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फर्जी लिस्टिंग, ज्यादा फीस और उत्पीड़न के सहारे आगे बढ़ी ओयो कंपनी!

Sat, 04 Jan 2020 03:11 AM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Sat, 04 Jan 2020 03:11 AM IST
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Oyo company has moved forward with fake listings, high fees and harassment!
ओयो के मुख्य कार्यकारी रितेश अग्रवाल

कम किराये में होटल के कमरे उपलब्ध कराने वाला स्टार्टअप ओयो आज भले ही दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन इसकी व्यावसायिक नीतियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। कंपनी ने 2023 तक दुनिया की सबसे बड़ी होटल चेन बनने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन कंपनी के वित्तीय व अदालती दस्तावेज और पुराने कर्मचारियों का कहना है कि इसकी नीतियां संदेहास्पद हैं। 

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ओयो की वेबसाइट पर उन होटलों के नाम भी दर्ज हैं जो उससे नहीं जुड़े। कंपनी के नौ मौजूदा एवं पुराने कर्मचारियों की मानें तो कमरों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए ऐसा किया जाता है। ओयो के नेटवर्क में शामिल सैकड़ों होटलों के पास लाइसेंस तक नहीं हैं। कानूनी पचड़े से बचने के लिए कंपनी पुलिस और अन्य अधिकारियों को यदा-कदा मुफ्त ठहरने की सुविधा देती है।
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होटल मालिक भी खुश नहीं
कंपनी से जुड़े होटल मालिकों का आरोप है कि कंपनी उनसे अतिरिक्त फीस लेने के बावजूद उनके हिस्से का पैसा नहीं देती। पैसे मांगने पर इन होटलों में कस्टमर सर्विस खराब होने का बहाना बनाया जाता है। कई होटल मालिक अब कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज कराने की तैयारी में हैं। सितंबर, 2019 में नौकरी छोड़ चुके कंपनी के पूर्व ऑपरेशंस मैनेजर सौरभ मुखोपाध्याय कहते हैं, ओयो की कामयाबी एक पानी का बुलबुला है जो जल्द फूटने वाला है।
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देसी स्टार्टअप पर सवालिया निशान
ओयो ने शुरुआत से ही तेज विस्तार पर जोर दिया। इसे जापान के सॉफ्टबैंक से बड़ी फंडिंग भी मिली, लेकिन ओयो की बदनामी पूरे देश के स्टार्टअप कंपनियों के लिए बुरी खबर हो सकती है। खासकर इसलिए कि ओला और पेटीएम जैसी भारतीय स्टार्टअप कंपनियों को हाल में अरबों डॉलर की फंडिंग मिली है।

कंपनी के संस्थापक ने भी मानीं कमियां

हाल में एक साक्षात्कार में कंपनी के मुख्य कार्यकारी रितेश अग्रवाल ने स्वीकार किया कि ओयो की वेबसाइट पर कई ऐसे होटलों के नाम हैं जो उससे जुड़े नहीं हैं। कंपनी अपने रिकॉर्ड में उनके कमरों को सोल्ड आउट (भरा हुआ) दिखाती है और होटल मालिकों को उससे जुड़ने के लिए मनाती है। कंपनी के प्रमुख (भारतीय परिचालन) आदित्य घोष ने भी एक साक्षात्कार में माना है कि कंपनी से जुड़े कई होटलों के पास जरूरी लाइसेंस नहीं हैं। 

हालांकि उन्होंने अधिकारियों को मुफ्त होटल का कमरा देने से इंकार किया। घोष ने होटल मालिकों से अतिरिक्त फीस लेने से भी इनकार किया। उन्होंने कहा कि कंपनी खराब कस्टमर सर्विस के लिए होटलों पर जुर्माना लगाती है। होटल मालिक इसका विरोध करते हैं। कर्मचारियों की शिकायतों पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इसका कारण प्रशिक्षण की कमी है। ओयो के 80 फीसदी कर्मचारी एक साल पुराने भी नहीं हैं।

2013 में हुई शुरुआत
रितेश अग्रवाल ने 19 साल की उम्र में 2013 में ओयो की शुरुआत की थी। उनका मकसद देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद कम किराए वाले छोटे-बड़े होटलों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना था। कंपनी होटलों को अपने नेटवर्क में शामिल करने के बाद अपनी वेबसाइट के जरिये उनकी ऑनलाइन बुकिंग करती है। बदले में किराये का एक हिस्सा ओयो को मिलता है। कंपनी कुछ जगहों पर अपने होटल भी चलाती है। कंपनी अब 80 देशों में फैल चुकी है और 12 लाख से ज्यादा कमरे इसके प्लेटफॉर्म पर मौजूद हैं। 20 हजार से ज्यादा कर्मचारी इसके लिए काम करते हैं।

विस्तार के साथ घाटा भी

तेज विस्तार के बावजूद ओयो अब तक मुनाफा नहीं कमा पाई है। कंपनी को 2021 के अंत तक मुनाफे की उम्मीद भी नहीं है। जापान जैसे कुछ देशों में पैर फैलाने की कंपनी की कोशिश भी नाकामयाब रही है। दिसंबर, 2019 में सॉफ्टबैंक और खुद अग्रवाल ने 1.5 अरब डॉलर का निवेश कंपनी में किया, लेकिन ठीक उसी समय कंपनी के दो अन्य बड़े शेयरधारकों ने अपने करीब आधे शेयर बेच दिए। अग्रवाल ने कर्ज लेकर ये शेयर खरीदे।

कर्मचारियों पर दबाव
कंपनी के मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों का कहना है कि यहां काम का माहौल कभी अच्छा नहीं था, लेकिन पिछले एक साल में दबाव कई गुना बढ़ा है। सौरभ मुखोपाध्याय कहते हैं कि कर्मचारियों पर नए कमरे जोड़ने का इतना दबाव होता है कि वे बिना सुविधाओं वाले होटल के नाम भी शामिल कर लेते हैं। वेबसाइट पर इनकी फर्जी तस्वीरें लगाकर ग्राहकों को लुभाया जाता है। 

2014 से 2018 तक ओयो के लिए काम कर चुके सौरभ शर्मा बताते हैं कि कंपनी जानबूझकर होटल मालिकों के पैसे रोककर रखती है। कंपनी के कर्मचारी खुद भी ग्राहकों की आवाजाही के रिकॉर्ड में हेराफेरी करते हैं और अतिरिक्त कमाई करते हैं। इतना ही नहीं, पुराने कर्मचारी बदनामी से बचने के लिए कंपनी पर दुष्कर्म जैसे अपराधों को छिपाने का आरोप भी लगाते हैं।

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