वाराणसी के खरगूपुर की रामलीला में सौ साल से शामिल हो रहा मुस्लिम परिवार
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रामलीलाओं के मंचन को लोग भले ही मजहब से जोड़ने में जुटे हों, पर ऐसे मंचों की कमी नहीं है जो गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल हैं। वाराणसी के खरगूपुर की रामलीला भी इसी सौहार्द का प्रतीक है।
लगभग सौ साल से व्यास गद्दी से लेकर पात्र चयन तक गोराई डीहा गांव निवासी स्व. शाह मोहम्मद उर्फ शामा का परिवार शामिल होता चला आ रहा है। शाह के बाद इनके बेटे अली हसन उर्फ शोखन ने इस रामलीला के व्यास पीठ पर वाद्य यंत्र की कमान के साथ रामायण की बानी संभाली।
यहां दक्षिण मुखी प्राचीन श्री हनुमान मंदिर के प्रांगण में लगभग डेढ़ सौ वर्ष से रामलीला होता चला आ रहा है। लगभग डेढ़ माह पूर्व हसन की पत्नी नूरजंहा बेगम का बीमारी से इंतकाल हो गया उसके बाद भी इन्होंने अपने खानदानी परंपरा को टूटने नही दिया और रामलीला में शामिल होकर पात्र चयन के साथ व्यास पीठ पर वाद्य यंत्र के माध्यम से हिंदू मुस्लिम एकता का परचम लहराया।
मेरे अब्बा शाह मोहम्मद लगभग 75 वर्ष तक शामिल रहे
अली हसन ने बताया कि खरगूपुर की रामलीला में मेरे अब्बा शाह मोहम्मद लगभग 75 वर्ष तक शामिल रहे। पिता के इंतकाल के बाद उनकी विरासत को मैं लगभग 25 वर्ष से संभाल रहा हूं। हसन ने बताया कि अल्लाह के साथ भगवान श्री राम जी और श्री हनुमान जी को मै अपना आराध्य देव मानता हूं।
रामलीला कमेटी के अध्यक्ष डॉ. शशिकांत मिश्रा इसकी तस्दीक करते हुए बताते हैं कि अली हसन का परिवार लगभग सौ साल से रामलीला में शामिल होता चला आ रहा है।