तब मोदी के नाम से जीते, अब नाम और काम दोनों से जीतेंगेः पीयूष गोयल
- जमीन पर कांग्रेस के न्याय की नहीं है कोई चर्चा
- हिंदू आतंकवाद के लिए राहुल समेत पूरी कांग्रेस माफी मांगे
- बालाकोट हमारा काम है उसका जिक्र क्यों नहीं करें
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विस्तार
लोकसभा चुनावों के चार चरण हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बाद भाजपा के पूरे चुनाव प्रचार का प्रबंधन और संचालन की कमान केंद्रीय रेल एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल के हाथों में है। प्रबंधन के साथ साथ गोयल चुनावी प्रचार में भी जुटे हैं। झारखंड में चुनाव प्रचार के दौरान पीयूष गोयल से विनोद अग्निहोत्री की बातचीत:
लोकसभा चुनाव के चार चरण बीत चुके हैं। भाजपा और एनडीए को लेकर क्या अनुमान है?
जैसे जैसे चुनाव आगे बढ रहा है स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत की जनता ने प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जी को दोबारा अपना आशीर्वाद देने जा रही है। मुझे याद है छह महीने पहले नवंबर 2018 में जो देश भर से रिपोर्ट आईं थी, हमने जो सर्वे कराया था तब लग रहा था कि भाजपा पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतेगी। तब एनडीए की तस्बीर भी स्पष्ट नहीं थी, हमने सिर्फ भाजपा का आकलन किया था, तब स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान था। अब हर चरण के साथ मैं आत्मविश्वास से कह सकता हूं कि हमारा अनुमान सही निकल रहा है।
भाजपा की 2014 में सीटें थीं, उससे अधिक सीटें हम जीतेंगे। खासतौर पर पूर्वोत्तर, प.बंगाल, उडीसा में हम भारी सफलता पाने जा रहे हैं। कर्नाटक में हमारी सीटें बढ़ेंगी। केरल तमिलनाडु में प्रभावशाली परिणाम आने चाहिए। इस सबके हिसाब से हर हालत में 2014 से ज्यादा भाजपा की सीटें आनी चाहिए। फिर सबसे बड़ा गठबंधन तो हमारा ही है। केरल में, तमिलनाडु में, महाराष्ट्र में, बिहार-झारखंड, पूर्वोत्तर के सब राज्य, पंजाब कुछ मात्रा में राजस्थान में, उत्तर प्रदेश में अपना दल के साथ। कुल मिलाकर इसे देखकर कहा जा सकता है कि एनडीए अगर दो तिहाई बहुमत तक भी पहुंच जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इस अतिविश्वास का आधार क्या है?
जमीन पर जाकर देखिए लोगों में कितना उत्साह है। मोदी जी पर कितना अधिक भरोसा है। उनकी सभाओं में कितनी भीड़ आ रही है। किस तरह से लोग उन्हें सुनते और समझते हैं। अभी मैं जयपुर में था प्रधानमंत्री जी की सभा में भीड़ उमडती हुई आ रही थी। दूर दूर तक लोग लोग थे।
लेकिन चार चरणों में जो मतदान हुआ उसमें मत प्रतिशत में इसका संकेत नहीं मिलता है। मतदान का प्रतिशत 2014 से कहीं कुछ कम तो कहीं उतना ही है?
यह बड़ा सरल सा विषय है। 2009 से 2014 में मतदान प्रतिशत में भारी इजाफा हुआ। तब सबने उसे मोदी लहर बताया। स्वाभाविक है जब 2019 आया तो अगर यह लहर नहीं होती तो शायद यह मतदान प्रतिशत 2014 से गिरकर फिर 2009 के स्तर पर पहुंच जाता। लेकिन अगर 2014 का औसत बरकरार या कुछ ज्यादा ही है तो इसका साफ मतलब है कि मोदी लहर है जो अब सुनामी बन चुकी है।
लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है। आपका क्या अनुमान है कितनी सीटें आएंगी उत्तर प्रदेश में?
