RSS की एक शाखा ऐसी भी जिसे संघ नहीं देता मान्यता
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दिल्ली में एक ऐसी भी शाखा है जिसे संघ मान्यता नहीं देता है। बावजूद उसके बीते 10 वर्षों से यह शाखा लगातार चलती आ रही है। शाखा में पहुंचने वालों के उत्साह का आलम यह है कि इस इलाके में शाखा लगाने के मामले में संघ को पैर जमाने में मुश्किलों का सामना करना पड रहा है। और संघ को मुश्किलों का सामना किसी और वजह से नहीं बल्कि अपने एक हठी प्रचारक के वजह से करना पड़ रहा है।
अहम के टकराव की वजह से संघ ने दिल्ली के जिला प्रचारक रहे बलराज से किनारा तो कर लिया। मगर वैचारिकता के धनी बलराज ने हार नहीं मानी और प्रचारक के तौर पर संघ शाखा लगाना जारी रखा। राजधानी के आश्रम इलाके के नजदीक सिदार्थ बस्ती में रहने वाले बलराज बीते 10 वर्षों से संघ की 3 शाखाएं लगवा रहे हैं।
सिद्धार्थ बस्ती के अंबेडकर पार्क में उनकी यह तीनों शाखाएं रोजाना लगती हैं। सुबह चलने वाली शाखा का नाम उन्होंने योग शाखा, शाम को चलने वाली विधार्थियों की शाखा का नाम श्रीराम शाखा और कार्यरत्त लोगों के लिए रात में चलने वाली रात्रि शाखा का नाम दुर्गा दास राठौर शाखा रखा है।
संघ से अलग शाखा लगाने वाले बलराज हैं कौन
सब कुछ संघ शाखा की तरह
सिद्धार्थ बस्ती में बलराज के जरिए चलने वाली शाखाओं में भी ध्वज से लेकर प्रार्थना तक की परंपराएं संघ शाखा सरीखी हैं। संघ के अधिकारियों का इन शाखाओं पर आना जाना और उनसे मिलना समय-समय पर होता रहता है। मगर उनकी शाखाओं को संघ की मान्यता नहीं है। वह भी ऐसे में जब संघ प्रमुख मोहन राव भागवत खुद बलराज की श्रीमराम शाखा को देश की सर्वश्रेष्ठ शाखा का दर्जा दे चुके हैं।
संघ प्रमुख बनने के बाद भागवत इस शाखा पर प्रवास करने आए थे। तब प्रसन्न होकर उन्होंने शाखा के मुख्यशिक्षक को पत्र लिखते रहने को कहा था। और स्वयं सेवकों की सूची भी मांगी थी।
संघ से अलग शाखा लगाने वाले बलराज हैं कौन
जामिया मिलिया इस्लामिया कॉलेज से फाईन आर्ट में स्नातक बलराज 1998 में नागपुर से संघ का तृतीय वर्ष प्रशिक्षण करने के बाद संघ कार्य का जज्बा लिए पूर्णकालिक प्रचारक निकले। वर्ष 1998 से 2002 तक उन्होंने बतौर जिला प्रचारक दिल्ली में संघ कार्य को आगे बढाया। इसके बाद वे लाजपत नगर में जिला कार्यवाह के दायित्व के साथ संघ का कामकाज देखने लगे।
मगर कुछ चंद अधिकारियों के संग उनका अहम का टकराव इस कदर बढ़ा कि वे संघ से अलग कर दिए गए। बावजूद उसके बलराज संघ प्रचारक की तरह अब भी अविवाहित रहते हुए संघ शाखाओं की तर्ज पर ही शाखा लगा रहे हैं। उनका दावा है कि संघ की शाखाओं में लोगों की भीड़ कम हो जाती है। मगर उनकी शाखा में संख्या की कमी नहीं है। वे वैज्ञानिक ढंग से शाख चलाते हैं।
संघ की तरह बलराज की शाखा के स्वयंसेवक भी उच्च पदों पर हैं बैठे
संघ प्रचारक एचहोवी शेषाद्रि से प्रभावित बलराज के आदर्श संघ के मजदूर नेता दत्तोपंत ठेंगडी हैं। उनका कहना है कि संघ से उनकी कोई कटूता नहीं है। कोई आना चाहता है तो उनके विचारों को स्वीकार कर आए। उन्हें इस बात का भी मलाल नहीं है कि संघ उनकी शाखाओं को मान्यता नहीं दे रहा है। वो कहते हैं कि अब वे अपने हिसाब से शाखा चलाते हैं।
