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बाजार में एक ब्रांडनेम से बिक रहे अलग-अलग सॉल्ट, पेशेंट्स हो रहे साइड इफैक्ट्स से परेशान

Thu, 29 Nov 2018 07:43 PM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
हरेन्द्र, नई दिल्ली Updated Thu, 29 Nov 2018 07:43 PM IST
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Pharmaceutical companies selling different salt from a brand name
डेमो - फोटो : डेमो
देश में कई दवा कंपनियां एक ब्रांड नेम या मिलते-जुलते नामों से अलग-अलग साल्ट बेच रही हैं, इससे मरीजों तो कन्फ्यूज हैं ही, साथ ही मेडिकल स्टोर और डॉक्टर भी परेशान हैं। गलत साल्ट खाने से मरीजों को कई तरह के साइड इफैक्ट्स से जूझना पड़ रहा है। वहीं डॉक्टर एसोसिएशन इसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और मौजूदा कॉपी राइट एक्ट का सरेआम उल्लंघन बता रहे हैं।
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मेडजोल' ब्रांडनेम कई कंपनियों के पास

वैशाली के हंस मेडिकोज के मालिक प्रमोद बंसल बताते हैं कि जब ब्रांड नेम एक ही होंगे, तो वे भी कुछ नहीं कर सकते। बाजार में कई ऐसे ब्रांड हैं, जिनका उच्चारण एक ही है, लेकिन अलग बीमारियों में इस्तेमाल होते हैं। वह बताते हैं कि 'मेडजोल' ब्रांडनेम एक है, लेकिन कई कंपनियां इसी ब्रांडनेम से अलग-अलग बिमारियों में इस्तेमाल होने वाले साल्ट जैसे इट्राकोनाजोल, इसोमेप्राजोल, मेट्रोनिडाजोल, अल्बेंडाजोल और पेंटोप्राजोल बेचती हैं। वहीं 'ब्रोमोलिन' एंटीबायोटिक को श्वास संबधी बीमारी में प्रयोग किया जाता है, तो 'ब्रोमोटिन' का इस्तेमाल पार्किसन बीमारी के इलाज में करते हैं। वह बताते हैं कि अगर कोई गलती से ये दवाएं खा ले तो उसे कई साइड इफैक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है।
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बने एक साल्ट, एक ब्रांडनेम और एक कीमत की नीति

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अश्विनी गोयल कहते हैं कि यह पेशेंट्स के लिए सुसाइड करने जैसा है। खुद उन्हें भी ऐसी कई शिकायतें मिली हैं। सरकार को एक साल्ट, एक ब्रांडनेम और एक कीमत की नीति बनानी चाहिए। वह कहते हैं कि पहले डॉक्टर दवा लिखने के बाद पेशेंट से दवा दिखाने के लिए कहते थे, लेकिन लोगों ने उसे गलत अर्थ में लिया। वहीं डॉक्टर के पास भी इतना वक्त नहीं है कि वह हर पेशेंट की दवा चेक करे। गोयल के मुताबिक सरकार को तुरंत एक ब्रांड नेम के तहत अलग-अलग सॉल्ट बेचने वाली कंपनियों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, सरकार को रजिस्टर्ड ब्रांड नेम का एक डेटाबेस तैयार करना चाहिए।
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साइड इफैक्ट्स से परेशान मरीज

सरकारी अधिकारी रहे दिल्ली के जनकपुरी इलाके में रहने वाले 65 वर्षीय हिमांशु कर्णवाल  (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि वे काफी समय से गैस-एसिडिटी की समस्या से परेशान थे। समस्या बढ़ जाने पर डॉक्टर उन्हें एक हफ्ते का कोर्स लेने की सलाह दी। लेकिन फायदा मिलने की बजाए उल्टे उनके शरीर में कई जगह चकते पड़ने और पेट दर्द की शिकायत की। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें किसी दवा का साइड इफैक्ट हुआ है। दवाई चेक करने पर पता चला कि डॉक्टर ने गैस, अल्सर और एसिडिटी के लिए मेडजोल दवा लिखी थी, जिसमें इसोमेप्राजोल साल्ट होता है। लेकिन वे इसी ब्रांडनेम से बिकने वाली दूसरी दवा खा रहे थे, जिसमें एंटी-फंगल इन्फैक्शन के लिए प्रयोग होने वाला इट्राकोनाजोल साल्ट होता है।

आइमोसैक की जगह आइसोमैक

डीएमए अध्यक्ष का कहना है कि एक ब्रांडनेम के साथ, एक उच्चारण वाले ब्रांडेनेम भी बड़ी समस्या हैं। 'आइमोसैक' दवा की जगह अकसर कैमिस्ट 'आइसोमैक' दवा दे देते हैं, इनमें एक गैस्ट्रो मेडिसिन है तो दूसरी कॉर्डियक दवा है। केमिस्ट शॉप पर बी.फार्मा या डी.फार्मा का न होना भी बड़ी वजह है। डॉ. गोयल का कहना है कि अगर वे जैनरिक नाम से दवा लिखते हैं, तो केमिस्ट की मोनोपॉली हो जाएगी और वह महंगी दवाएं पेशेंट्स को देंगे।

सरकार बना रही मैकेनिज्म 

केंद्रीय दवा नियंत्रण संगठन के सूत्रों का कहना है कि उनके पास भी लगातार ऐसी शिकायतें आ रही हैं और वे इसके लिए मैकेनिज्म तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि समस्या गंभीर हो चुकी है और पूरे देश इससे जूझ रहा है। उन्होंने बताया कि इससे न केवल पेशेंट परेशान हो रहे हैं, बल्कि केमिस्ट और डॉक्टर भी इससे अछूते नहीं हैं। उन्होंने बताया कि सरकार को उन्होंने एक सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस बनाने का सुझाव दिया है, ताकि पहले से रजिस्टर्ड ब्रांडनेम को दूसरी कंपनियां इस्तेमाल न कर सकें।
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