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रात की गर्मी से बिगड़ रही युवाओं की नींद: मानसिक सेहत पर डाल रही असर; अध्ययन में क्या खुलासा?
Fri, 09 Oct 2026 10:40 PM IST
डॉ. संजय पांडेय
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: डॉ. संजय पांडेय
Updated Fri, 09 Oct 2026 10:40 PM IST
सार
एक नए अध्ययन में सामने आया है कि रात में बढ़ता तापमान युवाओं की नींद और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। गर्म रातों में युवाओं का चिंता स्तर दिन के मुकाबले अधिक बढ़ा। तनाव के हार्मोन कोर्टिसोल, सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े संकेतकों में भी बदलाव दर्ज किए गए। क्या गर्म रातें युवाओं की बेचैनी और नींद की समस्या बढ़ा रही हैं? जलवायु परिवर्तन के बीच रात के बढ़ते तापमान को सेहत के लिए कितना गंभीर माना जाना चाहिए? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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नीद के कारण बढ़ रही बेचैनी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
गर्मी का असर केवल दिन की तपिश और पसीने तक सीमित नहीं है। रात में तापमान ऊंचा रहने से भी युवाओं की नींद और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि गर्म वातावरण में रहने के दौरान युवाओं में चिंता का स्तर बढ़ा। खास बात यह है कि दिन के मुकाबले रात की गर्मी के दौरान चिंता में अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही नींद की गुणवत्ता और अवधि में गिरावट तथा तनाव और शरीर में सूजन से जुड़े जैविक संकेतकों में बदलाव भी सामने आए। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्म रातों के बीच यह अध्ययन युवाओं की सेहत को लेकर नई चिंता पैदा करता है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े शोध जर्नल एनवायरनमेंट एंड हेल्थ में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि दिन और रात के अलग-अलग तापमान शरीर की जैविक प्रक्रियाओं तथा तत्काल महसूस होने वाली चिंता को किस तरह प्रभावित करते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गर्मी का आकलन करते समय केवल दिन के अधिकतम तापमान पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। रात का तापमान भी स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
शोध में किसे-किसे शामिल किया?
शोध में 18 से 25 वर्ष की आयु के 41 स्वस्थ कॉलेज विद्यार्थियों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों को नियंत्रित वातावरण में अलग-अलग तापमान की परिस्थितियों में रखा गया, ताकि गर्मी के संपर्क में आने के बाद उनकी मानसिक स्थिति और शरीर में होने वाले बदलावों का आकलन किया जा सके। सामान्य परिस्थितियों में कमरे का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस रखा गया। दिन में गर्मी के प्रभाव का आकलन करने के लिए तापमान 32 डिग्री, जबकि रात के परीक्षण के दौरान 30 डिग्री सेल्सियस रखा गया। दिन का परीक्षण सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक और रात का परीक्षण रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक चला।इसके बाद प्रतिभागियों में चिंता के स्तर और शरीर के भीतर होने वाले जैविक बदलावों की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से संबंधित संकेतकों के साथ मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़े बीडीएनएफ के स्तर का भी आकलन किया।
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रात में चिंता का स्तर ज्यादा बढ़ा
अध्ययन के नतीजों के अनुसार, दिन में गर्मी के संपर्क में आने पर प्रतिभागियों का स्टेट एंग्जायटी स्कोर 24.71 प्रतिशत बढ़ा। रात में गर्मी के दौरान इसमें 27.80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। स्टेट एंग्जायटी का अर्थ किसी खास समय या परिस्थिति में महसूस होने वाली चिंता से है।
यह अंतर इस ओर संकेत करता है कि रात की गर्मी तत्काल मानसिक परेशानी को बढ़ा सकती है। हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि प्रतिभागियों में मानसिक बीमारी विकसित हो गई। अध्ययन में चिंता के स्कोर में बदलाव दर्ज किया गया था, न कि किसी मानसिक विकार के निदान की पुष्टि हुई थी।
