नकारात्मक समानता का दावा नहीं ठोक सकते लोग: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समानता के अधिकार को नकारात्मक समानता के तौर पर नहीं देखा जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अगर गैरकानूनी तरीके से या किसी गलती की वजह से किसी को फायदा पहुंचा हो तो इसका कतई यह मतलब नहीं है कि कोई व्यक्ति समानता का हवाला देकर अपना भी दावा ठोके।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर और न्यायमूर्ति आर भानूमति की पीठ ने पंजाब लोक सेवा (न्यायिक शाखा) में सफल रहे तीन छात्रों को किसी तरह की राहत न देते हुए ये टिप्पणी की है। ये तीनों छात्रों का कहना था कि तीन अभ्यर्थियों द्वारा नौकरी ज्वाइन न करने केकारण खाली पड़े पद पर उनकी नियुक्ति की जानी चाहिए, क्योंकि वे मेरिट लिस्ट में ठीक उनसे नीचे थे।
इन तीनों छात्रों ने पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था लेकिन वहां से राहत न मिल पाने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इन छात्रों का कहना था कि हाईकोर्ट के फैसले में त्रुटि है।
तीन पद रह गए खाली
वर्ष 2007 में 52 पदों के लिए विज्ञापन जारी किए गए थे। इनमें से 27 पद अनारक्षित जबकि 25 पद आरक्षित थे। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद सामान्य वर्ग से 27, पिछड़ा वर्ग से पांच और अनुसूचित जाति से 10 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया। इन सभी को नियुक्त कर लिया गया। कुछ बाकी पद भरे नहीं जा सके इसलिए आठ पदों को अनारक्षित कर दिया गया।
इनमें से सात लोगों का चयन सामान्य वर्ग से जबकि एक का चयन पिछड़े वर्ग से किया गया। मेरिट लिस्ट के आधार पर इनका चयन किया गया। लेकिन सामान्य वर्ग के तीन अभ्यर्थियों ने ज्वाइन नहीं किया, जिस कारण तीन पद खाली रह गए। याचिकाकर्ता इन तीनों अभ्यर्थियों का कहना था कि मेरिट लिस्ट में अब उन सभी का नंबर आता है। लिहाजा खाली पड़े तीन पदों पर उन्हें नियुक्ति मिलनी चाहिए। लेकिन पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट याचिकाकर्ता तीन छात्रों को राहत देने से इनकार कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-14 नाकारात्मक समानता की बात नहीं करता। सिर्फ इसलिए कि कुछ व्यक्तियों को अवैध या गलती से फायदा मिल गया हो तो कोई अन्य उसका हवाला देते हुए समानता की बात नहीं कह सकता।