यदि कोई व्यक्तिवादी मानें तो मानें मैं खुद शाखा नहीं चलाता मगर एक प्लेटफार्म प्रदान कर रहा हुं। संघ से अलग शाखा लगाने के सवाल पर अमर उजाला से बातचीत में बलराज का कहना है कि संघ माने या न माने उददेश्य को लेकर वे मैदान में डटे हुए हैं। वैचारिकता की घुटटी कूट—कूट कर जहन में भरी होने के कारण उनमें शाखा लगाने को लेकर अब भी उत्साह है। लेकिन संघ में आ रही भटकाव से वे चिंतित भी हैं।
संघ की तरह बलराज की शाखा के स्वयंसेवक भी उच्च पदों पर हैं बैठे
बलराज की शाखा से निकले स्वयंसेवक वैज्ञानिक से लेकर कई उचें पदों पर विराजमान हैं। केंद्रीय भाजपा और दिल्ली भाजपा के अकाउंट के काम का भार भी बलराज की शाखा से निकले स्वयंसेवकों पर ही है। बलराज का दावा है कि वे संघ के नक्शे कदम पर चलते हुए चरित्रवान स्वयंसेवक तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकारियों से कटुता आई, अहम का टकराव है। बावजूद उसके कुछ भी अलग नहीं किया बल्कि शाखा लगानी जारी रखी। संख्या की दृष्टि से बलराज की शाखाओं में हमेशा भीड रहती है।
अमर उजाला ने जब उनकी श्रीराम शाखा का औचक मुआयना किया तब भी शाखा में उपस्थित विधार्थियों की संख्या 50 के पार थी। आस—पास के इलाके के लोगों का भी कहना है कि बलराज की शाखा में भीड हमेशा रहती है। खुद संघ के लोग भी मानते हैं कि बलराज की शाखा उत्तम शाखाओं में शूमार है। बलराज भी स्वीकारते हैं कि कटुता के बावजूद होली या अन्य त्यौहार के मौकों पर अपनी शाखा के बाद संघ अधिकारी उनकी शाखा पर भी आ जाते हैं। इलाके में जितने भी नए प्रचारक आते हैं उनकी शाखा देखने जरूर आते हैं।
शाखा के पैटर्न में मामूली बदलाव
शाखा के उददेश्य भी संघ समान
बलराज का कहना है कि अपनी शाखा के लिए उन्होंने उददेश्यों में बदलाव नहीं किया है। कुछ नया नहीं कर रहे बल्कि वही कर रहे हैं जो विचार हमारे परिवार में थे। शाखा लगा रहे हैं व्यवस्था खत्म नहीं हुई निपुण्य वर्ग वैसे चलते हैं। प्रार्थना भी वही और वैसे ही होती है। शाखा लगाने का मूल भाव भी हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा है। हिन्दू धर्म की जो सनातन संस्कृति उसे ही मानते हैं। उनका कहना है कि कलाकार होने के नाते शक्ति मिलती है। लोकपरंपरा का खत्म होना कचोटता है।
शाखा के पैटर्न में मामूली बदलाव
बलराज कहते हैं कि उन्होंने शाखा के मूल में कोई बदलाव नहीं किया बल्कि थोड़ा पैटर्न में जरूर बदलाव किया है। शाखा को हिन्दू धर्म से जोड़ने के लिए हर नवरात्र में बाल्मिकी रामायण का श्लोक शाखा में शुरू किया। हर मंगलवार को शाखा में हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है।
शाखा के लोग मंगलवार को क्षेत्र में जाकर हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। बाद में इसकी नकल करते हुए विश्व हिन्दू परिषद ने भी कार्यक्रम चलाया। जन्मदिन मनाने के लिए बच्चों को नए तरीके प्रदान किए। शाखा आने वाले सभी बच्चों को स्वस्तिवाचन मंत्र याद कराया जाता है। जन्मदिन के दिन बच्चे पार्टी वगैराह के बजाय सुन्दरकांड का पाठ करवाते हैं। शाखा के सभी बच्चों को गौ सेवा से जोडा है। संघ में रहते हुए भी किया था।
बलराज की चित्रकला के लोग आज भी कायल
बलराज की अपनी दिनचर्या
