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Nameplate Dispute: नेमप्लेट से भेदभाव नहीं, स्वास्थ्य सुरक्षा हो प्राथमिकता; हिमाचल प्रदेश तक पहुंचा विवाद
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सार
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हिमाचल प्रदेश पहुंचा विवाद
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
उत्तर प्रदेश के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी अपने राज्य में दुकानदारों के लिए नेम प्लेट पर दुकानदारों की पहचान लिखना अनिवार्य किए जाने की बात कही है। अब तक कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल इसे योगी आदित्यनाथ सरकार की 'सांप्रदायिक राजनीति' बताकर भाजपा को कटघरे में खड़ा कर रहे थे, लेकिन एक कांग्रेसी मंत्री के द्वारा इसी तरह की बात किए जाने से पूरा मामला दूसरी तरफ मुड़ गया है।
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे मामले को लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से देखना चाहिए। जिस तरह बाजार में लगभग हर वस्तु में मिलावट पाई जा रही है, उसका बड़ा नुकसान हर वर्ग के उपभोक्ता को हो रहा है। इस मिलावट के कारण लोगों को तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। इसमें कैंसर जैसी घातक बीमारी भी शामिल है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस पूरे मामले में उपभोक्ता के स्वास्थ्य की कोई चर्चा नहीं की जा रही है और पूरा विवाद दुकानदारों की धार्मिक पहचान बताकर कथित तौर पर उनसे भेदभाव करने तक सीमित हो जा रहा है।
खाद्य मामलों के जानकारों के अनुसार, उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 में इस बात का उल्लेख भी किया गया है कि कोई उपभोक्ता जिस दुकान से सामान खरीदता है, उसे विक्रेता के बारे में पूरी जानकारी लेने का अधिकार है। यह प्रावधान किसी धार्मिक कोण को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था। लेकिन इस समय यह पूरा मामला हिंदू बनाम मुस्लिम में सिमटकर रह गया है।
'सही वस्तु बेचना दुकानदार का कर्तव्य और बाध्यता भी'
खाद्य मामलों की विशेषज्ञ कोमल वशिष्ठ ने अमर उजाला से कहा कि हमारे देश में कोई व्यक्ति किसी दुकान से सामान खरीदता है तो दुकानदार उसे सभी विकल्प या वेराइटी दिखाकर अपने कर्तव्य की समाप्ति समझ लेता है। यदि सामान खराब निकलता है तो दुकानदार यही कहता है कि उसने उपभोक्ता को सभी विकल्प दिखा दिए थे। ऐसे में सही विकल्प का चुनाव करना उपभोक्ता की जिम्मेदारी है।
कोमल वशिष्ठ ने कहा कि यह सोच पूरी तरह उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लंघन है। यदि किसी दुकान पर कोई बच्चा जाता है तो वह भी एक उपभोक्ता है, लेकिन वह किसी वस्तु की सही-गलत वेराइटी के चयन में सक्षम नहीं हो सकता है। ऐसे में दुकानदार को हर उपभोक्ता को सही गुणवत्ता की वस्तु उपलब्ध कराना दुकानदार की बाध्यता होनी चाहिए।
उपभोक्ता हर वस्तु का जानकार नहीं हो सकता
बात केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में वस्तुओं की गुणवत्ता की जानकारी रखना और उसे ग्राहक को देना कंपनी बनाने वाली कंपनी के बाद दुकानदारों की ही होती है। कोई दुकानदार अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। सच्चाई यह है कि कोई भी उपभोक्ता हर वस्तु का जानकार नहीं हो सकता। हर कोई वस्त्रों, भोजन सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक चीजों या खिलौनों का जानकार नहीं हो सकता। विशेषकर पैकेटबंद या खाद्य वस्तुओं में किस गुणवत्ता की वस्तु बेची जा रही है, इसको कोई वयस्क भी नहीं समझ सकता। ऐसे में सही गुणवत्ता की वस्तु सही मूल्य में पाना ग्राहक का अधिकार होना चाहिए।
दुकानदार के बारे में जानना भी ग्राहकों का अधिकार
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी कैब चालक की पहचान जानना सवारी की सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। जब से कैब चालकों द्वारा सवारियों के साथ अभद्रता करने, उन्हें लूटने की घटनाएं सामने आई थीं, तभी से सभी कैब चालकों की पहचान सवारी को होना अनिवार्य बना दिया गया है। कैब बुकिंग के समय ही सवारी को चालक के बारे में जानकारी मिल जाती है। किसी शिकायत पर उन्हें शिकायत करने का अधिकार भी मिलता है। ठीक इसी तरह, किसी दुकान से सामान खरीदते समय दुकानदारों की पहचान जानना ग्राहकों के अधिकारों को सुरक्षित करता है। इसे धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि ग्राहकों के स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
सभी अपना रहे योगी मॉडल
भाजपा के प्रवक्ता एसएन सिंह ने अमर उजाला से कहा कि विपक्ष भाजपा सरकारों के हर कदम को सांप्रदायिक बताकर उसकी आलोचना करता है। चाहे धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर उतारने की बात हो या दुकानदारों का नाम लिखने की बात, इसे हमेशा धार्मिक दृष्टिकोण दे दिया जाता है। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो ये सभी निर्णय लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैें और यही कारण है कि आम जनता इनका खुलकर स्वागत कर रही है।
एसएन सिंह ने कहा कि हिमाचल सरकार के मंत्री ने ग्राहकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही इस तरह का निर्णय लिया होगा। इससे भी समझ आना चाहिए कि यह लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया एक जनहितकारी निर्णय है। लिहाजा विपक्ष को दुकानदारों के नाम लिखने को धार्मिक या सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए।