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'राष्ट्रगान ट्रैफिक सिग्नल नहीं, जिसे मानना ही पड़े'

Wed, 14 Dec 2016 11:44 AM IST
सौतिक बिस्वास / बीबीसी संवाददाता
सौतिक बिस्वास / बीबीसी संवाददाता Updated Wed, 14 Dec 2016 11:44 AM IST
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National Anthem not a Traffic Signal, whitch is irrecusable
तिरुअनंतपुरम में सोमवार को 12 लोग हिरासत में ले लिए गए। रविवार को चेन्नई में आठ लोगों को पीटा गया। दोनों ही मौकों पर मुद्दा एक ही था, राष्ट्रगान के दौरान खड़े ना होना। तिरुअनंतपुरम में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान ये घटना हुई जबकि चेन्नई में एक फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले जब राष्ट्रगान बज रहा था तब की ये घटना थी।
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तिरुअनंतपुरम वाली घटना में हिरासत में लिए एक व्यक्ति ने एक अखबार से कहा, " अगर हम खड़े हो जाते तो हमारी सीटें छिन जातीं।" सभी 12 लोगों पर सरकारी आदेश का पालन ना करने का मामला दर्ज किया गया और फिर छोड़ दिया गया। साफ है कि सरकारी अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के पिछले महीने दिए गए उस फैसले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं जिसमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने को अनिवार्य करार दिया गया है।
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अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा कि हर फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले राष्ट्रगान बजाना ही होगा। साफ है कि सरकारी अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के पिछले महीने दिए गए उस फैसले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं जिसमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने को अनिवार्य करार दिया गया है। अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा कि हर फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले राष्ट्रगान बजाना ही होगा।
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National Anthem not a Traffic Signal, whitch is irrecusable
कई लोगों का मानना है कि ये फैसला ऐसे वक्त में आया जब लोगों से देशभक्ति जाहिर करने को कहा जा रहा है। और जो लोग इन मांगों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं उन पर कार्रवाई की जा रही है। ऐसा पहली बार नहीं है जब राष्ट्रगान के प्रति सम्मान ना दिखाने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। अक्तूबर में भी राष्ट्रगान के दौरान खड़े ना होने पर एक विकलांग की पिटाई की गई थी।

पिछले तीन सालों के दौरान ऐसा कई बार हो चुका है, जब राष्ट्रगान का सम्मान ना करने पर लोगों को सिनेमाहॉल से बाहर निकाला गया, पीटा गया और हिरासत में लिया गया। 1971 में बने एक कानून के मुताबिक 'राष्ट्रगान गा रहे व्यक्ति या समूह को ऐसा करने में बाधा डालने पर तीन साल की कैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।' लेकिन उसके बाद कई राज्यों ने इस तरह के अपने-अपने कई कानून बनाए।

जैसे महाराष्ट्र में 2003 से ही सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के सिनेमाहॉलों के लिए अनिवार्य कर दिया है। सर्वोच्च अदालत के फैसले के मुताबिक, "सभी सिनेमाहॉल में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान बजेगा जिसके साथ राष्ट्रध्वज की तस्वीर होगी। इस दौरान लोगों को खड़े रहना होगा और सिनेमाहॉल के दरवाजे बंद कर दिए जाएंगे ताकि लोगों की आवाजाही ना हो।" बाद में अदालत ने उदारता दिखाते हुए विकलांगों के लिए खड़े होने की अनिवार्यता खत्म कर दी।
 

National Anthem not a Traffic Signal, whitch is irrecusable
आलोचकों ने फैसले पर राय देते हुए कहा कि, "ये नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है।" कुछ लोगों ने कहा, "लोगों से जबरन देशभक्ति के प्रदर्शन में हिस्सा लेने को कहा जा रहा है।" एक प्रख्यात लेखक ने कहा है कि देशभक्ति और सिनेमा का ये मेल बड़ा अजीब सा है। "सिनेमाहॉल के अंदर लहराते हुए राष्ट्रीय ध्वज को देखकर गर्व और देशभक्ति से ओतप्रोत होकर राष्ट्रगान के लिए खड़े होना अजीब सा जान पड़ता है, क्योंकि लोग अपनी दीन दुनिया के दुख-दर्द भूलकर मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते आते हैं।

" एक पूर्व राजनयिक के मुताबिक, "राष्ट्रगान कोई ट्रैफिक सिग्नल नहीं है जिसे मानना ही पड़े। कोई टैक्स नहीं है जिसे जमा करना ही पड़े।" राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "कहां तो एक तरफ लोगों को आसानी से इंसाफ नहीं मिल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अदालतों का दंभपूर्ण व्यवहार लोगों के मूल्यों और संस्थानों की आजादी पर हमले कर रहा है।
 

National Anthem not a Traffic Signal, whitch is irrecusable
"राष्ट्रगान, देशभक्ति दिखाने का और विरोध जताने का खुला तरीका माना जाता है। जापान में स्कूल शिक्षकों को चेतावनी दी जा चुकी है कि राष्ट्रगान के दौरान उन्हें खड़े रहना होगा। वहीं मैक्सिको में एक महिला पर राष्ट्रगान के शब्दों के साथ छेड़छाड़ के आरोप में जुर्माना भी लगाया गया था। वहीं सितंबर में मशहूर अमरीकी फुटबॉल खिलाड़ी कोलिन केपरनिक ने कहा था, "मुझे जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं।

" केपरनिक, एक दफा राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए थे। उन्होंने कहा था कि अमरीका में काले लोगों पर हो रहे कथित अत्याचार के विरोध में उहोंने ऐसा किया। प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर केविन क्रूज ने मुझे बताया, "कुछ दक्षिणपंथी लोग जो राष्ट्रीय विचारधारा की राजनीति करते हैं, वो राष्ट्रगान को अहम मुद्दा मानते हैं। 
 

National Anthem not a Traffic Signal, whitch is irrecusable
युद्ध के मौकों पर ऐसा अक्सर होता रहा है। वियतनाम युद्ध के वक्त राष्ट्रगान का राजनीतिकरण किया गया था।" भारत में जो हो रहा है वैसा दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी हो रहा है। इस दौर में असल राष्ट्रवाद के बजाय लोकप्रिय और नस्लीय राष्ट्रवाद का ज्यादा जोर है। राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलसीकर कहते हैं

कि, "दंड देने को आतुर अफसरशाही के दिमाग में पनप रहा राष्ट्रवाद, अनियंत्रित निगरानी और अधिकारवादी राज्य मशीनरी के रास्ते खोल देता है।"दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य और न्यायपालिका जब राष्ट्रवाद के रखवाले बन जाते हैं तो आम नागरिकों की स्वाधीनता को खतरा पैदा हो जाता है।
 
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