नेताजी के बारे में एक और खुलासा, आखिर क्यों बनना पड़ा के.के. भंडारी
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क्या नेताजी सुभाष चन्द्र बोस 1945 में हुए विमान हादसे के बाद भी जीवित थे और 1963 में उत्तर बंगाल के एक आश्रम में के.के. भंडारी के नाम से रहते थे ? बीतें 27 मई को नेताजी से जुड़ी सार्वजनिक की गई फाइलों से तो ऐसे ही संकेत मिल रहें हैं। सार्वजनिक किए गए एक फाइल में कई बार भंडारी को ही नेता जी कहा गया है, लेकिन बाद की फाइलों में ऐसा कोई जिक्र नहीं है। वहीं एक और फाइल के मुताबिक 1963 में सरकार के उच्च अधिकारी भी इस शख्स को लेकर चर्चा करते थे।
इस मामले की शुरुआत नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़े उस पत्र से होती है जिसे शालमुरी आश्रम के सचिव रमानी रंजन दास के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखा था। इसके बाद नेहरू के मुख्य निजी सचिव के. राम इस बारे में इंटेलिजेंस ब्यूरो के तब के सेक्रेटरी बीएन. मलिक को 23 मई 1963 को एक टाप सीक्रेट पत्र भेजते हैं। मलिक इस लेटर का पत्र का जबाब 12 जून 1963 को देते हैं।
उसी साल 7 सितंबर 1963 को पीएमओ एक टॉप सीक्रेट नोट में भंडारी का जिक्र किया था। इसके बाद उसी साल 11 नवंबर को भी सरकार ने भंडारी का जिक्र किया था। इसके बाद इटेलिजेंस ब्यूरो ने 16 नवंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय को जबाब भेजा था।
वर्ष 1999 में गठित मुखर्जी आयोग को फाइल सौंपने के दबाव के चलते सरकार ने इन फाइलों का दर्जा नीचे करते हुए इन्हें टाप सीक्रेट से हटाकर सीक्रेट फाइल की श्रेणी में डाल दिया था। 5 जुलाई, 2000 को लिखे एक नोट में अंडर सेक्रेटरी (एनजीओ) ने लिखा कि, "जैसा कि डायरेक्टर से बातचीत की गई है, जहां अंडर सेक्रेटरी(राजनितिक) भी मौजुद थे, हम आईबी से कह सकते है कि वह 12 और 16 नवंबर 1963 को पीएम के निजी सचिव की ओर से आईबी को लिखे गए पत्रों को डाउनग्रेड कर दें।"
उस वक्त 1963 में शालुमरी बाबा के आगमन से पूरे देश में यह चर्चा गर्म हो गयी थी कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस वापस आ गए है। लेकिन मुखर्जी आयोग ने साफ तौर पर इनकार करते हुए कहा कि यह शख्स नेताजी नहीं है।