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सबसे ज्यादा इस पीएम के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव, जानें अब तक कितनी बार सरकारें गिरीं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 21 Jul 2018 03:04 PM IST
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जवाहरलाल नेहरू (फाइल फोटो)
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मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर उसे मुंह की खानी पड़ी है। मोदी सरकार के पक्ष में कुल 325 वोट पड़े जबकि अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में महज 126 वोट ही पड़े। इससे पहले साल 2003 में भी भाजपा सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में भाजपा के पक्ष में 325 वोट ही पड़े थे। तब देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और 2003 के बाद ये पहला मौका था जब विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया हो।
आजादी के बाद देश में पहली सरकार बनने के बाद से अब तक कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पेश हो चुके हैं। यहां तक कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव पेश हो चुका है। मोदी सरकार के खिलाफ ये पहला अविश्वास प्रस्ताव था।
कब आया था पहला अविश्वास प्रस्ताव
साल 1963 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ इतिहास का पहला अविश्वास प्रस्ताव किया गया था। यह प्रस्ताव समाजवादी नेता आचार्य कृपलानी ने पेश किया था। हालांकि तब नेहरू की सरकार ने रिकॉर्ड 347 मतों से अविश्वास प्रस्ताव पर विजय पा ली थी। लेकिन इसके बाद अविश्वास प्रस्तावों का सिलसिला ही शुरू हो गया।
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अविश्वास प्रस्ताव के कारण अब तक कितनी बार सरकारें गिरीं
अब तक सिर्फ तीन बार ही ऐसा हो सका है कि मौजूदा सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो और वो सरकार गिर गई हो। इनमें सबसे पहला नाम आता है वी. पी. सिंह का। भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद 7 नवंबर, 1990 को वी. पी. सिंह ने लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन उनके पक्ष में महज 152 वोट ही पड़े थे और 356 वोट उनके खिलाफ गए थे। इस कारण वी. पी. सिंह की सरकार गिर गई थी।
इसके बाद 11 अप्रैल, 1997 को एचडी देवेगौड़ा की सरकार भी सदन में विश्वास मत हासिल करने में नाकाम रही थी, जिससे उनकी सरकार गिर गई थी। उनके पक्ष में 190 वोट पड़े थे जबकि उनके खिलाफ 338 वोट पड़े थे। यह दूसरी बार था जब अविश्वास प्रस्ताव के कारण सरकार गिरी हो।
तीसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ ऐसा हुआ था। 17 अप्रैल, 1999 को वाजपेयी की सरकार सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाई थी, जिससे उनकी सरकार गिर गई थी। गौर करने वाली बात ये है कि वाजपेयी सरकार महज एक वोट से विश्वास प्रस्ताव हार गई थी। सरकार के पक्ष में कुल 269 वोट पड़े थे जबकि उसके खिलाफ 270 वोट पड़े थे।
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आजादी के बाद देश में पहली सरकार बनने के बाद से अब तक कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पेश हो चुके हैं। यहां तक कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव पेश हो चुका है। मोदी सरकार के खिलाफ ये पहला अविश्वास प्रस्ताव था।
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कब आया था पहला अविश्वास प्रस्ताव
साल 1963 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ इतिहास का पहला अविश्वास प्रस्ताव किया गया था। यह प्रस्ताव समाजवादी नेता आचार्य कृपलानी ने पेश किया था। हालांकि तब नेहरू की सरकार ने रिकॉर्ड 347 मतों से अविश्वास प्रस्ताव पर विजय पा ली थी। लेकिन इसके बाद अविश्वास प्रस्तावों का सिलसिला ही शुरू हो गया।
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अविश्वास प्रस्ताव के कारण अब तक कितनी बार सरकारें गिरीं
अब तक सिर्फ तीन बार ही ऐसा हो सका है कि मौजूदा सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो और वो सरकार गिर गई हो। इनमें सबसे पहला नाम आता है वी. पी. सिंह का। भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद 7 नवंबर, 1990 को वी. पी. सिंह ने लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन उनके पक्ष में महज 152 वोट ही पड़े थे और 356 वोट उनके खिलाफ गए थे। इस कारण वी. पी. सिंह की सरकार गिर गई थी।
इसके बाद 11 अप्रैल, 1997 को एचडी देवेगौड़ा की सरकार भी सदन में विश्वास मत हासिल करने में नाकाम रही थी, जिससे उनकी सरकार गिर गई थी। उनके पक्ष में 190 वोट पड़े थे जबकि उनके खिलाफ 338 वोट पड़े थे। यह दूसरी बार था जब अविश्वास प्रस्ताव के कारण सरकार गिरी हो।
तीसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ ऐसा हुआ था। 17 अप्रैल, 1999 को वाजपेयी की सरकार सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाई थी, जिससे उनकी सरकार गिर गई थी। गौर करने वाली बात ये है कि वाजपेयी सरकार महज एक वोट से विश्वास प्रस्ताव हार गई थी। सरकार के पक्ष में कुल 269 वोट पड़े थे जबकि उसके खिलाफ 270 वोट पड़े थे।
सबसे ज्यादा इनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ
अब तक सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ पेश किया गया है। उनके 15 वर्षीय कार्यकाल में कुल 15 बार प्रस्ताव पेश किया गया। अगस्त 1966 से मई 1975 के बीच उनके खिलाफ कुल 12 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ, जबकि मई 1981 से अगस्त 1982 के बीच कुल 3 बार उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ।
मनमोहन सिंह के खिलाफ कभी नहीं आया अविश्वास प्रस्ताव
अब तक हुए सभी प्रधानमंत्रियों (जिन्होंने कम से कम अपना एक कार्यकाल पूरा किया हो) में मनमोहन सिंह इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनके खिलाफ कभी भी अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं हुआ। हालांकि 2008 में लेफ्ट फ्रंट के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने खुद से ही विश्वास मत पेश किया था और जीत हासिल की थी।
अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले प्रधानमंत्रियों का इस्तीफा
अब तक कुल तीन बार ऐसा हुआ है जब अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग या उसे लोकसभा में पेश करने से पहले ही प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया हो। पहली बार जुलाई 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन उन्होंने इसपर सदन में मतदान से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
दूसरी बार 20 अगस्त, 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने प्रस्ताव पेश होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
तीसरी बार 28 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, भाजपा के पास तब पर्याप्त संख्याबल नहीं था।
मनमोहन सिंह के खिलाफ कभी नहीं आया अविश्वास प्रस्ताव
अब तक हुए सभी प्रधानमंत्रियों (जिन्होंने कम से कम अपना एक कार्यकाल पूरा किया हो) में मनमोहन सिंह इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनके खिलाफ कभी भी अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं हुआ। हालांकि 2008 में लेफ्ट फ्रंट के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने खुद से ही विश्वास मत पेश किया था और जीत हासिल की थी।
अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले प्रधानमंत्रियों का इस्तीफा
अब तक कुल तीन बार ऐसा हुआ है जब अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग या उसे लोकसभा में पेश करने से पहले ही प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया हो। पहली बार जुलाई 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन उन्होंने इसपर सदन में मतदान से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
दूसरी बार 20 अगस्त, 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने प्रस्ताव पेश होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
तीसरी बार 28 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, भाजपा के पास तब पर्याप्त संख्याबल नहीं था।