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क्या है सेलेक्ट कमेटी: जो बारीकी से जांचेगी आयकर बिल, विधेयक के साथ क्या होगा, बाकी समितियों से यह कितनी अलग?
Sat, 15 Feb 2025 08:19 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 15 Feb 2025 08:19 PM IST
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सेलेक्ट कमेटी के प्रमुख बैजयंत पांडा, कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा, जेडपीएम के वी. रिचर्ड।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 13 फरवरी को लोकसभा में आयकर विधेयक 2025 पेश किया। इसके जरिए केंद्र सरकार 63 साल पुराने आयकर अधिनियम को बदलने की तैयारी कर रही थी। हालांकि, विपक्ष के कुछ सवालों के बाद वित्त मंत्री ने इस विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का आग्रह किया। बताया गया है कि सेलेक्ट कमेटी संसद के अगले सत्र में विधेयक से जुड़ी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह सेलेक्ट कमेटी क्या है, जो आयकर विधेयक की समीक्षा करेगी? यह समिति बिल के साथ क्या-क्या कर सकती है? इसके अलावा सेलेक्ट समिति संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और स्टैंडिंग समिति से कितनी अलग होती है? आइये जानते हैं...
क्या होती है सेलेक्ट कमेटी?
भारतीय संसद में कई तरह की समितियां होती हैं, जो कि अलग-अलग कार्यों के लिए गठित होती हैं। इनमें से कुछ समितियां स्थायी होती हैं, जो कि अहम विभागों से जुड़े मसलों पर मुद्दों की समीक्षा करती हैं। यह समितियां स्थायी होती हैं, हालांकि इनके सदस्यों को बदला जा सकता है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में इन्हें स्टैंडिंग कमेटी कहा जाता है। फिलहाल ऐसी 12 समितियां हैं, जो कि स्थायी हैं।
दूसरी तरफ कुछ समितियां अस्थायी यानी एडहॉक होती हैं। इन्हें आमतौर पर किसी खास मुद्दे की समीक्षा के लिए गठित किया जाता है। जैसे किसी विधेयक की जांच और समीक्षा के लिए। इस तरह की अस्थायी समितियों को इनका काम पूरा हो जाने के बाद भंग कर दिया जाता है। सेलेक्ट कमेटी इसी तरह की समितियों में शामिल होती है। चूंकि, यह अस्थायी होती हैं, इसलिए इनका गठन और काम की प्रक्रिया संसद के 'प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों' के तहत किया जाता है।
भारतीय संसद में कई तरह की समितियां होती हैं, जो कि अलग-अलग कार्यों के लिए गठित होती हैं। इनमें से कुछ समितियां स्थायी होती हैं, जो कि अहम विभागों से जुड़े मसलों पर मुद्दों की समीक्षा करती हैं। यह समितियां स्थायी होती हैं, हालांकि इनके सदस्यों को बदला जा सकता है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में इन्हें स्टैंडिंग कमेटी कहा जाता है। फिलहाल ऐसी 12 समितियां हैं, जो कि स्थायी हैं।
दूसरी तरफ कुछ समितियां अस्थायी यानी एडहॉक होती हैं। इन्हें आमतौर पर किसी खास मुद्दे की समीक्षा के लिए गठित किया जाता है। जैसे किसी विधेयक की जांच और समीक्षा के लिए। इस तरह की अस्थायी समितियों को इनका काम पूरा हो जाने के बाद भंग कर दिया जाता है। सेलेक्ट कमेटी इसी तरह की समितियों में शामिल होती है। चूंकि, यह अस्थायी होती हैं, इसलिए इनका गठन और काम की प्रक्रिया संसद के 'प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों' के तहत किया जाता है।
लोकसभा 'प्रक्रिया और कार्य संचालन' के नियम 118 के तहत कोई भी सदस्य विधेयक में संशोधन के लिए विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाने का आग्रह कर सकता है। लोकसभा के नियम 298 के मुताबिक, विधेयक पर सेलेक्ट कमेटी का गठन संबंधित सदन द्वारा किया जाता है, जब उस विधेयक को लाने वाले/वाली मंत्री या कोई और सदस्य इससे जुड़ा प्रस्ताव आगे बढ़ाता है और प्रस्ताव को सदन की मंजूरी मिलती है।
सेलेक्ट कमेटी में कौन-कौन शामिल?
