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जासूसी कांड: राहुल भी जानते होंगे कि इस पर कब-कब आया है सियासी भूचाल, क्या रहा है देश की राजनीति में जासूसी का इतिहास?
Wed, 28 Jul 2021 03:25 PM IST
प्रतिभा ज्योति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 28 Jul 2021 03:25 PM IST
सार
पेगासस स्पाईवेयर के जरिए जासूसी कराने के मामले की जांच को लेकर पूरा विपक्ष एकजुट है। राहुल गांधी सरकार से सीधा सवाल कर रहे हैं। इतिहास देखें तो यह बात समझ में आती है कि जासूसी और भारतीय राजनीति का एक गठबंधन होने की बात हमेशा की जाती रही है।
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राहुल गांधी
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
पेगासस स्पाईवेयर के जरिए पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और नेताओं की कथित जासूसी को लेकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष सरकार पर हमलावर है। विपक्ष संसद चलने नहीं दे रहा। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इसे लेकर तीखे तेवर अपनाए हुए हैं, क्योंकि सरकार पर उनके भी फोन की जासूसी कराने के आरोप हैं। वे चाहते हैं कि सरकार संसद में इस पर जवाब दे और देश को बताए कि पेगासस के जरिए भारत में जासूसी कराई गई या नहीं।
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भारतीय राजनीति में जासूसी की यह बात नई नहीं है। इतिहास देखें तो यह बात समझ में आती है कि जासूसी और भारतीय राजनीति का एक गठबंधन होने की बात हमेशा की जाती रही है। फर्क इतना है कि जासूसी की तकनीक बदल गई है। नई-नई तकनीक आने से जासूसी कराने के तरीके भी बदल गए हैं। जासूसी कांड में कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी मुख्यमंत्रियों तक का नाम सामने आया। जासूसी के आरोपों की वजह से कभी केंद्र तो कभी राज्य की सरकारें तक गिर गईं।
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जासूसी कांड के कुछ प्रमुख किस्से
जब राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को अपने कमरे की जासूसी का शक हुआ
बात 1984 से 1987 की है। उस समय केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार थी और राष्ट्रपति थे ज्ञानी जैल सिंह। बताया जाता है कि उस समय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच कुछ मुद्दों को लेकर अनबन चल रही थी। उसी दौरान ज्ञानी जैल सिंह को यह शक हुआ था कि राष्ट्रपति भवन के कुछ कमरों की जासूसी हो रही है।
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हेगड़े को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा
1988 का यह मामला काफी सुर्खियों में रहा था। दरअसल कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े पर यह आरोप लगा कि वे अपने विरोधियों के फोन की टेपिंग करा रहे हैं। उस समय हेगड़े गैर कांग्रेसी नेताओं में काफी ताकतवर माने जाते थे। कहा ये भी जाता है कि हेगड़े प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते थे। जब उनके विरोधियों की फोन टेपिंग होने की बात सामने आई तो काफी हो-हंगामा मचा। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। मामले की जांच के आदेश दिए गए। जांच में यह बात सामने आई कि 50 से ज्यादा नेताओं और व्यापारियों के फोन रिकॉर्ड किए गए थे और यह आदेश कर्नाटक पुलिस के डीआईजी ने दिए थे। विवाद इतना बढ़ गया कि हेगड़े को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी
बात 1990 की है। लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद वीपी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वापस लेने के कारण गिर गई। चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल में टूट हुई और उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। तब चंद्रशेखर कांग्रेस के समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बने। एक दिन दस जनपथ के सामने हरियाणा सीआईडी के दो कांस्टेबल निगरानी करते हुए धरे गए। चंद्रशेखर पर यह आरोप लगा कि उन्होंने ओम प्रकाश चौटाला की मदद से राजीव गांधी की कथित तौर पर जासूसी कराई। इस घटना से चंद्रशेखर और राजीव गांधी के रिश्तों में तनाव आ गया। उसके बाद चंद्रशेखर ने संयुक्त संसदीय समिति से इस मामले की जांच कराने की पेशकश भी की, लेकिन कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। मजबूरन चंद्रशेखर को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी सरकार गिर गई। कहा गया कि राजीव गांधी की जासूसी की बात चौटाला के घर से लीक हुई थी। हालांकि, बाद में यह बात खत्म हो गई।
