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Orissa: झगड़े के दौरान किसी की जाति का नाम लेना SC-ST एक्ट के तहत अपराध मानने के लिए काफी नहीं, HC का फैसला
Fri, 10 Mar 2023 10:04 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 10 Mar 2023 10:04 AM IST
सार
अदालत ने मामले में आरोपी के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के आरोपों को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत मामले में लगाए गए अन्य आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया।
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ओडिशा हाईकोर्ट
- फोटो : Social Media
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विस्तार
ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एससी-एसटी एक्ट से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि झगड़े या बहस के दौरान किसी शख्स के अपमान के इरादे के बिना उसकी जाति का नाम लेना या उसे जाति के नाम के साथ अचानक गाली देना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के तहत अपराध मानने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता।
न्यायमूर्ति आरके पटनायक ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत दोषी करार किए जाने वाले अपराधी का पीड़ित को अपमानित करने का इरादा होना चाहिए। कोर्ट ने कहा, "अगर किसी को उसकी जाति के नाम के साथ गाली दी जाती है या किसी घटना के दौरान अचानक जाति के नाम का इस्तेमाल किया जाता है, तो कोर्ट के विनम्र दृष्टिकोण से यह निर्धारित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि यह एससी-एसटी (पीओए) के तहत कोई अपराध है। इस अधिनियम के तहत किसी को अपराधी तभी माना जा सकता है जब प्रथम दृष्टया में यह स्थापित हो जाए कि पीड़ित का अपमान इस कारण से किया गया है कि वह अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है।"
कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए एक पुराने केस- हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया। इस केस में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत एक अपराध तब तक स्थापित नहीं किया जाएगा जब तक पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने का कोई इरादा नहीं है।
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क्या था मामला, जिस पर सुनवाई कर रहा था कोर्ट?
यह मामला 2017 की एक घटना से जुड़ा था। दरअसल, याचिकाकर्ता का आरोप था कि जब वह घर लौट रहा था तब आरोपी ने उसके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, उस पर हमला किया और आतंकित करने की कोशिश की गई। इसी दौरान आसपास मौजूद कुछ अन्य लोग मौके पर पहुंचे और शिकायतकर्ता को बचाने के लिए हस्तक्षेप करने की कोशिश की। इसी दौरान आरोपी ने दखल देने वाले एक पीड़ित (जो अनुसूचित जाति से संबंधित था) की जाति का जिक्र कर दिया।
इस घटना को लेकर कोर्ट ने कहा कि मामले में पीड़ित खुद शिकायतकर्ता नहीं है। ऐसे में यह मान लेना बहुत बड़ी बात है कि आरोपियों का इरादा पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने का था। अदालत ने कहा, "यह दावा करना कि यह मौके पर मौजूद गवाह का अपमान करने के इरादे से किया गया था तो यह अनुचित होगा।"
अदालत ने मामले में आरोपी के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के आरोपों को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत मामले में लगाए गए अन्य आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया। इसमें चोट पहुंचाना और आपराधिक धमकी देना शामिल था।
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न्यायमूर्ति आरके पटनायक ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत दोषी करार किए जाने वाले अपराधी का पीड़ित को अपमानित करने का इरादा होना चाहिए। कोर्ट ने कहा, "अगर किसी को उसकी जाति के नाम के साथ गाली दी जाती है या किसी घटना के दौरान अचानक जाति के नाम का इस्तेमाल किया जाता है, तो कोर्ट के विनम्र दृष्टिकोण से यह निर्धारित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि यह एससी-एसटी (पीओए) के तहत कोई अपराध है। इस अधिनियम के तहत किसी को अपराधी तभी माना जा सकता है जब प्रथम दृष्टया में यह स्थापित हो जाए कि पीड़ित का अपमान इस कारण से किया गया है कि वह अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है।"
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कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए एक पुराने केस- हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया। इस केस में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत एक अपराध तब तक स्थापित नहीं किया जाएगा जब तक पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने का कोई इरादा नहीं है।
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क्या था मामला, जिस पर सुनवाई कर रहा था कोर्ट?
यह मामला 2017 की एक घटना से जुड़ा था। दरअसल, याचिकाकर्ता का आरोप था कि जब वह घर लौट रहा था तब आरोपी ने उसके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, उस पर हमला किया और आतंकित करने की कोशिश की गई। इसी दौरान आसपास मौजूद कुछ अन्य लोग मौके पर पहुंचे और शिकायतकर्ता को बचाने के लिए हस्तक्षेप करने की कोशिश की। इसी दौरान आरोपी ने दखल देने वाले एक पीड़ित (जो अनुसूचित जाति से संबंधित था) की जाति का जिक्र कर दिया।
इस घटना को लेकर कोर्ट ने कहा कि मामले में पीड़ित खुद शिकायतकर्ता नहीं है। ऐसे में यह मान लेना बहुत बड़ी बात है कि आरोपियों का इरादा पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने का था। अदालत ने कहा, "यह दावा करना कि यह मौके पर मौजूद गवाह का अपमान करने के इरादे से किया गया था तो यह अनुचित होगा।"
अदालत ने मामले में आरोपी के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के आरोपों को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत मामले में लगाए गए अन्य आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया। इसमें चोट पहुंचाना और आपराधिक धमकी देना शामिल था।