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एनआरसी ड्राफ्ट: प्रतीक हजेला बोले- 40 लाख लोगों को नहीं कह सकते घुसपैठिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 02 Aug 2018 07:12 PM IST
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प्रतीक हजेला
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एनआरसी लिस्ट से गायब लोगों को घुसपैठिए बता रहे हैं। उनके इस बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए सह-समन्वयक प्रतीक हजेला ने इस तरह की बातों को अपरिपक्व कहा है। उन्होंने कहा कि 40,07,707 लोग अपनी नागरिकता का सबूत नहीं दे पाए हैं उन्हें रजिस्टर के आधार पर अवैध नागरिक या कुछ और नहीं कहा जा सकता है।
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हजेला ने कहा, 'नहीं हम यह नहीं कह सकते कि सभी 40 लाख लोग घुसपैठिए हैं।' उन्होंने यह जवाब एक सवाल पूछे जाने पर दिया। उन्होंने कहा कि केवल न्यायिक जांच के आधार पर ही किसी शख्स को अवैध नागरिक कहा जा सकता है। हजेला ने कहा, 'इन लोगों को अपने प्रमाण पत्र का सबूत देने का एक और मौका मिलेगा। जिसके बाद हम फाइनल एनआरसी लेकर आएंगे। इसके बाद प्रक्रिया खत्म हो जाएगी। इसके बाद भी कोई शख्स अवैध प्रवासी है या नहीं इसका फैसला केवल न्यायिक जांच और असम गठन के कुछ कोड द्वारा होगा। जिन्हें कि विदेशी ट्रिब्यूनल कहा जाता है।'
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सह-समन्वयक ने इस बात को माना कि फाइनल एनआरसी का ड्राफ्ट बनाते समय कुछ गलतियां हो सकती हैं क्योंकि यह मैनुएल प्रक्रिया है और लोगों के पास किसी भी एंट्री का विरोध करने का मौका होगा। हजेला से पूछा गया कि क्या 30 जुलाई के ड्राफ्ट में जिन लोगों का नाम है उन्हें वैध नागरिक माना जाएगा? इसके जवाब में उन्होंने कहा, 'जिनके नाम ड्राफ्ट में हैं वह वेरिफिकेशन राउंड के दौरान हमारे सामने प्रमाण पत्र पेश करने में सक्षम रहे हैं। लेकिन दोबारा यदि किसी को कोई एंट्री गलत लगती है तो वह उसपर आपत्ति दर्ज कर सकता है।'
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हजेला का यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है जब एनआरसी को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच ठनी हुई है। विपक्षी दल भाजपा को लोगों को अवैध नागरिक करार दिए जाने के लिए आड़े हाथ ले रहे हैं। वहीं मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय अमित शाह ने कहा था कि एनआरसी का उद्देश्य अवैध प्रवासियों पर रोक लगाना है जो देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। एनआरसी भारतीयों के अधिकार की रक्षा के लिए है, भारतीयों के अधिकार के लिए। कोई देश इस तरह से नहीं चल सकता है। आप हर जगह से अवैध नागरिकों को नहीं रख सकते।
क्या है एनआरसी और असम समझौता
देश में असम इकलौता राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में नागरिक रजिस्टर (सिटिजनशिप रजिस्टर) देश में लागू नागरिकता कानून से अलग है। यहां असम समझौता 1985 से लागू है और इस समझौते के मुताबिक, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक राज्य में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा।
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) के मुताबिक, जिस व्यक्ति का सिटिजनशिप रजिस्टर में नहीं होता है उसे अवैध नागरिक माना जाता है्। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। इसमें यहां के हर गांव के हर घर में रहने वाले लोगों के नाम और संख्या दर्ज की गई है।
एनआरसी की रिपोर्ट से ही पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है। आपको बता दें कि वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जमीन असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा। इसके बाद 1951 में पहली बार एनआरसी के डाटा का अपटेड किया गया।
इसके बाद भी भारत में घुसपैठ लगातार जारी रही। असम में वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भारी संख्या में शरणार्थियों का पहुंचना जारी रहा और इससे राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने एक आंदोलन शुरू किया था। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौत पर हस्ताक्षर किए गए थे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, उसकी देखरेख में 2015 से जनगणना का काम शुरू किया गया। इस साल जनवरी में असम के सिटीजन रजिस्टर में 1।9 करोड़ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे जबकि 3।29 आवेदकों ने आवेदन किया था।
