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अब भाजपा नेताओं के गले में मछली के कांटे की तरह फंस रहा है एससी-एसटी कानून

Tue, 04 Sep 2018 08:17 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 04 Sep 2018 08:17 PM IST
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Now the BJP leaders are trapped in the SC, ST law

सीधी से भाजपा सांसद रीति पाठक ही नहीं म.प्र. के तमाम सांसदों को अपने क्षेत्र में निकलना मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने सवर्णों के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यही स्थिति उ.प्र. में भी है। पूर्वांचल के एक सांसद का कहना है कि वह शुक्रवार को एक कार्यक्रम में गए थे। सांसद क्षत्रिय समाज से आते हैं। लेकिन वहां क्षत्रियों ने एससी, एसटी कानून को लेकर विरोध करना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया साइट पर भी इसकी गरमी साफ देखी जा रही है। वहां पूर्व केंद्रीय मंत्री, उ.प्र. के बड़े ब्राह्मण नेता और भाजपा सांसद कलराज मिश्र ने भी कानून पर पुनर्विचार की मांग की है।

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कलराज मिश्र की मांग : एससी-एसटी पर हो पुनर्विचार

अमर उजाला से चर्चा के दौरान कलराज मिश्र ने कहा कि पूरे देश में एससी, एसटी अधिनियम का विरोध बढ़ रहा है। यह केवल ब्राह्मण, ठाकुर या सवर्ण का मामला नहीं है। इससे अन्य पिछड़ा वर्ग समेत अन्य वर्ग भी त्रस्त है। मिश्र का कहना है कि एससी, एसटी वर्ग इसका दुरुपयोग कर रहा है और अधिकारी एससी, एसटी एक्ट के कारण डरे हुए हैं। अधिकारियों को झूठे और पूरी तरह से निराधार मामले में कार्रवाई न करने पर खुद के खिलाफ एफआईआर होने और गिरफ्तारी तक हो जाने का डर सताने लगता है।
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भाजपा नेता का कहना है कि अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम सभी दलों के नेताओं की सहमति से पारित हुआ है। इसलिए सभी दलों के नेताओं को इसके प्रावधान के संशोधन पर विचार करना चाहिए। मिश्र का कहना है कि यदि ऐसा न हुआ तो समाज में बंटवारे की खाई लगातार बढ़ेगी। मिश्र ने कहा कि यह केवल भाजपा या मोदी सरकार का मामला नहीं है। यह अधिनियम संसद में पारित हुआ है। इसलिए इसमें बदलाव के लिए सभी दलों के सांसदों को आगे आना चाहिए।
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मामले

नोएडा में एक ताजा मामला रिटायर्ड कर्नल के साथ चर्चा में आया। इस मामले में एडीएम और उनके परिवार द्वारा दर्ज शिकायत झूठी पाई गई। लेकिन इससे पहले रिटायर कर्नल को जेल तक जाना पड़ा। उनकी गिरफ्तारी हुई, हथकड़ी लगी। यहां तक कि मारपीट का शिकार हुई पीड़ित कर्नल ही आरोपी बना दिए गए।

दूसरा मामला कलाराज मिश्र बताते हैं। उनका कहना है कि एक गांव के प्रधान जी मिलने आए। उन्होंने बताया कि गांव के ही दो परिवार में किसी बात पर विवाद चल रहा था। एक पक्ष ने गांव की परंपरा के अनुसार मामले के निबटारे के लिए बुलाया। आशय यह था कि प्रधान दोनों की सुनेंगे और जो सही होगा वह निर्णय देंगे। लेकिन प्रधान के पहुंचते ही दूसरा पक्ष विरोध करने लगा। उसने अनुसूचित जाति अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराने की धमकी दी और शिकायत भी दर्ज करा दी। अब प्रधान परेशान हैं।

तीसरा मामला फैजाबाद का है। कलराज मिश्र का कहना है कि एक परिवार उनके पास आया। उस परिवार के पहले एक सदस्य के खिलाफ एससी एक्ट के तहत एफआईआर कराई गई, फिर दूसरे और अंत में परिवार के सभी चार लोग इसकी चपेट में है।
 

कहीं 1990 के दशक की आहट तो नहीं

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में आठ राज्यों में 282 सीटें जीती थी। रणनीतिकारों के अनुसार भाजपा के इस वोट बैंक में ऊंची जाति का काफी बड़ा योगदान था, लेकिन जिस तरह से म.प्र., उ.प्र. समेत कई राज्यों में एससी, एटी एक्ट का विरोध बढ़ रहा है, भाजपा के नेताओं को डराने लगा है।

सवर्णों के साथ छोड़ने या मतों के बंटवारे की स्थिति में भाजपा की चुनावों में मुसीबत बढ़ सकती है। सोशल मीडिया पर भाजपा कार्यकर्ताओं की एससी, एसटी एक्ट को लेकर टिप्पणी कुछ ऐसी ही चुगली कर रही है। वहीं एससी, एसटी एक्ट के खिलाफ चल रहा विरोध प्रदर्शन बसपा, जन सम्मान पार्टी समेत अन्य दबे कुचले लोगों को आधार बनाकर काम करने वाले राजनीतिक दलों का जनाधार बढ़ा सकता है। 

संघ के एक पदाधिकारी का कहना है कि वह आरक्षण में भी संशोधन चाहते हैं। यह संशोधन संघ परिवार भी महसूस कर रहा है। आरक्षण पाने वाले क्रीमी लेयर को इससे दूर रखा जाना चाहिए, लेकिन यह मसला राजनीतिक है। इसे सरकार को तय करना है।

मछली का कांटा
एससी-एसटी कानून केन्द्र सरकार के गले में मछली के कांटे की तरह फंस गया है। सरकार यदि अपने सांसदों की मांग मानकर एससी, एसटी कानून में पुनर्विचार करे तो उसके सामने आगे कुआं और पीछे खाई जैसी स्थिति है। न करे तो सवर्णों की नाराजगी मोल ले पहल शुरू करे तो एससी, एसटी वर्ग का आंदोलन झेले। फिलहाल केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने मुंबई हार्ईकोर्ट के फैसले पर अमल करते हुए टीवी चैनलों को एडवाइजरी जारी कर दिया है। इसमें टीवी चैनलों से दलित शब्द का इस्तेमाल न करने को कहा गया है।
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