MP election: क्यों कांग्रेस के लिए घर-घर जाकर वोट मांग रहा चंबल का 'रॉबिन हुड'? भाजपा के लिए बन रहा चुनौती
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विस्तार
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर प्रचार जोर-शोर से हो रहा है। तमाम राजनीतिक दलों के बड़े नेता रैली ओर जनसभाओं के जरिए मतदाताओं को लुभाने में लगे हैं। इस बीच ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में एक पूर्व डकैत घर-घर जाकर कांग्रेस पार्टी के लिए वोट मांगता हुआ नजर आ रहा है।
एक समय में ग्वालियर-चंबल में खूंखार डकैत रहे 81 वर्षीय मलखान सिंह कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करते दिख रहे हैं। माथे पर लाल तिलक और चौड़ी मूंछें रखे मलखान सिंह की छवि क्षेत्र में अब भी रॉबिन हुड वाली है। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ठाकुर बहुल ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी है। इसमें 34 विधानसभा सीटें शामिल हैं। 34 में से कम से कम 20 सीटों पर बड़ी संख्या में ठाकुर मतदाता हैं, जिनमें परिहार वंश भी शामिल है, जिससे मलखान सिंह आते हैं। मलखान सिंह भिंड में पार्टी के कद्दावर नेता और विपक्ष के नेता डॉ. गोविंद सिंह के नामांकन के दौरान उनके साथ नजर आए थे। मलखान खिरया गांव भी गए थे। इस दौरान उन्होंने करेरा निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस विधायक प्रागीलाल जाटव के लिए परिहारों से वोट देने की अपील की थी।
मलखान सिंह इससे पहले 1998 और 2003 में करेरा विधानसभा सीट से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं। लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मलखान सिंह और उनके एक साथी पूर्व डकैत मोहर सिंह ने भाजपा के लिए प्रचार किया था। लेकिन बाद में पद नहीं मिलने के चलते भाजपा को छोड़ दिया। इसी साल कांग्रेस में शामिल हुए मलखान सिंह को पार्टी ने ग्वालियर—चंबल संभाग में प्रचार का जिम्मा सौंपा है। कांग्रेस में शामिल होते समय मलखान सिंह ने कहा था कि विधानसभा चुनावों में भाजपा का ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से सफाया हो जाएगा।
यह है मलखान सिंह का इतिहास
मलखान सिंह ने 1998 और 2003 में करेरा से दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहे। इसके बाद में वह ठाकुर और गुर्जर समुदायों से मिले लगभग 14,000 वोटों के साथ चौथे स्थान पर रहे। दरअसल, 1989 में जेल से रिहा होने के बाद से मलखान सिंह ने कई बार पार्टियां बदलीं। 1990 के दशक में वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नरेंद्र मोदी के समर्थन में प्रचार किया था। जबकि 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उन्होंने आरएलडी के अजीत सिंह का समर्थन किया था। एमपी में 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के लिए प्रचार किया था, लेकिन अगस्त 2023 में मलखान ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया।
कांग्रेस को 40 सीटों पर होगा फायदा
ग्वालियर चंबल क्षेत्र के राजनीतिक जानकार कहते है कि मलखान सिंह खंगार जाति से हैं। वे सामाजिक तौर पर पूरे प्रदेश में खंगार समाज के संगठन की राजनीति करते रहे हैं। शिवपुरी, भिंड, दतिया और बुंदेलखंड क्षेत्र की लगभग 40 सीटों पर खंगार समाज का अच्छा वोट बैंक है। पिछले विधानसभा चुनाव तक खंगारों का 99 फीसदी वोट भाजपा को मिला था। अब मलखान सिंह के चलते ये अब कांग्रेस को मिलेगा। इसके अलावा मलखान सिंह जब चंबल में थे तो, उनकी छवि रॉबिनहुड की थी, जो आज भी बरकरार है। इसी के चलते भोपाल, ग्वालियर, मुरैना आदि क्षेत्रों में भी उनसे जुड़े लोगों की काफी संख्या है, जो कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होगा। दूसरा मलखान सिंह एक बड़ा नाम है, इससे कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनेगा।