असम समझौते के बाद असम गण परिषद के नेताओं ने राजनीतिक दल का गठन किया, जिसने राज्य में दो बार सरकार भी बनाई। वहीं 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप को अपडेट करने का फैसला किया था। उन्होंने तय किया था कि असम में अवैध तरीके से भी दाखिल हो गए लोगों का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप में जोड़ा जाएगा लेकिन इसके बाद यह विवाद बहुत बढ़ गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) के मुताबिक, जिस व्यक्ति का सिटिजनशिप रजिस्टर में नहीं होता है उसे अवैध नागरिक माना जाता है्। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। इसमें यहां के हर गांव के हर घर में रहने वाले लोगों के नाम और संख्या दर्ज की गई है।
एनआरसी की रिपोर्ट से ही पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है। आपको बता दें कि वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जमीन असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा। इसके बाद 1951 में पहली बार एनआरसी के डाटा का अपटेड किया गया।
इसके बाद भी भारत में घुसपैठ लगातार जारी रही। असम में वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भारी संख्या में शरणार्थियों का पहुंचना जारी रहा और इससे राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने एक आंदोलन शुरू किया था। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौत पर हस्ताक्षर किए गए थे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, उसकी देखरेख में 2015 से जनगणना का काम शुरू किया गया। इस साल जनवरी में असम के सिटीजन रजिस्टर में 1।9 करोड़ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे जबकि 3।29 आवेदकों ने आवेदन किया था।
असम समझौते के बाद असम गण परिषद के नेताओं ने राजनीतिक दल का गठन किया, जिसने राज्य में दो बार सरकार भी बनाई। वहीं 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप को अपडेट करने का फैसला किया था। उन्होंने तय किया था कि असम में अवैध तरीके से भी दाखिल हो गए लोगों का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप में जोड़ा जाएगा लेकिन इसके बाद यह विवाद बहुत बढ़ गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।
मनमोहन सिंह के दौर में मिली थी मंजूरी
यूपीए सरकार के कार्यकाल में एनआरसी ने अपना काम शुरू किया था। इसके लिए 20 करोड़ रुपये की राशि शुरुआती दौर में मंजूर की गई थी। लेकिन कई वजहों से यह काम शुरू नहीं हो पाया। इसके बाद फिर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 5 मई, 2005 में हुए त्रिपक्षीय समझौते में एनआरसी को अपडेट करने करने को मंजूरी मिली। लेकिन काम कुछ खास आगे नहीं बढ़ा। फिर 22 अप्रैल, 2010 को हुई एक त्रिपक्षीय बैठक के बाद राज्य के चायगांव और बारपेटा सर्किल में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ।
यूपीए सरकार ने दी प्रतीक हजेला को जिम्मेदारी
आखिरकार मौजूदा प्रक्रिया यूपीए सरकार के समय ही साल 2013 में शुरू हुई, जब प्रतीक हजेला को एनआरसी अपडेट करके लिए स्टेट कोऑर्डिनेटर बनाया गया। लेकिन वास्तविक कार्य ने तेजी पकड़ी फरवरी 2015 में जब एनआरसी सेवा केंद्रों को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और 6।6 करोड़ दस्तावेजों के साथ एनआरसी में नाम डालने के लिए 3।29 करोड़ लोगों ने अप्लाई किया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
अगस्त 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को एनआरसी अपडेशन की पूरी प्रक्रिया को तीन साल के भीतर पूरा करने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार ने इस रजिस्टर को अपडेट करने के लिए 288 करोड़ रुपये मंजूर किए।
यूपीए सरकार ने दी प्रतीक हजेला को जिम्मेदारी
आखिरकार मौजूदा प्रक्रिया यूपीए सरकार के समय ही साल 2013 में शुरू हुई, जब प्रतीक हजेला को एनआरसी अपडेट करके लिए स्टेट कोऑर्डिनेटर बनाया गया। लेकिन वास्तविक कार्य ने तेजी पकड़ी फरवरी 2015 में जब एनआरसी सेवा केंद्रों को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और 6।6 करोड़ दस्तावेजों के साथ एनआरसी में नाम डालने के लिए 3।29 करोड़ लोगों ने अप्लाई किया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
अगस्त 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को एनआरसी अपडेशन की पूरी प्रक्रिया को तीन साल के भीतर पूरा करने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार ने इस रजिस्टर को अपडेट करने के लिए 288 करोड़ रुपये मंजूर किए।