प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्रालय में जासूसी होने का था शक
यूपीए-दो में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तब प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी ने नॉर्थ ब्लॉक में हचलच मचा दी। प्रणब मुखर्जी ने इस बात का संदेह जताया कि उनके मंत्रालय की जासूसी हो रही है। उन्होंने इसकी गुप्त तरीके से जांच कराने की मांग की। शक की सुई उस समय गृह मंत्री रहे पी चिदंबरम की तरफ घूम रही थी क्योंकि दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर कुछ मुद्दों को लेकर विवाद था।
वीके सिंह पर भी लगा था विरोधियों पर नजर रखने का आरोप
केंद्रीय मंत्री और पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह भी जासूसी के आरोपों में घिर चुके हैं। उन पर ये आरोप लगे कि उन्होंने सेना के अंदर अपने विरोधियों पर नजर रखने के लिए जासूसी उपकरण लगवा दिए थे। हालांकि, सिंह ने इससे इनकार किया था और इस आरोप को साबित भी नहीं किया जा सका था।
गहलोत भी घिर चुके हैं
बीते साल राजस्थान में सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों के फोन टेपिंग कराने के मुद्दे ने भी राजस्थान में खूब तूल पकड़ा था। जब सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच मतभेद काफी बढ़ गए थे, तब सचिन पायलट ने अपने विधायकों के साथ बगावत की राह पकड़ ली थी। उस समय एक गहलोत गुट की तरफ से एक ऑडियो टेप की बात सामने आई, जिसमें भाजपा पर करोड़ों रुपये देकर कांग्रेस के विधायकों को खरीदने का आरोप लगा। हालांकि, भाजपा ने विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर की गई बात को गलत बताया। लेकिन गहलोत पर अपने ही नेताओं के फोन टेप कराने का आरोप लगा। पिछले महीने भी पायलट समर्थक एक विधायक वेदप्रकाश सोलंकी ने यह आरोप लगाया कि उनका फोन टेप हो रहा है।
येदियुरप्पा भी रहे विवादों में
इसी तरह कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर भी 2019 में फोन टेपिंग कराने का आरोप लग चुका है। 2019 में तब कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार चल रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी को यह शक था कि उनके कुछ विधायक भाजपा में जाने की कोशिश में हैं। उसी समय एक ऑडियो टेप सामने आया था, जिसमें कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि भाजपा कर्नाटक सरकार गिराने की साजिश रच रही है। इस ऑडियो में कांग्रेस की तरफ से कहा गया था कि येदियुरप्पा कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों से बात कर रहे हैं। ऑडियो टेप सामने आने के कुछ दिन बाद येदियुरप्पा और तीन लोगों के खिलाफ मामला भी दर्ज हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों बाद येदियुरप्पा की कर्नाटक में बन गई।
यह भी जानिए कि और किस-किस पर लगे थे जासूसी के आरोप
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर तत्कालीन संचार मंत्री रफी अहमद किदवई ने फोन टेपिंग के आरोप लगाए थे।
1962 में नेहरू सरकार के मंत्री टीटी कृष्णामाचारी ने भी कुछ इसी तरह का आरोप लगाया था।
1959 में सेना प्रमुख जनरल केएस थिमाया का यह आरोप था कि उनके और आर्मी ऑफिस के फोन टेप कराए गए हैं।
समाजवादी पार्टी के दिवंगत नेता अमर सिंह ने भी अपने फोन टेप होने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने अदालत मे जाकर इसे सार्वजनिक करने पर रोक लगा ली।
मांस निर्यातक मोइन कुरैशी के लैपटॉप जो आयकर अधिकारियों ने बरामद किया उससे ब्लैकबेरी मैसेज लीक होने के आरोप लगे। उस समय बीबीएम मैसेज को अभेद्य माना जाता था।