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Hindi News ›   India News ›   Pellet Gun Controversy: What Is a Pellet Gun, and When and Where Can It Be Used?

Explainer: जिस पैलेट गन के चलाने पर मचा है बवाल, वो होती क्या है, कब और कहां हो सकता है इसका इस्तेमाल?

Sat, 25 Jul 2026 06:15 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sat, 25 Jul 2026 06:15 AM IST
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सार
दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शन के बाद पैलेट गन एक बार फिर चर्चा में है। प्रदर्शनकारियों की चोटों को लेकर इसके इस्तेमाल के आरोप लगे हैं, जबकि दिल्ली पुलिस ने इससे इनकार किया है। ऐसे में पैलेट गन क्या होती है, भारत में इसका इस्तेमाल कब शुरू हुआ, इसे कौन चला सकता है और भीड़ नियंत्रण के दौरान बल प्रयोग को लेकर कानून और नियम क्या कहते हैं? इस एक्सप्लेनर में इन्हीं सवालों के जवाब जानेंगे।
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Pellet Gun Controversy: What Is a Pellet Gun, and When and Where Can It Be Used?
पैलेट गन - फोटो : AI

विस्तार

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पैलेट गन को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने एक प्रदर्शनकारी को मीडिया के सामने पेश किया, जिसके शरीर पर छर्रे लगने का दावा किया गया। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है। 


इस विवाद के बीच सवाल उठता है कि आखिर पैलेट गन क्या होती है? इससे किस तरह के छर्रे निकलते हैं? भारत में इसका इस्तेमाल कब शुरू हुआ? भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इसके इस्तेमाल को लेकर क्या नियम हैं? कौन इसका इस्तेमाल कर सकता है? कब किस परिस्थिति में किन हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है? आइये जानते हैं...

क्या है ताजा मामला?

राहुल गांधी ने 20 जुलाई को दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। एक प्रेस वार्ता में उन्होंने 19 वर्षीय घायल छात्र साहिल का मामला उठाया। राहुल ने दावा किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से चलाई गई पैलेट गन से साहिल के चेहरे पर गंभीर चोट लगी। उन्होंने दावा किया कि चोट इतनी गंभीर है कि साहिल की एक आंख की रोशनी स्थायी रूप से जाने का खतरा है। वहीं, सोशल मीडिया पर कई प्रदर्शनकारी दावा कर रहे हैं कि पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया और वे गंभीर रूप से घायल हो गए हैं।

इन आरोपों के जवाब में दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर फैक्ट चेक जारी किया। पुलिस ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने का दावा पूरी तरह से झूठा और भ्रामक है। दिल्ली पुलिस के पास न तो पैलेट गन है और न ही वे इनका इस्तेमाल करते हैं। 

क्या होती है पैलेट गन?

पैलेट गन एक ऐसा हथियार है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में छोटे-छोटे धातु के छर्रे निकलते हैं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, शॉटगन के एक कारतूस में करीब 500 से 600 पैलेट हो सकते हैं। ये छोटी बॉल बेयरिंग जैसे दिखाई देते हैं। ये छर्रे लेड यानी सीसे की मिश्रधातु से बने होते हैं। फायर किए जाने पर ये तेज रफ्तार से निकलते हैं और एक बड़े इलाके में फैल जाते हैं। यही वजह है कि एक निश्चित दूरी के बाद यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि छर्रे किस दिशा में जाएंगे और किस व्यक्ति को लगेंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक, सीमित दूरी के बाद इन छर्रों की दिशा को ठीक तरीके से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसी कारण पैलेट गन की सटीकता और इससे होने वाली चोटों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

पैलेट गन
पैलेट गन - फोटो : अमर उजाला

भारत में कहां से आई पैलेट गन?

भारत में शुरुआत में पैलेट गन विदेशों से मंगाई गई थीं। 1992 में सीआरपीएफ की दंगारोधी इकाई रैपिड एक्शन फोर्स यानी आरएएफ की स्थापना के बाद इस्राइल और बेल्जियम से पैलेट गन खरीदी गईं। उस समय एक पैलेट गन की कीमत करीब तीन लाख रुपये थी। बाद में डीआरडीओ की मदद से इनका निर्माण देश में ही शुरू किया गया। शुरुआत में एक शेल दागने वाली गन बनाई गई थी। 2011 में इसे बढ़ाकर छह बैरल तक कर दिया गया।

एक बार में कितने छर्रे दागे जा सकते हैं?

मल्टी बैरल लॉन्चर में छह से आठ शेल लगाए जा सकते हैं। एक शेल से करीब 30 छर्रे निकलते हैं। इस तरह छह शेल इस्तेमाल किए जाएं तो बहुत कम समय में 180 से ज्यादा छर्रे दागे जा सकते हैं। इसका इस्तेमाल केवल आरएएफ कर सकती है। आरएएफ की 15 बटालियन हैं। एक बटालियन में करीब 100 पैलेट गन होती हैं। एक बटालियन में 1,300 से ज्यादा जवान होते हैं।

पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल उठे तो सरकार ने क्या किया?