हमारा तो लक्ष्य है कि पिछली बार उत्तर प्रदेश में जो 73 सीटें आईं थी, उनसे ज्यादा जीती जाएँ। पिछली बार एक सीट नहीं जीत पाए थे, उसे इस बार जरूर जीतेंगें वो है अमेठी की। इसका संकेत राहुल गांधी को मिल गया, इसीलिए वह केरल चले गए लड़ने और अपने मित्र पक्ष कम्युनिस्टों से भी झगड़ा कर लिया। रही बात गठबंधन की तो आवाज तो बहुत हुई उस गठबंधन की लेकिन जैसे 2017 में सपा कांग्रेस के गठबंधन को कहा जाता था कि यूपी को ये साथ पसंद है लेकिन लोगों ने बता दिया कि इस तरह के बेमेल गठबंधन को लोग पसंद नहीं करते।
ये अनैतिक गठबंधन हैं जिनके नेताओं के बीच हमेशा झगड़ होते रहते हैं। इस तरह के गठबंधन समाज के एक छोटे से हिस्से पर तो असर डाल सकते हैं, लेकिन व्यापक जनमत इससे प्रभावित नहीं होता क्योंकि इनके पास न कोई सोच है न दृष्टि। लोग ऐसे गठबंधन को अपना वोट क्यों देंगे जिनका लक्ष्य भारत निर्माण नहीं सिर्फ सत्ता पाना है। ये भ्रष्ट पार्टियों का अवसरवादी गठबंधन है जिसे कहा जहा सकता है कोलेशन ऑफ करप्ट।
बिहार में आपने भी तो नीतीश कुमार के साथ जो गठबंधन किया है क्या वह अवसरवादी नहीं है?
नीतीश जी शुरुआत से हमारे साथ थे। कुछ गलफहमियों के कारण वह गठबंधन चला नहीं और उन्होंने दूसरी पार्टियों के साथ एक गठबंधन बनाया। लेकिन पहले दिन से वह उसमें सहज नहीं थे। उस गठबंधन में भ्रष्टाचारी लोग काफी थे जो अभी तक जेल में हैं वह भी चारा चोरी करने के लिए। ऐसे लोगों के साथ नीतीश जी जैसा नेता जिसने जयप्रकाश नारायण जी के समय से देश के लिए राजनीति की हो वो उसमें कैसे रह सकते थे। वास्तव में वो लंबे समय तक चलने वाला गठबंधन था ही नहीं।
पिछले चुनाव में भाजपा का नारा था कि कांग्रेस को साठ साल दिए नरेंद्र मोदी को साठ महीने दीजिए। अब वो मौका तो लोगों ने दे दिया। अब भाजपा किस मुद्दे पर दोबारा मौका मांग रही है।
पिछली बार तो मोदी जी का नाम था, इस बार तो मोदी जी का काम भी है। कांग्रेस के समय महंगाई की दर जो 2012 में 13-14 फीसदी पहुंच गई थी, हमने उसे घटाकर ढाई फीसदी कर दिया। सभी जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम नियंत्रण में हैं। देश में एक मजबूत और निर्णायक सरकार है जो ईमानदारी से अपना काम कर रही है। राजस्व बढ़ा है। विकास के अनेक काम हुए हैं और भविष्य की अनेक योजनाएं बनाई गई हैं। गांव, गरीब, किसान, महिला, युवा, शोषित, दलित, आदिवासी सभी वर्गों के लिए काम किए गए हैं। विकास का लाभ लोगों के घरों तक पहुंचे उनके हाथों और खातों तक पहुंचे इस सोच के साथ निरंतर काम किए गए। मैं समझता हूं कि भारत के लोग ऐसी सरकार जो देश में उनके जीवन में बदलाव ला रही है, उसे दोबारा चुनेंगे। लोग एक ऐसी सरकार के लिए जो सुशासन वाली है। ईमानदार है। भ्रष्टाचार की दुश्मन है। देश जिसके हाथों में सुरक्षित है। निष्ठावान नेतृत्व और गरीब के प्रति संवेदना रखने वाली सरकार है उसे पूरे देश का समर्थन मिलना तय है।
जब इतनी उपलब्धियां हैं तो पुलवामा और बालाकोट के नाम पर वोट मांगने की जरूरत क्या है?