रात के दौरान शरीर में कई जैविक बदलाव भी सामने आए। सूजन से जुड़े संकेतक इंटरल्यूकिन-1 बीटा और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से संबंधित मालोनडायल्डिहाइड का स्तर बढ़ा। तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल में भी वृद्धि देखी गई, जबकि मस्तिष्क और तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज से संबंधित बीडीएनएफ का स्तर घटा। इसके विपरीत, दिन की गर्मी के दौरान मुख्य रूप से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े कुछ संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
नींद की कमी बढ़ा सकती है परेशानी
रात की गर्मी का एक महत्वपूर्ण पहलू नींद पर पड़ने वाला असर है। अध्ययन में गर्म रात के दौरान प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता में गिरावट और सोने की अवधि में कमी के संकेत मिले। शरीर को रात में आराम करने और अपनी सामान्य जैविक लय बनाए रखने के लिए अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है। तापमान अधिक रहने पर शरीर के लिए अतिरिक्त गर्मी बाहर निकालना कठिन हो सकता है, जिससे आरामदायक नींद में बाधा आ सकती है।युवाओं के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है। पढ़ाई, परीक्षा, नौकरी की तैयारी और अनियमित दिनचर्या के कारण पहले से ही कई युवाओं की नींद प्रभावित होती है। गर्म रातें इस परेशानी को और बढ़ा सकती हैं। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी महसूस हो सकती है। हालांकि, ये सामान्य रूप से नींद की कमी से जुड़ी संभावित परेशानियां हैं; इन्हें इस अध्ययन के आधार पर सभी प्रतिभागियों में हुआ प्रभाव नहीं माना जाना चाहिए।
तनाव के हार्मोन में बदलाव भी अहम
शोधकर्ताओं ने ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े मालोनडायल्डिहाइड और कोर्टिसोल को रात की गर्मी तथा चिंता के बीच संबंध समझने में महत्वपूर्ण पाया। विश्लेषण के मुताबिक मालोनडायल्डिहाइड ने इस संबंध का 14.42 प्रतिशत और कोर्टिसोल ने 6.88 प्रतिशत हिस्सा समझाने में भूमिका निभाई।कोर्टिसोल शरीर का महत्वपूर्ण तनाव हार्मोन है। यह शरीर की सामान्य जैविक लय के अनुसार दिन और रात में बदलता रहता है। गर्म वातावरण में इसके स्तर में बदलाव इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर को तापमान नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से जुड़े संकेतकों में बदलाव भी इस प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि इन निष्कर्षों से यह साबित नहीं होता कि रात की गर्मी ही चिंता बढ़ने का एकमात्र कारण है।
गर्म रातों से बचाव पर देना होगा ध्यान
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान के बीच रात की गर्मी को स्वास्थ्य संबंधी चर्चा में अधिक महत्व देने की जरूरत है। दिन में धूप से बचाव के साथ घरों और छात्रावासों में रात के समय तापमान कम रखने, पर्याप्त वेंटिलेशन और आरामदायक नींद की व्यवस्था पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। लगातार गर्मी रहने पर पर्याप्त पानी पीना और शरीर में गर्मी से जुड़ी परेशानी के संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना भी जरूरी है।लंबे समय तक गर्म रातों के संपर्क में रहने से मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे समझने के लिए बड़े और दीर्घकालिक अध्ययनों की आवश्यकता है।फिलहाल इस शोध का अहम संदेश यही है कि गर्मी का खतरा सूरज ढलने के साथ खत्म नहीं होता। रात में तापमान ऊंचा रहने से नींद और शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। युवाओं की सेहत के लिए बढ़ती गर्म रातों को भी गंभीरता से लेना जरूरी है।
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पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े शोध जर्नल एनवायरनमेंट एंड हेल्थ में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि दिन और रात के अलग-अलग तापमान शरीर की जैविक प्रक्रियाओं तथा तत्काल महसूस होने वाली चिंता को किस तरह प्रभावित करते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गर्मी का आकलन करते समय केवल दिन के अधिकतम तापमान पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। रात का तापमान भी स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
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शोध में किसे-किसे शामिल किया?