आमतौर पर इस तरह की सेलेक्ट कमेटियों में उसी सदन के सदस्यों को शामिल किया जाता है, जिस सदन में विधेयक पेश होता है। हालांकि, दूसरे सदन के सदस्य इन सेलेक्ट कमेटियों की कार्यवाही देख सकते हैं। चूंकि इस बार विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया और वित्त मंत्री ने इसी सदन में विधेयक को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग की, इसलिए समिति के सदस्य लोकसभा के ही होंगे। इसके सदस्यों की संख्या भी आमतौर पर जरूरत के हिसाब से ही तय की जाती है। हालांकि, पांरपरिक तौर पर सेलेक्ट कमेटी में अलग-अलग राजनीतिक दलों के 20-30 सांसद होते हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शुक्रवार को ही सेलेक्ट कमेटी से जुड़े सदस्यों के नाम का एलान भी कर दिया। कमेटी में जिन 31 सांसदों का चुनाव हुआ है, उनमें 17 सत्तासीन एनडीए के सांसद हैं। इनमें 14 अकेले भाजपा के हैं, जबकि एक-एक सदस्य सहयोगी तेदेपा, जदयू और शिवसेना के हैं।
आमतौर पर इस तरह की सेलेक्ट कमेटियों में उसी सदन के सदस्यों को शामिल किया जाता है, जिस सदन में विधेयक पेश होता है। हालांकि, दूसरे सदन के सदस्य इन सेलेक्ट कमेटियों की कार्यवाही देख सकते हैं। चूंकि इस बार विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया और वित्त मंत्री ने इसी सदन में विधेयक को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग की, इसलिए समिति के सदस्य लोकसभा के ही होंगे। इसके सदस्यों की संख्या भी आमतौर पर जरूरत के हिसाब से ही तय की जाती है। हालांकि, पांरपरिक तौर पर सेलेक्ट कमेटी में अलग-अलग राजनीतिक दलों के 20-30 सांसद होते हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शुक्रवार को ही सेलेक्ट कमेटी से जुड़े सदस्यों के नाम का एलान भी कर दिया। कमेटी में जिन 31 सांसदों का चुनाव हुआ है, उनमें 17 सत्तासीन एनडीए के सांसद हैं। इनमें 14 अकेले भाजपा के हैं, जबकि एक-एक सदस्य सहयोगी तेदेपा, जदयू और शिवसेना के हैं।
इसके अलावा विपक्ष के 13 सांसदों को समिति का हिस्सा बनाया गया है। इनमें सबसे ज्यादा 6 सांसद कांग्रेस के हैं। वहीं दो समाजवादी पार्टी के और द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना-यूबीटी, राकांपा (एसपी) और आरएसपी के एक-एक सांसद को समिति में रखा गया है। इन सबके साथ मिजोरम की सत्तासीन जोराम पीपल्स मूवमेंट के सांसद रिचर्ड वनलाल्हमंगइया को भी समिति का हिस्सा बनाया गया है।
सेलेक्ट कमेटी काम कैसे करती है?