हम उसके नाम पर वोट नहीं मांग रहे हैं। वो भी हमारा एक काम है। मैं मुंबई से आता हूं। 2008 में जब मुंबई में आतंकवादी हमले हुए। तीन दिन तक पूरी मुंबई दहशत में थी। कांग्रेस की सरकार केंद्र और राज्य में दोनों में थी। राज्य के मुख्यमंत्री तो एक फिल्म प्रोड्यूसर को साथ लेकर इस लालच में घूमते रहे कि उनके बेटे को फिल्म में रोल मिल जाए, उस घटना को कवर करते रहे। इससे ज्यादा घिनौनी कोई हरकत नहीं हो सकती। केंद्र में प्रधानमंत्री इतने कमजोर थे आतंकवाद के खिलाफ कुछ कर ही नहीं पाए।
अब गृहमंत्री हटा दिया, मुख्यमंत्री हटा दिया, उससे जनता को सुरक्षा कहां मिली। सुरक्षा तो तब मिले जब आतंकवादियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। लेकिन कांग्रेस के नेता तो सिर्फ हिंदुओं को आतंकवादी बनाने में लगे रहे और असली आतंकवादियों को कभी पकड़ा ही नहीं और बेबुनियाद आरोप लगाकर पूरे हिंदू समाज पर कलंक लगाने की कोशिश की। हमने जिस तरह मोदी जी ने सेना और सुरक्षा बलों को जो छूट दी उससे पूरे देश का मनोबल बढ़ा। आत्मविश्वास बढ़ा है। हम जब अपने काम का जिक्र करते हैं विकास का जिक्र करते हैं तो उसका भी जिक्र करते हैं। इसमें गलत क्या है। क्यों नहीं कांग्रेस ने आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की। क्यों आतंकवाद को पनपने दिया। क्यों कमजोर सरकार और तुष्टीकरण की नीति में फंसी रही।
एक धारणा बन गई है कि भाजपा को सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम और काम का ही सहारा है। बाकी पार्टी अप्रसांगिक हो गई है।
मैं समझता हूं कि यह धारणा सही नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने खुद इस बारे में कई बार स्पष्टीकरण दिया है कि वह भाजपा के कार्यकर्ता हैं। हमारी कैडर बेस पार्टी है। जिसे जो जिम्मेदारी दी जाती है उसे वो निभाता है। आज उन्हें प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई है जिसे उन्होंने पूरे पांच साल 24 घंटे काम करके बेहद ईमानदारी और निष्ठा से निभाया है। हम सबको अपने नेता पर नाज है। उनकी योग्यता कर्मठता और कार्यक्षमता पर गर्व है। पार्टी की भूमिका बेहद अहम है। पार्टी ही सरकार की नीतियों और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाती है। पार्टी ही उम्मीदवारों को टिकट देती है उन्हें जनता के सामने ले जाती है। लेकिन पार्टी का नेता तो एक ही रहेगा और वह मोदी जी हैं।
2018 में भाजपा अपने तीन बड़े राज्य हार गई। क्या इसका असर लोकसभा चुनावों में नहीं पडेगा।
छत्तीसगढ़ में जरूर हमारी अपेक्षा से विपरीत नतीजे आए। मध्य प्रदेश में बराबर की टक्कर रही। कांग्रेस को भी कोई बहुमत नहीं मिला और बसपा आदि के समर्थन से सरकार बनानी पड़ी। राजस्थान में भी मीडिया ने भाजपा की हालत जितनी कमजोर बताई थी, उतनी नहीं रही। हमारी 73 सीटें आईं और हमने कांग्रेस को 99 सीटों पर ही रोक दिया। पूर्ण बहुमत से कुछ कम। मैं समझता हूं कि इतना खराब प्रदर्शन नहीं रहा। मध्य प्रदेश में तो हमारे वोट कांग्रेस से ज्यादा रहे और राजस्थान में भी सिर्फ लाख डेढ़ लाख वोट ही पीछे थे। फिर विधानसभा चुनावों में राज्य में सरकार बनाने के लिए लोग वोट देते हैं, लेकिन लोकसभा चुनावों में देश की सरकार बनाने के लिए वोट दिए जाते हैं।
आप कह रहे हैं कि पिछली बार से ज्यादा सीटें आएंगी, जबकि 2014 में भाजपा अपने प्रभाव वाले राज्यों में अधिकतम स्तर पर सीटें जीती थी। उसमें अब कमी आना स्वाभाविक है।
कमी क्यों होगी। यह आप लोगों की धारणा है। जब हमने अच्छा काम किया है तो जनता हमें दोबारा मौका देगी। हमें तो कमी होने के कोई संकेत नहीं दिखते। एक आध सीट आगे पीछे हो सकती है। जबकि हम पश्चिम बंगाल में 23 सीट जीतने वाले हैं। उड़ीसा में 12 से 15 सीटें जीतेंगे। उत्तरपूर्व में भाजपा लगभग स्वीप कर रही है। तमिलनाडु केरल कर्नाटक में हम अच्छा करेंगे। इसीलिए पूरा भरोसा है कि 2014 से ज्यादा सीटें जीतेंगे।
अगर भाजपा और एनडीए को पूर्ण बहुमत में कुछ कमी रह गई तो संभावित सहयोगी दल कौन से हो सकते हैं। मायावती, जगन रेड्डी, नवीन पटनायक और चंद्रशेखर राव में कौन?