पैलेट गन से होने वाली गंभीर चोटों और इसके इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों के बाद केंद्र सरकार ने 26 जुलाई 2016 को एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। इस समिति को पैलेट गन के दूसरे संभावित विकल्प तलाशने की जिम्मेदारी दी गई। समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इसके बाद उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए कई कदम उठाए गए।

सरकार ने संसद में बताया कि हिंसक और गैरकानूनी भीड़ को हटाने के दौरान पैलेट गन से पहले PAVA-Chilli शेल और ग्रेनेड, STUN-LAC शेल और ग्रेनेड व टियर स्मोक शेल जैसे साधनों का इस्तेमाल किया जाता है।

क्या सीधे पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है?

  • सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, पैलेट गन का इस्तेमाल बेहद गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए और अत्यधिक सावधानी के साथ किया गया है।
  • गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी अपनाई है। इसके मुताबिक कम घातक हथियारों का इस्तेमाल तय बल-प्रयोग नीति के अनुसार किया जाना चाहिए।
  • इसका मकसद शांति बहाल करना और हिंसक गैरकानूनी भीड़ को हटाना है। साथ ही कोशिश यह होनी चाहिए कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जितना जरूरी हो, उतना ही बल इस्तेमाल किया जाए और कम से कम लोग हताहत हों। इस दौरान सुरक्षा बलों और आम नागरिकों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • बल प्रयोग के क्रम में रबर और प्लास्टिक की गोलियों जैसे विकल्पों का भी प्रावधान है।

पैलेट गन
पैलेट गन - फोटो : Amar Ujala

क्या पैलेट गन चलाने वाले जवानों को ट्रेनिंग भी दी जाती है?

सरकार के अनुसार, कम घातक हथियारों और गोला-बारूद के इस्तेमाल के लिए सुरक्षाकर्मियों को तीन दिन की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें दंगा नियंत्रण की थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के साथ हथियारों और उपकरणों के इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा कानून-व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों से निपटने और कम घातक हथियारों से फायरिंग का अभ्यास भी कराया जाता है।

इंसानी शरीर पर पैलेट के असर की जांच कैसे होती है?

पैलेट गन और लेड आधारित छर्रों के असर का परीक्षण चंडीगढ़ स्थित टीबीआरएल में किया गया था। इसके लिए बैलिस्टिक ग्रेड के पारदर्शी जिलेटिन ब्लॉक का इस्तेमाल किया गया। इन ब्लॉक को इस तरह तैयार किया जाता है कि गोली या छर्रा लगने पर इनकी प्रतिक्रिया कुछ मामलों में इंसानी शरीर के ऊतकों जैसी हो। इनमें लचीलापन, ऊर्जा सोखने की क्षमता और मजबूती जैसे पहलुओं को देखा जाता है। हालांकि, पैलेट की खरीद, उनके परीक्षण और चयन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व इन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। सरकार ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया।

कानून
कानून - फोटो : Amar Ujala

अब जानें, भीड़ को हटाने के लिए कानून क्या कहता है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 में गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए बल के इस्तेमाल का प्रावधान है। इसके मुताबिक कोई कार्यकारी मजिस्ट्रेट, पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी या उसकी गैरमौजूदगी में कम से कम सब-इंस्पेक्टर रैंक का पुलिस अधिकारी किसी गैरकानूनी भीड़ को वहां से हटने का आदेश दे सकता है। यह नियम पांच या उससे ज्यादा लोगों की ऐसी भीड़ पर भी लागू होता है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो।

अगर आदेश दिए जाने के बावजूद भीड़ नहीं हटती या उसके व्यवहार से लगता है कि वह हटने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे बल प्रयोग करके हटाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर भीड़ में शामिल लोगों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है।

भीड़ नियंत्रण
भीड़ नियंत्रण - फोटो : Amar Ujala

सशस्त्र बलों को कब बुलाया जा सकता है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 149 में सशस्त्र बलों की मदद से भीड़ को हटाने की व्यवस्था है। अगर धारा 148 के तहत किसी भीड़ को दूसरे तरीकों से हटाना संभव नहीं हो और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए उसे हटाना जरूरी हो, तो जिला मजिस्ट्रेट या उसकी ओर से अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की मदद ले सकता है।

मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों के अधिकारी को भीड़ हटाने और जरूरत के मुताबिक लोगों को गिरफ्तार करने के लिए कह सकता है। हालांकि, कानून में यह भी साफ किया गया है कि ऐसा करते समय जितना संभव हो उतना कम बल इस्तेमाल किया जाए और लोगों तथा संपत्ति को कम से कम नुकसान पहुंचे।

भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस के पास और क्या विकल्प हैं?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2017 में राज्यसभा में बताया था कि पुलिस राज्य का विषय है। इसलिए पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है।

हालांकि, केंद्र सरकार पुलिस बलों को आधुनिक बनाने की योजना के तहत राज्यों को कई तरह के सुरक्षा और दंगारोधी उपकरण खरीदने के लिए सहायता देती है। इनमें दंगारोधी उपकरण, फुल बॉडी प्रोटेक्टर, बुलेट रेजिस्टेंट जैकेट और हेलमेट, टियर गैस, पीएवीए शेल और चिली वाटर कैनन शामिल हैं। इसी तरह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को भी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने के लिए सहायता दी जाती है। जवानों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए ट्रेनिंग और नियमित मॉक ड्रिल भी कराई जाती है।
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