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अध्ययन: दुनिया का कोई भी हिस्सा भीषण गर्मी से नहीं बचा, भारतीयों ने झेले 20 दिन ज्यादा जानलेवा तापमान
Fri, 06 Jun 2025 08:00 AM IST
शुभम कुमार
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 06 Jun 2025 08:00 AM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 12 महीनों में दुनियाभर में भीषण गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ा। भारत में लोगों को 20 अतिरिक्त तीव्र गर्मी वाले दिन झेलने पड़े, जबकि अरुणाचल में 44 और जम्मू-कश्मीर में 22 दिन। रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन को इसकी मुख्य वजह बताया।
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भीषण गर्मी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब दुनिया के हर कोने में साफ दिखने लगा है। पिछले 12 महीनों में दुनिया की लगभग आधी आबादी यानी करीब 400 करोड़ लोगों को औसतन 30 अतिरिक्त बेहद गर्म दिन झेलने पड़े हैं। यह बढ़ी हुई गर्मी 1991 से 2020 के बीच दर्ज सामान्य गर्म दिनों की तुलना में कहीं अधिक रही है। भारत में भी इसका सीधा असर महसूस किया गया।
देश में एक साल में लोगों को 20 अतिरिक्त दिन तीव्र गर्मी का सामना करना पड़ा। अरुणाचल प्रदेश में यह संख्या 44, जबकि जम्मू-कश्मीर में 22 दर्ज की गई। ये वे दिन थे जब तापमान अपने सामान्य स्तर से काफी अधिक था और शरीर पर इसका गंभीर प्रभाव देखा गया। यह जानकारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में दी गई है। जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी की वैश्विक बढ़ोतरी नामक यह रिपोर्ट वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन, क्लाइमेट सेंट्रल और रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड हीट एक्शन डे पर प्रस्तुत की गई है। इसमें मई 2024 से मई 2025 की अवधि में पड़ी गर्मी का गहन विश्लेषण किया गया है।
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गर्मी के दिनों में दोगुनी बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार 195 देशों और क्षेत्रों में बीते 12 महीनों में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। इस दौरान लू (हीटवेव) की 67 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें हर एक घटना पर जलवायु परिवर्तन की स्पष्ट छाप देखी गई। इन घटनाओं ने न सिर्फ स्वास्थ्य बल्कि संपत्ति और जीवन की गुणवत्ता पर भी गहरा असर डाला। गर्मी अब केवल एक मौसम नहीं बल्कि एक मानव-निर्मित आपदा बनती जा रही है।
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प्राकृतिक आपदाओं में इजाफा
रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 में मध्य एशिया और मई 2024 में प्रशांत द्वीपों में दर्ज गर्मी की असामान्य घटनाएं जलवायु परिवर्तन की भयावहता को दर्शाती हैं। यदि जलवायु परिवर्तन न हुआ होता तो इन क्षेत्रों में तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक कम होता और इन घटनाओं की आशंका 69 गुना कम होती।
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देश में एक साल में लोगों को 20 अतिरिक्त दिन तीव्र गर्मी का सामना करना पड़ा। अरुणाचल प्रदेश में यह संख्या 44, जबकि जम्मू-कश्मीर में 22 दर्ज की गई। ये वे दिन थे जब तापमान अपने सामान्य स्तर से काफी अधिक था और शरीर पर इसका गंभीर प्रभाव देखा गया। यह जानकारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में दी गई है। जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी की वैश्विक बढ़ोतरी नामक यह रिपोर्ट वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन, क्लाइमेट सेंट्रल और रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड हीट एक्शन डे पर प्रस्तुत की गई है। इसमें मई 2024 से मई 2025 की अवधि में पड़ी गर्मी का गहन विश्लेषण किया गया है।
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गर्मी के दिनों में दोगुनी बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार 195 देशों और क्षेत्रों में बीते 12 महीनों में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। इस दौरान लू (हीटवेव) की 67 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें हर एक घटना पर जलवायु परिवर्तन की स्पष्ट छाप देखी गई। इन घटनाओं ने न सिर्फ स्वास्थ्य बल्कि संपत्ति और जीवन की गुणवत्ता पर भी गहरा असर डाला। गर्मी अब केवल एक मौसम नहीं बल्कि एक मानव-निर्मित आपदा बनती जा रही है।
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प्राकृतिक आपदाओं में इजाफा
रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 में मध्य एशिया और मई 2024 में प्रशांत द्वीपों में दर्ज गर्मी की असामान्य घटनाएं जलवायु परिवर्तन की भयावहता को दर्शाती हैं। यदि जलवायु परिवर्तन न हुआ होता तो इन क्षेत्रों में तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक कम होता और इन घटनाओं की आशंका 69 गुना कम होती।
- गर्मी का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव कृषि, जल संसाधन, बिजली आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक व्यवस्था पर पड़ रहा है।
- किसान, श्रमिक, बच्चे और बुजुर्ग इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। शहरों में पानी की कमी, बिजली कटौती और कामकाज पर असर जैसे दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। तनाव, हिंसा और सामाजिक असंतुलन जैसी समस्याएं भी उभरने लगी हैं।