यह काल्पनिक सवाल है। आप अटकलें लगाते रहिए। हमें पूर्ण बहुमत मिलेगा। लेकिन राजनीति और चुनाव संभावनाओं का खेल है। राजनीति संभावनाओं के साथ साथ समझदारी का भी खेल है। हम अपने दम पर सरकार बनाएंगे।
पर मोदी जी तो कह रहे हैं कि ममता दीदी उन्हें बंगाली मिठाई भेजती हैं?
यह राजनीति में निजी रिश्तों का विषय है और राजनीतिक विरोध अपनी जगह निजी रिश्ते अपनी जगह। लेकिन पश्चिम बंगाल में जिस तरह राजनीतिक हिंसा हो रही है और मतदान के हर चरण में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, ये रुकने चाहिए। मेरा दीदी से अनुरोध है कि चुनावी लड़ाई खुले मन से मुद्दों पर शांति के वातावरण में लड़ी जानी चाहिए और फैसला जनता पर छोड़ देना चाहिए।
जिस तरह आडवाणी और जोशी को चुनाव से बाहर किया गया, वह क्या उचित तरीका है?
आडवाणी जी और जोशी जी पार्टी के वरिष्ठतम नेता हैं। उनका भाजपा को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान है। इन्होंने ही हम लोगों को राजनीतिक रूप से पाल पोस कर यहां तक पहुंचाया है। लेकिन नई पीढ़ी को आगे लाने की भी एक प्रक्रिया भाजपा में है। भाजपा ऐसी पार्टी है जो नए और युवा लोगों को आगे बढ़ने का मौका देती है। मुझे याद है मेरी मां भी तीन बार चुनाव जीतीं और चौथी बार उन्होंने खुद कहा कि अब मैं चुनाव नहीं लड़ूंगी और समाज सेविका की भूमिका में चली गईं। नाना जी देशमुख भी इसी पार्टी में थे जब उन्होंने 67 साल की उम्र में खुद को सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया था।
कांग्रेस ने न्याय योजना के तहत गरीवों को जो 72 हजार रुपये प्रति परिवार प्रति वर्ष देने की घोषणा की है, भाजपा उसका मुकाबला कैसे करेगी?
