओं का समाधान है जरूरी
- बच्चों में कुपोषण
- महिलाओं में खून की कमी
- गर्भावस्था के दौरान कम वजन
- जन्म के समय बच्चों का कम वजन
- कम अंतराल में प्रसव
- टीकाकरण आदि सेवाओं का लाभ न मिलना
एक नजर में आंकड़ा (नवंबर 2020 तक)
- पांच साल तक के बच्चे-190644
- कुपोषित बच्चे-4967
- कुपोषण से सुधार-765
- नवंबर में कुपोषित मिले नए बच्चे-104
- नवंबर में अतिकुपोषित मिले बच्चे-16
जिला कार्यक्रम अधिकारी चंदौली, नीलम मेहता का कहना है कि 'कुपोषित बच्चों की सेहत की लगातार मानीटरिंग की जा रही है। ब्लॉक स्तर पर समीक्षा में भी इसी पर मंथन होता है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों की सेहत को सुधारा जाए। अब सुपोषण के लिए मिलने वाला दलिया भी बंद हो गया है। नए निर्देश के तहत बच्चों को घी-पावडर वाला दूध देने योजना है, जिसकी शुरुआत जल्द ही कर दी जाएगी। जिन ब्लॉकों में ज्यादा समस्या है, वहां विशेष अभियान चलाकर बच्चों की सेहत की जांच कर उन्हें हर संभव सुविधाए मुहैया कराई जाएगी।'
पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित, अतिकुपोषित बच्चों को भर्ती करने, उनका वजन लेने, खानपान आदि की सभी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। कोरोना काल में अस्पताल एल टू श्रेणी का कोविड अस्पताल बना है। इस वजह से पुनर्वास केंद्र तक बच्चे नहीं आ पा रहे थे। अब बच्चों की भर्ती शुरू की गई है। इसके अलावा स्वास्थ्य केंद्र वार कुपोषित बच्चों की निगरानी करते रहने का निर्देश भी दिया गया है। -डॉ. आरके मिश्रा, सीएमओ