अर्थव्यवस्था की चुनौतियां: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर देना होगा खास जोर, केंद्र सरकार के फैसलों से क्यों खुश नहीं हैं कॉरपोरेट घराने?
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विस्तार
बदलते दौर के साथ देश के जॉब सेक्टर में कई चुनौतियां सामने आने वाली हैं। अगर इन चुनौतियां को हमने अवसर में नहीं बदला, तो यह देश में एक तबाही लेकर आएगी। क्योंकि आना वाला दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है। शुक्रवार को जवाहर भवन स्थित राजीव गांधी फाउंडेशन के समृद्ध भारत के तहत जवाहर भवन में नेशनल इकोनॉमिक कॉन्क्लेव आयोजित किया गया है। इसमें भारत के राज्य और उनकी अर्थव्यवस्था, भारत में नौकरियों की दिक्कत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
जीएसटी काउंसिल बनी राजनीति 'काउंसिल'
राज्य और उनकी अर्थव्यवस्था के पहले सत्र में इनवेस्टमेंट बैंकर और टेक्नोक्रेट प्रवीण चक्रवर्ती ने कहा कि जीएसटी की प्रणाली लागू होने के बाद राज्यों के पास पैसों की बहुत कमी हो गई है। बगैर पैसों के राज्यों के हालात बहुत खराब होते जा रहे हैं। कई महत्वपूर्ण योजनाओं का क्रियान्वयन बहुत ही धीमी गति से हो रहा है। कई राज्य अपने स्तर पर बहुत अच्छा काम करना चाहते हैं, लेकिन पैसों की कमी के कारण उनके हाथ भी बंधे हुए हैं। सरकार की जो जीएसटी काउंसिल जो है, वह एक सरकारी काउंसिल होता है लेकिन इस सरकार में राजनीति काउंसिल बनता दिख रहा है। वहां सब कुछ अपने हितों और भविष्य की राजनीति को देखकर निर्णय लिए जाते हैं। आज केंद्र सरकार के निर्णयों से कई कारपोरेट घराने और उद्योगपति भी नाखुश नजर आते हैं। नोटबंदी और जीएसटी जैसे निर्णयों से वह भी खुश नहीं है। लेकिन अपने व्यवसाय और राजनीतिक दबाव के चलते उन्होंने चुप्पी साध रखी है।
आज लोगों को डिलीवरी बॉय की नौकरी मिल रही है
पहले सत्र के ही कार्यक्रम भारत के राज्य और उनकी अर्थव्यवस्था को संबोधित करते हुए एमडी और सीईओ, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के महेश व्यास ने कहा कि आज भारत के कई राज्यों में विभिन्न प्रकार की विशेषताएं हैं। कई रास्ते आज हमारे लिए खुले हुए हैं। लेकिन देश में आज गुणवत्ता वाली नौकरी की जरूरत है। 90 और उसके बाद के दशक में लोगों को टाटा, मारुति और अन्य बड़ी कंपनियों में जॉब मिलती थी। लेकिन आज लोगों को डिलीवरी बाय की नौकरी मिल रही हैं। छोटे असंगठित क्षेत्र में आज बहुत तेजी से काम करने की जरूरत है। बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिल सकता है। यह वह क्षेत्र है, जहां महिलाएं आसानी से काम कर सकती हैं। आज लोगों को ऐसी नौकरी चाहिए जो लंबे समय तक सुरक्षित हो, जिससे उनकी आजीविका आसानी से चल सके। लोगों को सरकारी से ज्यादा प्राइवेट नौकरी ज्यादा पसंद आ रही है, लेकिन दोनों ही क्षेत्रों में नौकरियों की बेहद कमी बनी हुई है।
क्लस्टर पर फोकस करे सरकार
कॉन्क्लेव के दूसरे सत्र में भारत में नौकरियों के संकट पर चर्चा हुई। जाने-माने अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने कहा कि देश में बीते 20 साल में नौकरियों के क्षेत्र में कोई ग्रोथ नहीं हुई है। आज देश में जहां देखो वहां बेरोजगारी नजर आ रही है। डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, पुलिस से लेकर सभी क्षेत्रों में नौकरियों के तमाम अवसर है, लेकिन सरकार इस दिशा में कोई काम नहीं कर रही है। आज सरकार को निजी सेक्टर में जॉब के अवसर बढ़ाने के लिए क्लस्टर के क्षेत्र में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालय का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। न तो इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए कोई नीति लाई जा रही है, न ही रोजगार को लेकर कोई चर्चा करता है। अगर आज हर राज्यों में क्लस्टर को विकसित कर लिया जाए, तो राज्यों में नौकरियों में एक बड़े तबके की नौकरी की समस्या हल हो जाएगी।
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर
कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और समृद्ध भारत ट्रस्ट के ट्रस्टी गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि देश के जॉब सेक्टर में बहुत चुनौतियां हैं। अगर हम इन चुनौतियों को अवसर में बदलें तो बहुत अच्छा है। आज विश्व में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर है। इस दौर में हम मशीनों को फैसले लेने का अधिकार दे रहे हैं। आज विश्व में 64 फीसदी आईटी मार्केट और 40 फीसदी बीपीओ पर भारतीयों का कब्जा है।
सप्पल ने नीति आयोग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अगले चार से पांच वर्षों में 46 फीसदी ऐसी जॉब होगी जो दुनिया में कहीं है ही नहीं। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सॉल्यूशन पर लोगों को ट्रेंड करना, जो उपलब्ध डेटा है तो उसे हैंडल करना और उसका सही उपयोग करना शामिल है। लेकिन जब छात्रों को इस दिशा में सही शिक्षा और ट्रेनिंग नहीं मिलेगी, तो हम इस अवसर को गवां देंगे। भविष्य को देखते हुए आज शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की आवश्यकता है। देश में 70 के दशक में कृषि और अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम हुआ, 80 के दशक में कॉरपोरेट और इकोनॉमी के क्षेत्र में काम हुआ, 90 के दशक में बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम हुआ। लेकिन ये आजादी के बाद पहला दशक होगा जिसमें हम सब कुछ खो रहे हैं।