मुकाबले की जरूरत ही क्या है। आज तक मैं देश भर में घूम रहा हूं किसी ने मुझसे न्याय के बारे में नहीं पूछा कि यह क्या है। किसी को कांग्रेस के वादों पर भरोसा ही नहीं है। 1971 में मैं सात साल का था, जब कांग्रेस ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। 20-21 साल का था तो वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष के पिता जी ने खुलासा किया कि वह केंद्र से सौ रुपये भेजते हैं और सिर्फ 15 रुपये ही गरीबों तक पहुंचते हैं, बाकी रुपये बिचौलिए दलाल और उनकी पार्टी के भ्रष्ट नेता खा जाते हैं। उन्होंने यह स्वीकरोक्ति नहीं की बल्कि घोषणा की या खुद को बेनकाब किया।
2004 में जब मैं 40 साल का था तब राहुल गांधी की माता जी ने घोषणा की कि कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ। लगभग 55 साल का हूं कान पक गए कांग्रेस का झूठ और फरेब सुनते सुनते। कौन भरोसा करेगा इन पर। उन्हें पता है कि उनकी 50-60 सीटें भी नहीं आने वालीं तो कुछ भी बोल दो। हां, लेकिन सैम पित्रोदा जो राहुल गांधी के गुरु और राजनीतिक मेंटर हैं, उन्होंने स्पष्ठ कर दिया कि सब पर टैक्स लगेगा। मध्यम वर्ग पर गलत आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें और टैक्स देना चाहिए।
जिन तमाम योजनाओं से सरकार गरीबों को लाभ देती है, उन पर पुनर्विचार होना चाहिए। यह शायद कपिल सिब्बल और जयराम रमेश ने कहा। मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि मोदी जी ने गरीबों के लिए जो एक लाख 80 हजार करोड़ रुपये खर्च करके भारत के 80 करोड़ लोगों को खाद्य़ सुरक्षा के तहत सस्ता अनाज देते हैं, क्या कांग्रेस उसे बंद कर देगी। क्या किसानों को खाद की सब्सिडी बंद कर देगी। क्या कांग्रेस एक बार फिर महंगाई 15-20 फीसदी ले जाएगी। क्योंकि वित्तीय घाटा बढेगा। क्या एलपीजी का सिलेंडर जो सब्सिडी में 400 रुपये का मिलता है उसे फिर से एक हजार रुपये का कर देगी। कांग्रेस क्या करना चाहती है। कैसे देश चलाएगी। इसलिए देश के लोगों ने तय कर लिया है कि वह कांग्रेस को अब मौका नहीं देंगे।
नोटबंदी और जीएसटी को बड़े जोरशोर से लागू किया गया था, लेकिन अब चुनाव प्रचार में इनका जिक्र न प्रधानमंत्री करते हैं न अमित शाह और न ही कोई अन्य भाजपा नेता?
भ्रष्टाचार मिटाने में नोटबंदी का बड़ा योगदान है। उसका लाभ लोगों ने ले लिया। उसके बारे में बहुत बात भी हो गई। उसका उद्देश्य भ्रष्टाचार खत्म करना था और उसका लाभ देश को मिल गया। आज जनता देख रही है कि देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लग गई है। ईमानदारी से काम करने की संस्कृति बन गई है। देश एक ईमानदार अर्थव्यवस्था की तरफ बढ रहा है। फिर भी समय समय पर हम उसकी बात करते भी हैं। जीएसटी का भी जिक्र करते हैं। चुनाव प्रचार में भी करते हैं।
बेरोजगारी का बड़ा मुद्दा है। कहा जा रहा है कि 45 साल में सबसे खराब स्थिति है और सरकार आंकड़े भी दबा रही है। एनएसओ के दो अधिकारियों ने विरोध में इस्तीफा भी दिया।
पहली बात कोई दो अधिकारियों ने इस्तीफा नहीं दिया। वो दो अंशकालिक सदस्य थे। सरकार कोई भी आंकड़े नहीं दबा रही है। रिपोर्ट जब पूरी तरह तैयार ही नहीं हुई तो दबाने का क्या मतलब। जब तैयार हो जाएगी तो सार्वजनिक हो जाएगी। दूसरी बात समय समय पर आंकड़ों को तैयार करने की पद्धति भी बदलनी चाहिए। रही बात 45 साल में सबसे खराब स्थिति की तो यह कहने का तरीका है। पहले कहा जाता था कि भारत में चार फीसदी बेरोजगारी है और अगर बढ़कर छह फीसदी हो गई तो उसमें 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई।
जबकि बचपन में मैने यही सुना और पढ़ा कि भारत में सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी और अर्द्धबेरोजगारी की है और अर्द्धबेरोजगारी (अंडर एम्प्लायमेंट) ज्यादा बड़ी समस्या है। फिर रोजगार का अर्थ सिर्फ नौकरी या सरकारी नौकरी नहीं है। आज का युवा स्वावलंबी बनना चाहता है। स्किल इंडिया स्टार्टटप इंडिया डिजिटल इंडिया आदि नए नए प्रयोगों से युवा अनेक क्षेत्रों में अपना काम कर रहे हैं। आगे बढ़ रहे हैं। पूरी दुनिया में काम का ढंग बदल गया है। ऊबर और ओला जैसी टैक्सी सेवाओं में लाखों लोग जुड़े हैं। वो नौकरी तो नहीं कर रहे हैं। अपना काम करके इज्जत और ईमानदारी से अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं। वो नौकरी तो नहीं करते लेकिन काम करते हैं। काम और नौकरी का फासला अब देश ने तय कर लिया है।
किसानों की हालत को लेकर भी विपक्ष सरकार पर हमले कर रहा है?
