मुस्लिम महिलाएं शरिया कानून में खुद को महफूज मानती हैं : पर्सनल लॉ बोर्ड
पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूकी ने कहा कि पर्सनल लॉ बोर्ड या महिलाएं प्रस्तावित समान नागरिक संहिता कानून के खिलाफ नहीं है, लेकिन देश की मुस्लिम महिलाओं को इस कानून की जरूरत नहीं है। वह शरिया कानून की छाया में खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं।
तीन तलाक का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव के कारण केंद्र सरकार और कुछ मुस्लिम महिला संगठन इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं। पर्सनल लॉ बोर्ड सरकार के इस कदम का विरोध कर रहा है। बोर्ड ने शीर्ष अदालत में हलफनामा देकर कहा है कि हालांकि तीन तलाक ‘अवांछित’ है फिर भी इस्लाम में यह मान्य है। इसके पक्ष में बोर्ड ने हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है।
मुस्लिम महिलाएं इस बात पर एकमत हैं
बोर्ड की कार्यकारी सदस्य अस्मा जेहरा ने कहा कि पूरे देश की मुस्लिम महिलाएं इस बात पर एकमत हैं कि पर्सनल लॉ को बचाया जाए। उन्होंने कह कि मुस्लिम समाज में तलाक की घटना अन्य समुदायों के मुकाबले काफी कम है।
तलाक के बाद भी उनको भरण-पोषण का हक है। उधर कई महिला कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा देने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम संगठन महिलाओं की दुर्दशा पर आंखें मूंदे हुए हैं। तीन तलाक की प्रथा से महिलाएं काफी प्रभावित होती हैं।