सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम तुष्टिकरण की हुई विदाई, धुर विरोधी दलों ने भी किया स्वागत
अयोध्या विवाद पर शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश की सियासत में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की विदाई की भी पटकथा लिख दी। बीती सदी के 80 के दशक के उत्तरार्ध से हिंदुत्व की राजनीति के धुर विरोधी रहे दलों ने बारी-बारी से राम मंदिर के पक्ष में दिए गए फैसले का स्वागत किया।
धुर विरोधी रही माकपा के तो पोलित ब्यूरो ने बयान जारी कर शीर्ष अदालत के फैसले का स्वागत किया। जबकि फैसले से असमंजस में घिरी तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी अब तक बयान भी जारी नहीं कर पाई हैं।
दरअसल बीती सदी के उत्तरार्ध में मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व की राजनीति का विरोध अपने उफान पर था। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के तहत ही अस्सी के दशक में ही राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था।
हालांकि इसके बाद बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर राजीव गांधी ने बहुसंख्यक तुष्टिकरण का भी दांव चला, मगर 90 का दशक आते आते पार्टी एक बार फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि जिस हिंदू वोटों के लिए राजीव गांधी ने विवादित परिसर का ताला खोला, उसकी चाबी भाजपा के हाथ लग गई।
नब्बे के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन उफान पर था तब भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ कांग्रेस समेत तमाम दलों ने मिल कर मोर्चा बंदी की। हालांकि दूसरे दलों की ओर से आंख मूंद कर की जा रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ने भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति को धीरे-धीरे खाद पानी देना शुरू किया।
हालात यहां तक पहुंच गए कि अपनी स्थापना के बाद 1984 के लोकसभा के पहले चुनाव में महज दो सीट और 8 फीसदी मत हासिल करने वाली भाजपा पहले सहयोगियों की बदौलत तो तीन दशक बाद अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब हो गई।
समानांतर ध्रुवीकरण का दौर
अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में ही विभिन्न दलों की तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ धीरे धीरे समानांतर धुव्रीकरण (हिंदू वोटों का पैरेलल पोलराइजेशन) का दौर शुरू हुआ। 1984 में महज दो सीट और 8 फीसदी मत हासिल करने वाली भाजपा को 1989 में 86, फिर 161 सीट मिले। इसकेबाद 1998 और 1999 में पार्टी को 182 सीटों की बदौलत 13 महीने और 5 साल तक केंद्र की सरकार चलाने का मौका मिला।
वर्ष 2014 में पार्टी अपने दम पर बहुमत (31 फीसदी वोट और 282 सीटें) तो 2019 में 37 फीसदी वोट और 303 सीटें हासिल कर देश की राजनीति में छा गई। एक समय ब्राह्मण बनिया और हिंदी पट्टी की पार्टी कही जाने वाली भाजपा एक समय अपने और सहयोगियों की बतौलत 22 राज्यों में शासन करने वाली पार्टी बन गई।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जिन्होंने शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने और विवादित परिसर का ताला खुलवाने के बाद कांग्रेस के दुष्चक्र में फंसने का दावा किया था उनका कहना था कि इसका यही अंजाम होना था। कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति ने भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति को खाद पानी दिया।
नब्बे के दशक में मंडल के दौर में हिंदुत्व की राजनीति धीरे धीरे मजबूत हुई, मगर बाद में इसे कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा। दरअसल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण की राजनीति मजबूत होती चली गई। इसी का परिणाम है कि केंद्र के साथ साथ ज्यादातर राज्यों में या तो भाजपा की सरकारें हैं या वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में आ गई है।