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‘फादर ऑफ फाइबर ऑप्टिक्स’ कहलाते हैं प्रो. कपानी, मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित

Tue, 26 Jan 2021 06:06 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Tue, 26 Jan 2021 06:06 AM IST
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Narinder Singh Kapany known as father of fiber optics posthumously awarded Padma Vibhushan
Narinder Singh Kapany - फोटो : Twitter

फाइबर ऑप्टिक्स शब्द सुनकर दिमाग में हाई-स्पीड इंटरनेट केबल का विचार आता है। विज्ञान की गहराइयों में जाकर समझो तो यह लचीले तंतुओं के माध्यम से प्रकाश को प्रसारित करने का विज्ञान है। कंप्यूटर से जुड़ी अधिकतर चीजों की खोज विदेश में हुई है, लेकिन कम ही लोगों को पता है कि फाइबर ऑप्टिक्स शब्द गढ़ने वाले नरिंदर सिंह कपानी भारत में पैदा हुए और यहीं पढ़े हैं। वे एक ऐसे गुमनाम हीरो हैं, जिसने दुनियाभर के अरबों लोगों के जीवन में योगदान दिया।

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फाइबर ऑप्टिक्स तकनीक खोजकर दुनिया में संचार क्रांति की नींव रखने वाले प्रो. नरिंदर सिंह कपानी की उपलब्धियों को आखिरकार अपने देश में भी उचित सम्मान मिल गया। केंद्र सरकार ने सोमवार को कपानी को मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजने की घोषणा की। पंजाब के मोगा में जन्मे ‘फादर ऑफ आप्टिक्स’ के नाम से मशहूर कपानी का पिछले महीने 94 साल की उम्र में अमेरिका में निधन हो गया। 
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कपानी के शोध और आविष्कारों में फाइबर-ऑप्टिक्स संचार, लेजर, बायोमेडिकल इंस्ट्रूमेंटेशन, सौर ऊर्जा और प्रदूषण निगरानी शामिल हैं। उनके पास सौ से अधिक पेटेंट हैं और नेशनल इन्वेंटर्स काउंसिल के सदस्य थे।
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फॉर्च्यून पत्रिका की तरफ से 1999 में दुनिया के सात ‘अनसंग हीरोज’ में चुने गए प्रो. कपानी ने स्नातक की पढ़ाई आगरा विश्वविद्यालय से की। उसके बाद उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई लंदन के इंपीरियल कॉलेज से की। वहीं से उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि ली। ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का प्रबंधन संभालने वाली भारतीय आयुध कारखाना सेवा (आईओएफएस) के अधिकारी के तौर पर करियर शुरू करने वाले कपानी करीब 45 साल पहले अमेरिका चले गए थे, जहां उन्हें दुनिया के प्रमुख भौतिक विज्ञानियों में गिना गया।

इंपीरियल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कपानी ने फाइबर के माध्यम से संचरण पर हेरोल्ड हॉपकिन्स के साथ मिलकर काम किया। इसी दौरान 1953 में उन्होंने पहली बार ऑप्टिकल फाइबर के माध्यम से एक फोटो को दूसरी जगह भेजने की उपलब्धि हासिल की, जो 1954 में फाइबर ऑप्टिक्स तकनीक के तौर पर दुनिया के सामने आई। कपानी ने ही 1960 में साइंटिफिक अमेरिकन के एक लेख में पहली बार दुनिया को ‘फाइबर ऑप्टिक्स’ शब्द दिया था। कपानी को नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया। फॉर्च्यून पत्रिका ने उन्हें एक बार दुनिया की दस सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में भी शामिल किया था।

पंजाब के मोगा में 31 अक्तूबर 1926 को जन्मे प्रो. नरिंदर सिंह कपानी का चार दिसंबर 2020 को अमेरिका में निधन हो गया। पीयू ने उन्हें विज्ञान रत्न पुरस्कार दिया था, लेकिन वे कार्यक्रम में पहुंच नहीं पाए थे। वह अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। उन्होंने अमेरिका में सिख धर्म का खूब प्रचार किया था। 

1952 में किया था अपने शोध का एलान
कपानी को फाइबर-ऑप्टिक्स का आइडिया एक कैमरे को देख कर आया था जिसमें प्रकाश के दिशा को लैंस और प्रिज्म के माध्यम से बदला जाता है। पहले उन्हें बताया गया था कि प्रकाश सीधी रेखाओं में आगे बढ़ता है। यही कारण है कि उन्होंने इस चीज पर शोध करना चाहा और वो इसके लिए लंदन पहुंच गए।


वहां उन्होंने इंपीरियल कॉलेज लंदन में दाखिला लिया। जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वे ऐसा सोचने वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं। वहां और भी छात्र इस पर शोध कर रहे थे। वे प्रकाश को किसी लचीले ग्लास के माध्यम से दूर तक भेजने को लेकर रिसर्च कर रहे थे। कपानी भी बिना देर किए एक साइंटिस्ट ‘हेरॉल्ड हॉपकिंस्ट’ के साथ मिलकर अध्ययन करने लगे और साल 1952 में दोनों ने नेचर पत्रिका में अपनी खोज का एलान किया।

ऑप्टिकल फाइबर पर 56 शोधपत्र लिखे हैं
डॉ कपानी ने ऑप्टिकल फाइबर के क्षेत्र में खूब काम किया है। उन्होंने 1955-1966 के बीच ऑप्टिकल फाइबर पर करीब 56 शोधपत्र लिखे। 

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