1. विधेयक की जांच, इस पर सुझाव हासिल करना
1. विधेयक की जांच, इस पर सुझाव हासिल करना
- सेलेक्ट कमेटी अपने सामने लाए गए विधेयक के एक-एक खंड (Clause) की समीक्षा करती है। समिति जरूरत के हिसाब से विधेयक में संशोधनों के सुझाव दे सकती है।
- समिति विशेषज्ञों, हितधारकों और सरकारी अधिकारियों से भी सलाह ले सकती है। इसकी समीक्षा संवैधानिक और कानूनी तौर पर भी की जाती है। अगर जरूरत हो तो समिति आम जनता से भी राय मांग सकती है।
2. समीक्षा के बाद रिपोर्ट तैयार करना
- सेलेक्ट कमेटी विधेयक पर जरूरी चर्चा और समीक्षा के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है। इस रिपोर्ट में विधेयक में शामिल किए जा सकने वाले संशोधनों और सुधारों के सुझाव शामिल किए जाते हैं।
- सेलेक्ट कमेटी के गठन के बाद लोकसभा के नियम 264 के तहत समिति को समय-समय पर बैठक के लिए जुटना होता है। इस बैठक के लिए कम से कम एक-तिहाई सदस्यों का कोरम होना आवश्यक है। ऐसा न होने पर बैठक आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।
- सदन अधिकतर सेलेक्ट कमेटी के किसी विधेयक पर विचार का समय निर्धारित कर देता है। हालांकि, ऐसा न होने की स्थिति में जिस दिन लोकसभा में विधेयक को सेलेक्ट कमेटी में भेजे जाने की मंजूरी मिलती है, उस दिन से तीन महीने के अंदर समिति को अपनी रिपोर्ट लोकसभा को लौटानी होती है। इस रिपोर्ट पर समिति की तरफ से अध्यक्ष हस्ताक्षर करते हैं।
- इस दौरान कई सदस्य विधेयक को नामंजूर करने की वजहें बताने वाले डीसेंट नोट्स (असहमति) भी दर्ज करवाते हैं। सेलेक्ट कमेटी इन्हें भी रिपोर्ट में शामिल करती है। हालांकि, लोकसभा में रिपोर्ट के पेश होने से पहले लोकसभा स्पीकर इन असहमति वाले नोट्स को परखते हैं और इनके अनुचित या भद्दा या गैरजरूरी होने पर इन्हें हटाने का आदेश दे सकते हैं। इसके बाद ये रिपोर्ट सदन के सभी सदस्यों को मुहैया कराई जाती है।
3. लोकसभा भेजने का क्रम
संसद की सेलेक्ट कमेटी अपनी रिपोर्ट पर मतदान करती है और इसके पास होने की स्थिति में अंतिम रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी जाती है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के हिसाब से तय किए गए समय पर रिपोर्ट लोकसभा में चर्चा के लिए प्रस्तुत होती है।
सदन को लौटाई गई सेलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट प्रस्ताव की तरह की होती हैं। सरकार अपनी मर्जी से रिपोर्ट में दिए गए प्रस्तावों को स्वीकार या नकार सकती है। सेलेक्ट कमेटी अगर चाहे तो विधेयक को अपने संशोधनों के साथ सुधारकर भी भेज सकती है। अगर समिति ऐसा करती है तो विधेयक को लाने वाले मंत्री अपनी मर्जी से सेलेक्ट कमेटी के विधेयक को ही सदन में चर्चा और पारित कराने के लिए पेश कर सकते हैं।
सेलेक्ट कमेटी और संयुक्त संसदीय समिति में क्या फर्क?
संसद की सेलेक्ट कमेटी अपनी रिपोर्ट पर मतदान करती है और इसके पास होने की स्थिति में अंतिम रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी जाती है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के हिसाब से तय किए गए समय पर रिपोर्ट लोकसभा में चर्चा के लिए प्रस्तुत होती है।
सदन को लौटाई गई सेलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट प्रस्ताव की तरह की होती हैं। सरकार अपनी मर्जी से रिपोर्ट में दिए गए प्रस्तावों को स्वीकार या नकार सकती है। सेलेक्ट कमेटी अगर चाहे तो विधेयक को अपने संशोधनों के साथ सुधारकर भी भेज सकती है। अगर समिति ऐसा करती है तो विधेयक को लाने वाले मंत्री अपनी मर्जी से सेलेक्ट कमेटी के विधेयक को ही सदन में चर्चा और पारित कराने के लिए पेश कर सकते हैं।
सेलेक्ट कमेटी और संयुक्त संसदीय समिति में क्या फर्क?