{"_id":"57b893494f1c1bc61a6eb5ae","slug":"now-no-arresting-in-dowry-case-over-without-any-reason","type":"story","status":"publish","title_hn":"दहेज उत्पीडन में 'बेवजह' गिरफ्तारी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फिर लगाई मुहर ","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
दहेज उत्पीडन में 'बेवजह' गिरफ्तारी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फिर लगाई मुहर
अमर उजाला ब्यूरो/नई दिल्ली
Updated Sun, 21 Aug 2016 07:50 AM IST
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दहेज उत्पीडन मामले में ससुरालियों की गिरफ्तारी तब तक न हो जब तक कि ऐसा करना निहायत ही आवश्यक हो। इस संबंध में दिए अपने पूर्व फैसले में किसी तरह का फेरबदल करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया है।
राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा इस फैसले के खिलाफ दाखिल सुधारात्मक याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। दो जुलाई, 2014 को अरनेस कुमार बनाम बिहार मामले में न्यायमूर्ति सीके प्रसाद और न्यायमूर्ति पीसी घोष की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि दहेज उत्पीडन मामले में पुलिस अधिकारियों द्वारा आरोपियों को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ऐसा करना बेहद आवश्यक न हो।
साथ ही फैसले में यह भी कहा गया था कि मजिस्ट्रेट भी यूं ही आरोपियों को आरोपियों को हिरासत में लेने का आदेश देने को अधिकृत नहीं है। इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को यह निर्देश दिया था कि वह अपने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे कि दहेज उत्पीडन का मुकदमा दर्ज होने पर आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार न किया जाए। पुलिस अधिकारियों को यह संतुष्ट करना होना कि आरोपियों की गिरफ्तारी जरूरी है। फैसले में पुलिस और मजिस्ट्रेट को इस संबंध में चौकस रहने के लिए कहा गया था। साथ ही ऐसे मामलों में आरोपियों को अग्रिम जमानत देने की बात कही गई थी।
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इस फैसले का महिला संगठनों ने विरोध भी किया था। महिला कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय महिला आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर विरोध जताया था कि दहेज उत्पीडन कानून का दुरूपयोग हो रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने अपनी सुधारात्मक याचिका में कहा था कि वर्ष 2014 का आदेश पुलिस को यह तय करने का अधिकार देता है कि किसे गिरफ्तार जाए या नहीं, यह उचित नहीं है। आयोग ने पूर्व आदेश में बदलाव की गुहार लगाई थी।
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राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा इस फैसले के खिलाफ दाखिल सुधारात्मक याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। दो जुलाई, 2014 को अरनेस कुमार बनाम बिहार मामले में न्यायमूर्ति सीके प्रसाद और न्यायमूर्ति पीसी घोष की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि दहेज उत्पीडन मामले में पुलिस अधिकारियों द्वारा आरोपियों को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ऐसा करना बेहद आवश्यक न हो।
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साथ ही फैसले में यह भी कहा गया था कि मजिस्ट्रेट भी यूं ही आरोपियों को आरोपियों को हिरासत में लेने का आदेश देने को अधिकृत नहीं है। इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को यह निर्देश दिया था कि वह अपने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे कि दहेज उत्पीडन का मुकदमा दर्ज होने पर आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार न किया जाए। पुलिस अधिकारियों को यह संतुष्ट करना होना कि आरोपियों की गिरफ्तारी जरूरी है। फैसले में पुलिस और मजिस्ट्रेट को इस संबंध में चौकस रहने के लिए कहा गया था। साथ ही ऐसे मामलों में आरोपियों को अग्रिम जमानत देने की बात कही गई थी।
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इस फैसले का महिला संगठनों ने विरोध भी किया था। महिला कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय महिला आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर विरोध जताया था कि दहेज उत्पीडन कानून का दुरूपयोग हो रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने अपनी सुधारात्मक याचिका में कहा था कि वर्ष 2014 का आदेश पुलिस को यह तय करने का अधिकार देता है कि किसे गिरफ्तार जाए या नहीं, यह उचित नहीं है। आयोग ने पूर्व आदेश में बदलाव की गुहार लगाई थी।