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काश! केंद्र सरकार कान लगाकर छोटे-छोटे उद्योगों की पुकार सुन लेती तो अच्छा था...

Wed, 29 Apr 2020 08:30 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 29 Apr 2020 08:30 PM IST
सार

  • सूक्ष्म उद्योगों की आंख के सामने छाया है जीवन का अंधेरा
  • लॉकडाउन के दौरान कहां से लाएं स्टाफ की तनख्वाह

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MSMe sector has only hope from government stimulus package
MSME Sector - फोटो : Social Media (सांकेतिक)

विस्तार

सरकार को छोटी औद्योगिक इकाइयों के दर्द का शायद पता नहीं है। काश! कान लगाकर सुन लेती तो अच्छा था। नोएडा के गारमेंट के कारोबारी अनुराग स्वरूप अग्रवाल हैं। छोटी सी एमएसएमई के अंतर्गत पंजीकृत कंपनी है।

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कोई 40-50 लोगों के स्टाफ के साथ कपड़े की कढ़ाई आदि का काम करके बिचौलिए के माध्यम से बड़ी कंपनी को देते हैं। पैरामाऊंट जैसी कंपनियां उसे विदेशों में निर्यात करती हैं। अनुराग स्वरुप अग्रवाल की आंख के सामने भविष्य को लेकर अंधेरा छाया है। बड़ा सवाल यही है कि जाने कब काम धंधा शुरू होगा?

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पता नहीं कब मिलेंगे उधार के पैसे?

छोटे कारोबारी की 50-60 लाख रुपये की पूंजी बड़ी होती है। अनुराग की भी इतनी ही पूंजी उनके ग्राहकों के पास फंसी है। ग्राहक भी परेशान हैं। लॉकडाउन चल रहा है। विदेश में भी मॉल, मंडियां सब बंद हैं, उसके पास भी आगे से आर्डर नहीं आ रहा है। अब अनुराग को नहीं पता कि कब ग्राहक के पास काम आएगा?

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जब काम आएगा, तभी अनुराग की कंपनी को आर्डर मिलेगा? इसी दौरान कुछ पुराने काम के बदले फंसे पैसे का एक हिस्सा भी मिल सकेगा। यह सब सवाल अभी भविष्य में ही छिपा है।

क्योंकि पूरी सप्लाई चैन, बिजनेस चैन पर लॉकडाउन है। इसलिए यदि सरकार 3 मई के बाद काम करने की छूट दे भी दे, तब भी न जाने कितने दिन में खर्चा चलाने भर का ही सही कामकाज शुरू हो पाएगा?

यह देनदारी भी बढ़ा रही है दर्द

प्रतिदिन और माहवारी के हिसाब से काम करने वालों को अनुराग कोई साढ़े पांच लाख रुपये तनख्वाह में बांटते हैं। बताते हैं पीएफ, ईएसआई का पैसा भी समय से जमा कराते हैं, ताकि क्रेडिट बना रहे। कंपनी के ऊपर कोई 2.15 करोड़ रुपये का लोन है, सालाना 32 लाख रुपये की ईएमआई देते हैं।

महीने भर में बिजली का बिल कोई एक लाख रुपये आ जाता है। दर्द है कि काम-धंधा तो अचानक ठप हो गया है, इसकी भरपाई कैसे हो? बताते हैं हाल में आरबीआई के प्रयासों के बाद बैंक ने वर्क कैपिटल लिमिट 10 फीसदी बढ़ाने की जानकारी दी।

कंपनी को बैंक ने 3-4 लाख रुपये देने का ऑफर किया। अनुराग जानते हैं कि बैंक पैसा तो दे देगा, लेकिन वह लौटाएंगे कैसे? क्योंकि काम के पटरी पर आने का समय नहीं पता।

सरकार जेल में डाल दे....हम क्या कर सकते हैं?

अनुराग अग्रवाल और उनके जैसे तमाम छोटे और मझोले उद्यमियों का कर्मचारियों को लॉकडाउन अवधि का पूरा वेतन देने के सवाल पर बेबसी भरा उत्तर है। बताते हैं अखबार या मीडिया के माध्यम से अनुराग को पता चलने पर कि लॉकडाउन के दौरान वर्कर को तनख्वाह न देने पर सरकार जेल में डाल देगी, छटपटाहट बढ़ा देगी।

स्क्रीन पर प्रधानमंत्री मोदी ऐसी अपील करते हैं, तो तकलीफ बढ़ जाती है। अनुराग को लगता है कि सरकार निर्दयी हो रही है। खुद कुछ नहीं कर रही है, कोई राहत पैकेज की घोषणा नहीं कर रही है, उल्टें बंद पड़े काम धंधे के बाद केवल टेंशन बढ़ा रही है।

कहां से लाएं आखिर तनख्वाह? कैसे दें? खुद का ही जहां खर्च चलना भारी पड़ रहा हो? अनुराग खुद सवाल करते हैं कि आखिर सरकार जिस दरियादिली की अपेक्षा कर रही है, उसे कैसे पूरा करें?

बड़े पैमाने पर लोग होंगे बेरोजगार

अनुराग की तरह की दिल्ली की अनऑथराइज्ड कालोनी में तमाम छोटी-छोटी ईकाइयां चलती हैं। कंपनियों के लिए लघु उद्योगों में काम होता है। शिव प्रकाश स्कूली बच्चों की कापियां बनाते हैं, खोड़ा के अमित कुमार जींस के कपड़े की रंगाई आदि का काम करते हैं।

दिल्ली के लक्ष्मीनगर से लेकर गांधी नगर रेडीमेड गारमेंट का बड़े पैमाने पर काम होता है। सीआईआई नार्थ इंडिया के चयरमैन दिनेश दुआ, एमएसएमई ईंटरप्राइजेज के अनिल भारद्वाज कहते हैं कि इन सभी के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

खुद अनुराग बताते हैं कि 3 मई के बाद अगर लॉकडाउन से छूट मिली, तो जुलाई तक कुछ काम धंधा पटरी पर आ सकता है, तब भी वह 40-50 लोगों का स्टाफ नहीं रख सकते। क्योंकि वर्किंग कैपिटल नहीं है।



सीआईआई के दिनेश दुआ कहते हैं कि अनुराग अपनी जगह सही हैं। यदि केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो लाखों नहीं कुछ करोड़ लोगों का जीवन प्रभावित होना तय है।

 

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