{"_id":"6742f592f661415cda017cda","slug":"parliamentary-panel-to-examine-issue-of-lateral-entry-news-update-2024-11-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lateral Entry: लेटरल एंट्री पर सियासी विवाद जारी, अब संसदीय समिति करेगी जांच; जानें पूरा मामला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Lateral Entry: लेटरल एंट्री पर सियासी विवाद जारी, अब संसदीय समिति करेगी जांच; जानें पूरा मामला
Sun, 24 Nov 2024 03:14 PM IST
काव्या मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: काव्या मिश्रा
Updated Sun, 24 Nov 2024 03:14 PM IST
सार
यूपीएससी ने अगस्त में अनुबंध के आधार पर लेटरल एंट्री मोड के माध्यम से भरने के लिए 45 पदों के लिए विज्ञापन दिया था। इसके विरोध में राहुल गांधी ने मोर्चा खोल दिया था। वहीं मोदी सरकार में शामिल लोजपा और जदयू जैसी पार्टियां भी विरोध में उतर आई थीं।
विज्ञापन
संसद भवन
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
केंद्र सरकार में जॉइंट सेक्रेटरी, डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर लेवल के 45 पद लेटरल एंट्री के जरिये भरने के लिए यूपीएससी ने विज्ञापन दिया था। इस विज्ञापन को आरक्षण के खिलाफ बताते हुए विपक्ष ने इस साल की शुरुआत में इसके विरोध में मोर्चा खोल दिया था। आखिरकार सरकार को लेटरल एंट्री का विज्ञापन रद्द करने को कहना पड़ा था। बढ़ते सियासी विवाद को देखते हुए अब इस पूरे मुद्दे की जांच संसदीय समिति करेगी।
विज्ञापन
लोकसभा सचिवालय द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार, कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति द्वारा 2024-25 में जांच के लिए चुने गए विषयों में सिविल सेवाओं में लेटरल एंट्री भी शामिल है।
विज्ञापन
इस साल अगस्त में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने अनुबंध के आधार पर लेटरल एंट्री मोड के माध्यम से भरने के लिए 45 पदों के लिए विज्ञापन दिया था, जिसमें संयुक्त सचिवों के 10 और निदेशकों एवं उप सचिवों के 35 पद शामिल थे। इसके विरोध में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोर्चा खोल दिया था। वहीं मोदी सरकार में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसी पार्टियां भी इसके विरोध में उतर आई थीं।
विज्ञापन
इन नेताओं ने भी की थी आलोचना
इसके अलावा, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) उम्मीदवारों के लिए आरक्षण नहीं होने की सरकार की नीति की आलोचना की थी। नतीजा ये हुआ कि सरकार को यूपीएससी चेयरपर्सन को पत्र लिखकर लेटरल एंट्री का विज्ञापन रद्द करने के लिए कहना पड़ा।
'इन नियुक्तियों के लिए वर्तमान में कोई कोटा लागू नहीं'
नौकरशाहों को आमतौर पर सिविल सेवा परीक्षा प्रक्रिया के माध्यम से भर्ती किया जाता है, लेकिन लेटरल प्रवेशकों, जो आमतौर पर किसी विशेष क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं, को सीमित अवधि के लिए सीधे शामिल किया जाता है। इन नियुक्तियों के लिए वर्तमान में कोई कोटा लागू नहीं है। अब तक 63 नियुक्तियां लेटरल एंट्री के माध्यम से की गई हैं।
2018 से लागू है लेटरल एंट्री योजना
पहले बात करते हैं लेटरल एंट्री योजना की। ऐसा नहीं है कि इस योजना के तहत पहली बार नियुक्तियां होने जा रही थीं। मोदी सरकार में साल 2018 में पहली बार इस योजना के तहत नियुक्तियां की गई थीं। तब से लेकर अब तक इस योजना के तहत 63 नियुक्तियां की गईं, जिनमें से 35 प्राइवेट सेक्टर से की गई। इस साल जुलाई तक लेटरल एंट्री के तहत नियुक्त गए 57 लोग अपने पदों पर काम कर रहे थे।
विपक्ष ने लगाया था आरक्षण छीनने की कोशिश का आरोप
मगर, इस बार यूपीएससी ने जैसे ही 17 अगस्त को इस योजना के तहत 45 नई नियुक्तियों के लिए विज्ञापन निकाला, राजनीतिक बवाल शुरू हो गया। लेटरल एंट्री के विरोध में विपक्षी दलों ने कहा कि चूंकि इन नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है इसलिए ये योजना सामाजिक न्याय के खिलाफ है और वंचित वर्गों को दरकिनार कर पिछले दरवाजे से भर्तियां करने की साजिश है। इस मसले पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा था कि लेटरल एंट्री दलितों, ओबीसी और आदिवासियों पर हमला है और संविधान को नष्ट करने और बहुजनों से आरक्षण छीनने का प्रयास है।