पूरी तरह से संघ कार्यों में रमे बलराज की दिनचर्या भी उसी तरह की है। बलराज कहते हैं कि वे खुद 16 पुराणों का अध्ययन कर चुके हैं। सुबह के समय शाखा के बाद दिन का समय गौसेवा में व्यतित करते हैं। नजदीक में निजामुदीन के पास यमुना किनारे गोशाला बनवा रखी है। क्षेत्र के लोग खुद ही आकर घर पर चारा या रोटी छोड जाते हैं। तो शाखा के बच्चे अगल—बगल की सब्जी मंडी में जाकर सब्जी एकत्रित कर लाते हैं।
बलराज की चित्रकला के लोग आज भी कायल
बलराज की शाखाओं को संघ बेशक मान्यता नहीं प्रदान कर रहा है। मगर उनकी चित्रकला के लोग आज भी कायल हैं। गुरूजी से संबंधित वेबसाईट बनी उसमें सारे चित्र बलराज के हाथ के बनें हुए ही लगे। उस दौरान उनपर जितनी भी पुस्तकें छपीं उनके चित्र भी बलराज ने ही बनाए।
वर्तमान संघ से नाराजगी के कारण
प्रचारक रहे बलराज का कहना है कि आज का संघ हेडगेवार वाला नहीं है बल्कि अंबेडकर वाला है। कौन कल्पना कर सकता था कि राम—कृष्ण को अपशब्द कहने वाले अंबेडकर को संघ माथे पर उठाकर चलेगा। जिसने महिसाशूर मर्दनी को वेश्या कहा हो उसे आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। अपनी वेदना प्रकट करते हुए बलराज ने कहा कि केंद्र में हमारी सरकार है। आज यदि हेडगेवार का चित्र नोट पर नहीं आएगा तो कब आएगा। या उन्हें अब आदर्श के रूप में स्थापित नहीं करेंगे तो कब करेंगे। केरल में आए दिन हिन्दू मारा जा रहा है।
कैराना से हिन्दू पलायन हुआ तब संघ कहां था। इतिहास भागवत से जरूर पूछेगा कि जब कैराना से हिन्दू पलायन कर रहे थे तो विश्व का सबसे बडा संगठन संघ कया कर रहा था। वर्तमान संघ की दिशा गलत हो गई है। अब संख्या बढाने के लिए वर्दी में पेंट रख ली है। पहले निक्कर के लिए तर्क रखते थे कि खेलने में सुविधा होती है। आज पेंट रख ली उससे भला खेलने में कैसे आसानी होगी। यदि बदलना ही थ तो पेंट क्यों पतलून क्यों नहीं। संघ हिन्दू से हटा है।
पीएम मोदी पर भी तंज
भागवत को भी खरी—खरी
बलराज का कहना है कि संघ प्रमुख सत्ता परस्त नीति के कारण दिगभ्रमित हो गए हैं। उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं। सार्वजनिक मंच से एकदफे कहते हैं कि भारते में रहने वाले सभी हिन्दू हैं। तो दूसरी दफे कहते हैं कि हिन्दूओं की जनसंख्या घट रही है। यह दोनों बातें सत्य नहीं हो सकती है। यदि भारत में रहने वाले सभी हिन्दू हैं तो जनसंख्या कैसे कम हो रही है। अन्यथा उनके जरिए दी गई हिन्दू की परिभाषा गलत है।
पीएम मोदी पर भी तंज
संघ और पीएम मोदी पर अवसरवादी बनने का आरोप लगाते हुए बलराज ने कहा कि आज भी वही गांधी और बुदध के बारे में बोला जा रहा है। मोदी जी क्यों नहीं राणा प्रताप और शिवाजी के बारे में बोलते हैं। उन्हें अंबेडकर की याद तो है पर रविदाश की नहीं, क्योंकि रविदाश वोट नहीं दिलवा सकते। संघ भी अब स्वयंसेवकों का इस्तेमाल केवल सत्ता प्राप्ति की सीढ़ी के रूप में कर रहा है। आज का संघ हेडगेवार का नहीं बल्कि अंबेडकर का हो गया है।
पीएम की सादगी पर सवाल
बलराज कहते हैं कि कई स्वयंसेवक संघ प्रचारक छोड कर चले गए उनका नाम नहीं है। शंकर सिंह वाघेला प्रचारक रहे कहां हैं। मोदी जी प्रचारक रहे दिन में छत्तीस पोशाक बदलते हैं। हमें तो संघ ने नहीं सिखाया महंगे कपडे पहनों। मोदी तो छत्तीस कपड़े लेके चलते हैं और दिनभर बदलते रहते हैं। यह कौन सा आदर्श। वर्तमान संघ में सहज परंपराएं नहीं दिखती हैं।