देश में अभी कई जगह वर्षा आधारित खेती होती है। ये समस्या कोई पांच साल की नहीं दशकों से है। कांग्रेस के समय महाराष्ट्र जहां से मैं आता हूं करीब 70 हजार करोड़ रुपये सिंचाई के नाम पर खर्च कर दिए गए। लेकिन एक हेक्टेयर जमीन पर भी सिंचाई नहीं हुई। हम अब उन सारी योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करके ज्यादा से ज्यादा जमीन सिंचाई के दायरे में आए इसमें लगे हुए हैं। बारिश पर किसानों की निर्भरता खत्म हो इसके लिए सोलर पंप लगाने की योजना को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जिससे किसानों को कम खर्च में सिंचाई की सुविधा और बिजली मिलेगी और उनकी आमदनी भी बढ़ेगी।
अपने संकल्प पत्र में हमने घोषणा की है कि अगले पांच साल में 25 लाख करोड़ रुपये किसानों और ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर खर्च किए जाएंगे जिसमें पानी की समस्या,कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि, बहुफसली खेती, ड्रिप सिंचाई की तकनीक गांव गांव पहुंचे। देश भर की नदियों को जोड़कर बाढ़ और सूखे की समस्या हल करने की जिस परियोजना को कांग्रेस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था,उसे पूरा किया जाएगा। किसानों की फसलों के लिए बाजार, संरक्षण के लिए कोल्ड स्टोरेज की पूरी श्रंखला बने और कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विकास की योजना पर काम किया जाएगा।
राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक कानून भाजपा के मूल मुद्दे रहे हैं। पूर्ण बहुमत की सरकार 20 से ज्यादा राज्यों में अपनी और सहयोगी दलों के साथ सरकार, राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री सब भाजपा के। लेकिन इन पर कुछ नहीं हुआ। अब फिर आपके संकल्प पत्र में इन पर वादा।
ये आज भी हमारे मूल मुद्दे हैं। हमारे पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, जिससे हम अनुच्छेद 370, 35ए खत्म करने की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर पाते। जब भी हमारे पास दोनों सदनों में बहुमत होगा हम अपने इन मुद्दों को पूरा करेंगे। रही बात राम मंदिर की तो भाजपा आज भी कानूनी तरीके से राम मंदिर बनाने को प्रतिबद्ध है। जिस प्रकार से तेज गति से उसका निर्णय हो सकता था, उसमें अगर कांग्रेस ने बाधाएं नहीं डाली होतीं तो यह सुलझ सकता था। अब सिर्फ मालिकाना हक का मामला ही रह गया है और अगर कांग्रेस के नेता जो वकालत करते हैं कोर्ट में जाकर अड़चने डालते हैं। कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए कि वह राम मंदिर चाहती है कि नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक तरफ नारा है सबका साथ सबका विकास दूसरी तरफ प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से टिकट। क्या यह विरोधाभास नहीं है?
बिल्कुल नहीं। हमने जितने भी विकास के काम किए जाति धर्म या क्षेत्र देखकर नहीं किए। कोई भेदभाव नहीं किया। लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह पूरे हिंदू समाज को कलंकित करने की कोशिश की। हर हिंदू को शर्मसार करने की कोशिश की। इससे घिनौनी हरकत कोई दूसरी हो नहीं सकती। राहुल गांधी समेत पूरी कांग्रेस पार्टी को क्षमा मांगनी चाहिए। हिंदू मूल रूप से शांतिप्रिय और देशभक्त कौम है। कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकते। वैसे भी आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होती।
कोई धर्म किसी को आतंकवादी नहीं बनाता। कांग्रेस ने जिस तरह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को झूठे मामलों में फंसाकर हिंदू आतंकवाद का नारा गढ़ा और अदालत ने उन्हें न्याय दिया। इसलिए हमने प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उम्मीदवार बनाया कि लोगों को कांग्रेस को सबक सिखाने का मौका मिले और एक बार तय हो जाए कि कांग्रेस ने हिंदुओं को बदनाम करने की जो हरकत की उसके लिए उसे माफी मांगने की जरूरत है।