शोध में 18 से 25 वर्ष की आयु के 41 स्वस्थ कॉलेज विद्यार्थियों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों को नियंत्रित वातावरण में अलग-अलग तापमान की परिस्थितियों में रखा गया, ताकि गर्मी के संपर्क में आने के बाद उनकी मानसिक स्थिति और शरीर में होने वाले बदलावों का आकलन किया जा सके। सामान्य परिस्थितियों में कमरे का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस रखा गया। दिन में गर्मी के प्रभाव का आकलन करने के लिए तापमान 32 डिग्री, जबकि रात के परीक्षण के दौरान 30 डिग्री सेल्सियस रखा गया। दिन का परीक्षण सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक और रात का परीक्षण रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक चला।इसके बाद प्रतिभागियों में चिंता के स्तर और शरीर के भीतर होने वाले जैविक बदलावों की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से संबंधित संकेतकों के साथ मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़े बीडीएनएफ के स्तर का भी आकलन किया।
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रात में चिंता का स्तर ज्यादा बढ़ा
अध्ययन के नतीजों के अनुसार, दिन में गर्मी के संपर्क में आने पर प्रतिभागियों का स्टेट एंग्जायटी स्कोर 24.71 प्रतिशत बढ़ा। रात में गर्मी के दौरान इसमें 27.80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। स्टेट एंग्जायटी का अर्थ किसी खास समय या परिस्थिति में महसूस होने वाली चिंता से है।
यह अंतर इस ओर संकेत करता है कि रात की गर्मी तत्काल मानसिक परेशानी को बढ़ा सकती है। हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि प्रतिभागियों में मानसिक बीमारी विकसित हो गई। अध्ययन में चिंता के स्कोर में बदलाव दर्ज किया गया था, न कि किसी मानसिक विकार के निदान की पुष्टि हुई थी।
रात के दौरान शरीर में कई जैविक बदलाव भी सामने आए। सूजन से जुड़े संकेतक इंटरल्यूकिन-1 बीटा और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से संबंधित मालोनडायल्डिहाइड का स्तर बढ़ा। तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल में भी वृद्धि देखी गई, जबकि मस्तिष्क और तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज से संबंधित बीडीएनएफ का स्तर घटा। इसके विपरीत, दिन की गर्मी के दौरान मुख्य रूप से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े कुछ संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
नींद की कमी बढ़ा सकती है परेशानी
रात की गर्मी का एक महत्वपूर्ण पहलू नींद पर पड़ने वाला असर है। अध्ययन में गर्म रात के दौरान प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता में गिरावट और सोने की अवधि में कमी के संकेत मिले। शरीर को रात में आराम करने और अपनी सामान्य जैविक लय बनाए रखने के लिए अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है। तापमान अधिक रहने पर शरीर के लिए अतिरिक्त गर्मी बाहर निकालना कठिन हो सकता है, जिससे आरामदायक नींद में बाधा आ सकती है।युवाओं के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है। पढ़ाई, परीक्षा, नौकरी की तैयारी और अनियमित दिनचर्या के कारण पहले से ही कई युवाओं की नींद प्रभावित होती है। गर्म रातें इस परेशानी को और बढ़ा सकती हैं। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी महसूस हो सकती है। हालांकि, ये सामान्य रूप से नींद की कमी से जुड़ी संभावित परेशानियां हैं; इन्हें इस अध्ययन के आधार पर सभी प्रतिभागियों में हुआ प्रभाव नहीं माना जाना चाहिए।
तनाव के हार्मोन में बदलाव भी अहम
शोधकर्ताओं ने ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े मालोनडायल्डिहाइड और कोर्टिसोल को रात की गर्मी तथा चिंता के बीच संबंध समझने में महत्वपूर्ण पाया। विश्लेषण के मुताबिक मालोनडायल्डिहाइड ने इस संबंध का 14.42 प्रतिशत और कोर्टिसोल ने 6.88 प्रतिशत हिस्सा समझाने में भूमिका निभाई।कोर्टिसोल शरीर का महत्वपूर्ण तनाव हार्मोन है। यह शरीर की सामान्य जैविक लय के अनुसार दिन और रात में बदलता रहता है। गर्म वातावरण में इसके स्तर में बदलाव इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर को तापमान नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से जुड़े संकेतकों में बदलाव भी इस प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि इन निष्कर्षों से यह साबित नहीं होता कि रात की गर्मी ही चिंता बढ़ने का एकमात्र कारण है।
गर्म रातों से बचाव पर देना होगा ध्यान
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान के बीच रात की गर्मी को स्वास्थ्य संबंधी चर्चा में अधिक महत्व देने की जरूरत है। दिन में धूप से बचाव के साथ घरों और छात्रावासों में रात के समय तापमान कम रखने, पर्याप्त वेंटिलेशन और आरामदायक नींद की व्यवस्था पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। लगातार गर्मी रहने पर पर्याप्त पानी पीना और शरीर में गर्मी से जुड़ी परेशानी के संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना भी जरूरी है।लंबे समय तक गर्म रातों के संपर्क में रहने से मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे समझने के लिए बड़े और दीर्घकालिक अध्ययनों की आवश्यकता है।फिलहाल इस शोध का अहम संदेश यही है कि गर्मी का खतरा सूरज ढलने के साथ खत्म नहीं होता। रात में तापमान ऊंचा रहने से नींद और शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। युवाओं की सेहत के लिए बढ़ती गर्म रातों को भी गंभीरता से लेना जरूरी है।