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Satya Pal Malik: आसान नहीं है मलिक पर 'शिकंजा' कसना, क्या किसान और जाटों की नाराजगी मोल लेगी भाजपा?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 24 Apr 2023 12:14 PM IST
सार

Satya Pal Malik: पश्चिमी यूपी से आने वाले सत्यपाल मलिक, कई पार्टियों में रहे हैं। सत्तर के दशक में चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल में शामिल होकर उन्हें पहली बार विधायक बनने का मौका मिला था। इसके बाद उन्होंने कई दलों के साथ अपनी राजनीतिक पारी खेली। अस्सी के दशक में उन्होंने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी...

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Not easy to lay hands on Satya Pal Malik, will BJP be able to the displeasure of farmers and Jats
Satya Pal Malik - फोटो : Agency

विस्तार

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक अपने खुलासों से केंद्र सरकार और भाजपा की मुसीबतें बढ़ाते जा रहे हैं। केंद्र ने भी मलिक पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। ऐसी संभावना है कि जब तक सीबीआई, मलिक से पूछताछ करेगी, तब तक उनके खिलाफ कुछ और मुद्दे तलाशे जा सकते हैं। जानकारों का कहना है कि मलिक पर हाथ डालना, उतना आसान भी नहीं है। यह बात तो खुद मलिक भी कई बार दोहरा चुके हैं कि मैं किसान समुदाय से आता हूं। वे यह दावा भी करते हैं कि उनके पीछे जाट जाति और किसान खड़े हैं। भाजपा ने उन्हें नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया तो उसकी दुर्गति हो जाएगी।

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पश्चिमी यूपी से आने वाले सत्यपाल मलिक, कई पार्टियों में रहे हैं। सत्तर के दशक में चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल में शामिल होकर उन्हें पहली बार विधायक बनने का मौका मिला था। इसके बाद उन्होंने कई दलों के साथ अपनी राजनीतिक पारी खेली। अस्सी के दशक में उन्होंने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी। हालांकि इससे पहले मलिक, लोकदल पार्टी से राज्यसभा सदस्य बन चुके थे। कुछ वर्ष बाद मलिक ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। उन्होंने जन मोर्चा पार्टी बनाई, लेकिन वह राजनीतिक जमीन तैयार में कामयाब नहीं हो सकी। नब्बे के दशक में उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। आखिर में वे भाजपा में आ गए। उन्हें पार्टी के किसान मोर्चे को मजबूत करने की जिम्मेदारी मिली। बाद में मलिक को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। यहीं से पार्टी में उनका कद बढ़ता चला गया। वे कई राज्यों के राज्यपाल रहे।

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किसान आंदोलन के दौरान मलिक, भाजपा को लेकर मुखर होने लगे। उन्होंने कई अवसरों पर भाजपा और इसके शीर्ष नेतृत्व को अपने बयानों से असहज स्थिति में ला दिया था। बागपत में किसानों की सभा में मलिक ने कहा था, दिल्ली की सीमाओं पर सात सौ किसान मारे गए। इतना कुछ होने पर भी प्रधानमंत्री की तरफ से संवदेना का एक संदेश तक नहीं आया। मेघालय के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने बयान दिया था कि किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो किसान फिर से खड़ा हो सकता है। केंद्र सरकार, किसानों को दबाकर नहीं रख सकती। वे अपना हक लेना जानते हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सत्यपाल मलिक, जाटों और किसान समुदाय से जितने समर्थन की अपेक्षा रखते हैं, संभव है कि उन्हें उतना न मिले। ये बात सही है कि उन्होंने राज्यपाल के पद पर रहते हुए किसानों के हक की बात की है।

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उन्होंने गत वर्ष हरियाणा के जींद में आयोजित एक सम्मान समारोह में किसानों से कहा था, वे लड़ने से पहले सवालों को समझें। वे सबसे पहले राज बदलें, फिर एकजुट होकर अपनी सरकार बनाएं। पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कथित तौर पर किसान आंदोलनकारियों के उस कदम को सही बताया था, जिसमें लाल किला पर 'निशान साहिब' फहराया गया था। मलिक ने कहा था, राज्यपाल के पद पर उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद वे देशभर का दौरा कर, किसानों को एकजुट करेंगे। केंद्र ने किसानों से आधा-अधूरा समझौता कर उन्हें धरने से उठा दिया। गत वर्ष अप्रैल में मलिक ने पीएम मोदी को लिखे पत्र में उनकी प्रशंसा भी की थी। उन्होंने कहा, सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर लाल किला में आयोजित समारोह में पीएम का भाग लेना, एक सराहनीय कदम है। इस समारोह के मंच से मोदी ने पूरे देश को संबोधित किया है। पीएम के इस कदम से सिख समुदाय में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी। सिखों के गुरुओं के प्रति प्रधानमंत्री ने जो श्रद्धा भाव एवं सम्मान व्यक्त किया है, उसके लिए पूरी दुनिया के और विशेषकर भारत के सिखों को एक सकारात्मक संदेश मिला है।

हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाता हैं। अगर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव को देखें तो जाट समुदाय ने भाजपा के समर्थन में वोट दिया था। किसान आंदोलन के दौरान भाजपा, मुश्किल में आ गई थी। राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए केंद्र सरकार ने तीनों कृषि बिलों को वापस ले लिया था। अब सभी राजनीतिक दल, 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति बना रहे हैं। ऐसे में भाजपा, मलिक के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई कर, राजनीतिक नुकसान उठाना नहीं चाहेगी।
 

भले ही मलिक ने पुलवामा हमले को लेकर जो खुलासा किया है, उससे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की छवि को नुकसान पहुंचा है। कांग्रेस एवं दूसरे विपक्षी दलों ने मलिक के बयान को जमकर भुनाया है। पहले मलिक को लगता था कि उनके साथ किसान हैं, जाट समुदाय है, लेकिन अब उन्हें कहीं न कहीं विपक्ष का साथ भी मिलता दिख रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ की गई कार्रवाई पर न केवल किसान और जाट मतदाता नाराज होंगे, बल्कि विपक्ष भी मलिक का साथ देकर उक्त दोनों समुदायों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करेगा।

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