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Hindi News ›   India News ›   PETA said that we are looking for legal remedies After Supreme Court's decision on Jallikattu and Kambala

Jallikattu: 'जल्लीकट्टू-कंबाला पर फैसला जानवरों को पीड़ा देने वाला, कानूनी उपाय तलाश रहे', PETA का बड़ा बयान

Thu, 18 May 2023 04:29 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 18 May 2023 04:29 PM IST
सार

पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) के नेतृत्व में पशु अधिकार समूहों ने इन प्रथाओं को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। पीपुल फॉर एनिमल्स (पीएफए) की ट्रस्टी गौरी मौलेखी ने भी शीर्ष कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जल्लीकट्टू, कंबाला और इस तरह की अन्य प्रथाएं जानवरों के लिए अनावश्यक पीड़ा के अलावा कुछ नहीं हैं।  
 

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PETA said that we are looking for legal remedies After Supreme Court's decision on Jallikattu and Kambala
कंबाला रेस - फोटो : ट्विटर

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जल्लीकट्टू या इरुथाझुवुथल- कम्बाला  पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस कानून को वैध करार दिया है, जिसमें जलीकट्टू को एक खेल के तौर पर मान्यता दी गई है। शीर्ष कोर्ट के आदेश के बाद जानवरों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा इंडिया ने निराशा जताई है। पेटा इंडिया ने शीर्ष कोर्ट के आदेश पर कहा कि वह सांडो और भैंसों को वश में करने वाले खेल को रोकने के लिए कानूनी उपायों पर विचार करेगी और आगे उन्हीं के मुताबिक काम करेगी। इस दौरान पेटा ने कहा कि यह जानवरों के साथ क्रूरता है और इस शर्मनाक खेल को बंद किया जाना चाहिए। 

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शीर्ष अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पेटा इंडिया ने विभिन्न रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा कि तमिलनाडु सरकार ने 2017 में जल्लीकट्टू की अनुमति दी थी। इस खेल में राज्य भर में कम से कम 33 बैल और 104 लोग मारे गए हैं। इतना ही नहीं 8,388 लोग घायल हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि इतना ही नहीं कई सांडों की मौत और मनुष्यों को लगी चोटों की सूचना नहीं दी गई है। ऐसे में यह आंकड़े संभावित रूप से बहुत कम हैं। 
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गौरतलब है कि पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) के नेतृत्व में पशु अधिकार समूहों ने इन प्रथाओं को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। मामले में अन्य याचियों नें भी इस फैसले की निंदा की है। पीपुल फॉर एनिमल्स (पीएफए) की ट्रस्टी गौरी मौलेखी ने भी शीर्ष कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जल्लीकट्टू, कंबाला और इस तरह की अन्य प्रथाएं जानवरों के लिए अनावश्यक पीड़ा के अलावा कुछ नहीं हैं।  
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उन्होंने कहा कि हम आज के फैसले से बहुत निराश हैं। संस्कृति की आड़ में नैतिकता से समझौता नहीं किया जा सकता है। एक ही अदालत संस्कृति की अलग-अलग व्याख्या करती है। जल्लीकट्टू के आयोजनों में लोगों को मौत के घाट उतारना अदालत को एक अनमोल परंपरा की तरह लगता है, जिसे वे संरक्षित करना चाहते हैं।  

अदालत ने दिया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस कानून को वैध करार दिया है, जिसमें जलीकट्टू को एक खेल के तौर पर मान्यता दी गई है। कोर्ट ने कहा है कि तमिलनाडु का जानवरों के साथ क्रूरता कानून (संशोधन), 2017 जानवरों को होने वाले दर्द और पीड़ा को काफी हद तक कम कर देता है। गौरतलब है कि जल्लीकट्टू, जिसे इरुथाझुवुथल भी कहा जाता है, सांडों के साथ खेला जाने वाला खेल है, जिसका आयोजन पोंगल में फसलों की कटाई के दौरान किया जाता है। 


सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस केएम जोसेफ के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने एकमत से निर्णय सुनाते हुए महाराष्ट्र में होने वाली बैलगाड़ी की दौड़ों की मान्यता भी बरकरार रखी। पांच जजों की पीठ के अन्य जजों में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे। 

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