कुछ ऐसी है मलखान सिंह की कहानी
मलखान सिंह 70 के दशक में चंबल के सबसे बड़े डकैत थे। भिंड जिले के बिलाल गांव की 75 फीसदी से अधिक जमीनों पर कैलाश नारायण नाम के दबंग का कब्जा था। उनके चाचा प्रदेश सरकार में मंत्री थे। पुलिस भी इसी परिवार की सुनती थी। दबंगई के चलते कई सालों से गांव की सरपंची इस परिवार के कब्जे में थी।
गांव के मंदिर के नाम से 100 बीघा जमीन थी, इस पर भी इसी परिवार ने कब्जा जमा लिया था। ये बात 17 साल के मलखान सिंह को नागवार लगती थी। वह इस दबंग परिवार के खिलाफ गांव वालों को एकजुट करने लगा। ये बात इस परिवार तक पहुंची तो पुलिस से कहकर मलखान को एक झूठे मामले में जेल भिजवा दिया।
जेल से जमानत मिलने पर, मलखान सिंह खुलकर इस परिवार का विरोध करने लगे। सरपंची के चुनाव में उन्होंने पर्चा तक भर दिया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने नदी किनारे मंदिर की 100 बीघा की जमीन का मुद्दा भी उठाना शुरू कर दिया। इससे कैलाश नारायण नाराज हो गया और मलखान के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी कि चंबल में सक्रिय डाकू गिरदारिया से ये संपर्क रखता है।
यह वो दौर था, जब पुलिस पर सबसे अधिक पक्षपात के आरोप लगते थे। चंबल के अधिकतर बागी इसी पक्षपात के चलते बीहड़ में उतरे थे। उस समय भी ऐसा ही हुआ। पुलिस मलखान को गांववालों के सामने पीटते हुए ले गई। इसके बाद कैलाश के एक खास आदमी की हत्या हुई तो इसका भी आरोप मलखान पर मढ़ दिया गया। होली के दिन मलखान के एक दोस्त की हत्या कर दी गई। इसके बाद मलखान बागी बन कर बीहड़ में उतर गए।
मलखान सिंह बीहड़ में उतरे तो अपने चचेरे भाई और दोस्तों के साथ मिलकर खुद का गैंग बनाया। हथियार के लिए अपहरण और लूट की वारदातों को अंजाम दिया। गैंग मजबूत हुआ तो मलखान सिंह एक रात गांव लौटे और कैलाश नारायण के घर पहुंच गए। माइक से एनाउंसमेंट करके कैलाश को ललकारा। कैलाश के निकलते ही मलखान सिंह और उसकी गैंग ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। इतनी फायरिंग के बावजूद कैलाश जिंदा भाग निकला।
काफी दिनों बाद मलखान ने कैलाश को ढूंढने में सफलता हासिल की और उसकी हत्या कर दी। डाकू बनने के बाद 15 सालों तक बीहड़ ही उनका ठिकाना बना। पुलिस ने एक के बाद एक कई मुकदमे उन पर लाद दिए थे, इसलिए वापसी की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। मलखान सिंह की गैंग के साथ कुछ ही सालों में 100 से अधिक लोग जुड़ गए। चंबल में उस समय सबसे बड़ा गिरोह मलखान सिंह का ही हुआ करता था। मलखान सिंह की गैंग की दहशत एमपी के भिंड, मुरैना, यूपी के इटावा, जालौन, आगरा और राजस्थान के धौलपुर तक थी।
विदेशी हथियारों के शौकीन थे मलखान सिंह
चंबल में उस समय कई दूसरे डकैत भी सक्रिय थे। फूलन देवी भी चंबल में उतर चुकी थी। मलखान सिंह की गिरोह के साथ दूसरे डकैतों की कई दफा मुठभेड़ भी हुई, लेकिन वे किसी डाकू की जान नहीं लेते थे। मलखान सिंह ने नियम बना रखा था कि ऐसी मुठभेड़ में सिर्फ सामने वाले डाकू के कमर के नीचे ही गोली मारी जाएगी।
इससे दूसरे डाकुओं की नजर में मलखान सिंह की इज्जत बढ़ने लगी। सभी उन्हें प्यार से दद्दा बुलाने लगे, जो आज भी उनका 'निकनेम' है। उस समय जब पुलिस के पास स्टेनगन और एके-47 जैसे हथियार नहीं थे, तब मलखान सिंह के पास ये विदेशी हथियार आ चुके थे। उनके पास स्टेनगन से लेकर सेल्फ लोडिंग अमेरिकन राइफल, इटैलियन दूरबीन, एके-47, कार्बाइन जैसे हथियार थे। मलखान एक हाथ में अमेरिकन राइफल और दूसरे हाथ में लाउडस्पीकर लेकर चलते थे।