अविश्वास प्रस्ताव : सत्ता पक्ष मस्त, विपक्ष उखाड़ेगा सरकार का तंबू
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार 20 जुलाई से चर्चा होनी है। अविश्वास प्रस्ताव टीडीपी लेकर आई और विधेयकों को पारित कराने, संसद को निर्बाध संचालित कराने की मजबूरी को देखते हुए संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने इसे स्वीकार कर लिया। लोकसभा अध्यक्ष ने इसे मंजूरी दे दी और शुक्रवार को इस पर चर्चा प्रस्तावित है। सत्ता पक्ष टीडीपी के इस अविश्वास प्रस्ताव के गिर जाने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त है, वहीं विपक्ष के नेता सरकार के हवा-हवाई तंबू को उखाड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार के अनुसार सरकार के पास सदन में सांसदों की पर्याप्त संख्या है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माथे पर भी अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कोई शिकन नहीं है। एनडीए के पास करीब 311 सांसदों की संख्या है। लोकसभा की वेबसाइट (20 जून 2018 को अपडेटेड) में प्रदर्शित संख्या के अनुसार भाजपा के पास 273 सांसद हैं। इसी आधार पर संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार कहते हैं कि अविश्वास प्रस्ताव पर सात घंटे की चर्चा होनी है। उसी दिन चर्चा और मत विभाजन दोनों होना है। शाम तक दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
कौन कहता है नंबर नहीं : सोनिया
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से जब अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष के पास सांसदों की संख्या के बाबत जानने की कोशिश हुई तो उन्होंने कहा कि कौन कहता है, हमारे पास नंबर नहीं है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि केंद्र सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिस पर उसकी पीठ थपथपाई जाए। टीडीपी, तृणमूल, आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल भी सदन में पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के लिए कमर कसकर तैयार हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का कहना है कि लोकसभा में चर्चा शुरू होने पर पार्टी अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में रहेगी। हम बताएंगे के कि पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने क्या किया है।
क्या है विपक्ष की रणनीति
विपक्ष को पता है कि सरकार के पास लोकसभा में पर्याप्त संख्या बल है। इसलिए अविश्वास प्रस्ताव का नतीजा केंद्र सरकार के पक्ष में जाना है, लेकिन इस बहाने उसे केंद्र सरकार के चार साल के राजकाज को लेकर सत्ता पक्ष को भरपूर कोसने का मौका मिलेगा।
कांग्रेस सांसद राजीव सातव के अनुसार भीड़ द्वारा लोगों पर हमला, यह इस सरकार के राजकाज में लगातार हो रहा है। महिलाएं सुरक्षित नहीं है, किसान आत्म हत्या कर रहे हैं, बदहाल हैं, आंदोलन कर रहे हैं। युवाओं के पास रोजगार नहीं है, उद्योग धंधों से लेकर हर क्षेत्र में स्थिति खराब है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद, हिंसा का वातावरण, बढ़ रही सैनिकों की शहादत, पाकिस्तान, चीन के साथ सरकार का घुटने टेकना, एमएसपी का मुद्दा जैसे तमाम विषय हैं। इसको लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरने की तैयारी कर रखी है। वहीं टीडीपी के लिए आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने जैसे मुद्दे हैं। समझा जा रहा है कि इस दौरान एक बार फिर विपक्ष केंद्र सरकार को जुमले बाज, झूठ बोलने वाली सरकार बताएगा।
सत्ता पक्ष की रणनीति
अच्छे वादे, नेक इरादे। यह मोदी सरकार का नारा है। इस नारे के साथ सरकार अपने चार साल की इमेज को पेश कर रही है। इसी को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार संसद में अपना जोरदार तरीके से पक्ष रखेगी। समझा जा रहा है कि चर्चा का जवाब खुद प्रधानमंत्री देंगे। प्रधानमंत्री अपने भाषण में सबका साथ, सबका विकास का खुद के द्वारा किया गया वादा के इर्द गिर्द सरकार के कामकाज को बताएंगे।
वह मौजूदा सरकार को देश के गरीबों, किसानों, वंचितों, युवाओं की सरकार बताते हुए देश की सशक्त सुरक्षा नीति, विदेश नीति का खाका खीचेंगे। यह मौजूदा सरकार का आखिरी मानसून सत्र है। दस महीने बाद देश में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। दिसंबर 2018 में मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होना है। इस चुनाव को 2019 में होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि केंद्र सरकार पूरी सख्ती के साथ विपक्ष के आरोपों की हवा निकालेंगी।
व्यंग और तंज
सात घंटे की चर्चा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के जहर बुझे तीर चलने तय हैं। सत्ता पक्ष भी जहां अपने व्यंग्य और तंज से विपक्ष की धार भोथरी करेगा, केंद्र सरकार के नीतियों और इसको लेकर राज्यों में लगातार मिल रही सफलता को आधार बनाकर देश की जनता के मिल रहे समर्थन से जोड़ेगा, वहीं विपक्ष सूट बूट की सरकार, जुमले बाज सरकार, यूपीए की नीतियों का नाम बदलने वाली सरकार जैसे कुछ व्यंग-तंज से सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है।
किसे कितना होगा फायदा?
सरकार और सत्ता पक्षः
अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ मिली सफलता से उसे सदन की एक वैधानिक मंजूरी मिल जाएगी। केंद्र सरकार और सत्ता पक्ष इसका इस्तेमाल सरकार की छवि बनाने में कर सकता है। इसके अलावा वह राज्यसभा या लोकसभा में बिलों को पारित कराने में विपक्ष से मिलने वाले असहयोग को आधार बनाकर उस पर नैतिक दबाव बढ़ा सकता है।
विपक्षः
टीडीपी को आंध्र प्रदेश में राजनीतिक लाभ मिल सकता है। राज्य में जनता का रुख देखकर ही केंद्र सरकार को समर्थन दे रही टीडीपी ने अपने कदम खींचे थे। इसके बाद से ही उसने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने की मांग को लेकर संसद की कार्यवाही को बाधित करना, अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देना शुरू कर दिया था।
तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत अन्य दलों केंद्र सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों तथा उसकी आलोचना करने का मंच मिलेगा।
कांग्रेस समेत उसके साथ सरकार के खड़े होने वाले विपक्षी दलों की एकता काफी मायने रखेगी। समझा जा रहा है कि यह एकता आने वाले समय में सत्ता पक्ष के खिलाफ लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले विपक्षी राजनीतिक दलों की एकजुट ताकत का एहसास कराएगा।