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श्रद्धांजलिः हर आम और खास के लिए खुले रहते थे मोतीलाल वोरा के दरवाजे
Mon, 21 Dec 2020 07:14 PM IST
Harendra Chaudhary
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Mon, 21 Dec 2020 07:14 PM IST
सार
मोतीलाल वोरा की वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी थी और 1972 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। वह उन दिनों के मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाके के रायपुर स्थित एक सहकारी बैंक में काम करते थे और दिल्ली से प्रकाशित एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्र के लिए अंशकालीन संवाददाता भी थे...
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motilal vora with Rahul Gandhi, Ahmed Patel and Ashok Gehlot
- फोटो : PTI (File Photo)
विस्तार
मोतीलाल वोरा नहीं रहे। उनके निधन से कांग्रेस के उन असंख्य कार्यकर्ताओं को सबसे ज्यादा दुख होगा जिनके लिए कांग्रेस मुख्यालय में मोतीलाल वोरा के कमरे के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे। देश के किसी भी कोने से कोई भी पार्टी कार्यकर्ता उनके पास आकर अपनी शिकायत और समस्या कह कर यह संतोष पा जाता था कि पार्टी में कहीं तो किसी स्तर पर उसकी सुनवाई हुई। क्योंकि जबकि कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के घरों और कार्यालयों के दरवाजे आम कार्यकर्ता के लिए बंद रहते हैं (यूपीए सरकार के दिनों में यह आम बात थी), तब सिर्फ वोरा का ही कार्यालय ऐसा था जहां पहुंचकर लोग न सिर्फ अपनी बात कह पाते थे, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी मिलता था कि उनकी सुनवाई जरूर होगी।
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कांग्रेस के पूर्व कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने सोमवार की दोपहर राजधानी के एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली। उन्होंने रविवार को ही अपने जीवन के 92 वर्ष पूरे करके 93वें साल में प्रवेश किया था। आयु के लिहाज से वोरा कांग्रेस और भारतीय राजनीति की पुरानी पीढ़ी के जाने-माने नेताओं में एक थे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी कांग्रेस के इस बुजुर्ग नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि वह न सिर्फ एक सफल राजनेता थे बल्कि एक बेहद संवेदनशील और बेहतरीन इंसान भी थे। उनके जाने का शोक हर कांग्रेस कार्यकर्ता को है।
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कांग्रेस के पूर्व महासचिव और वर्षों तक कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड में वोरा के सबसे निकट सहयोगियों में माने जाने वाले पार्टी के वरिष्ठ नेता जनार्दन दिवेदी के शब्दों में राजनीति में जिस शालीनता और सांस्कृतिक बनावट की अपेक्षा होती है वोरा जी में वह पूरी तरह थी और उनके हमारे बीच न रहने से इस राजनीतिक संस्कृति का एक और प्रतीक चला गया।
दरअसल मोतीलाल वोरा की वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी थी और 1972 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। वह उन दिनों के मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाके के रायपुर स्थित एक सहकारी बैंक में काम करते थे और दिल्ली से प्रकाशित एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्र के लिए अंशकालीन संवाददाता भी थे। सुदूर छत्तीसगढ़ से निकलकर वह जल्दी ही मध्य प्रदेश की राजनीति में छा गए और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और बाद में राज्य के मुख्यमंत्री भी बने।
बाद में केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी बने। मेरा उनसे सक्रिय संपर्क तब हुआ जब वह उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था। वोरा की प्रशासनिक क्षमता का सही उपयोग उत्तर प्रदेश में हुआ जब उन्होंने राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य का शासन राज्यपाल से ज्यादा एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के अंदाज में चलाया।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश जिसमें उत्तराखंड भी शामिल था, भौगोलिक दृष्टि से दूसरा और आबादी की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य था। उत्तराखंड से बुंदेलखंड और गाजियाबाद से गोरखपुर तक अनेक तरह की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधताओं वाले इस राज्य के हर जिले में राज्यपाल मोतीलाल वोरा का हेलीकॉप्टर उतरता था और जिले में होने वाले सभी विकास कार्यों की समीक्षा और निगरानी वह अपने सलाहकारों के माध्यम से स्वयं करते थे। उनके विशेष कार्याधिकारी मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी एलके जोशी और उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अशोक प्रियदर्शी इसमें उनकी सहायता करते थे।
वोरा के कार्यकाल में लखनऊ का राजभवन आम जनता और मीडिया के लिए 24 घंटे खुला रहता था। कोई भी कभी भी वहां जाकर अपनी फरियाद कर सकता था। संबंधित विभागों के अधिकारी लगातार राजभवन में मौजूद रहकर लोगों की समस्याओं का निराकरण करते थे। राजभवन में हर सप्ताह जनता दरबार लगाकर वोरा उसी तरह आम लोगों की शिकायतें और समस्याएं सुनते थे जैसे निर्वाचित मुख्यमंत्री सुना करते हैं।
उनकी इस परंपरा का पालन आगे चलकर मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह जैसे मुख्यमंत्रियों ने भी किया। उत्तर प्रदेश में उनके कार्यकाल में दो बार राष्ट्रपति शासन लगा। पहली बार जब अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरी तब तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इसके बाद जब पहली बार भाजपा के बाहरी समथर्न से बनी मायावती सरकार से भाजपा ने अपना समर्थन वापस लिया तब फिर राष्ट्रपति शासन लगाया गया। दोनों ही बार राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने इतना लोकप्रिय शासन किया कि आम लोगों को लगता ही नहीं था कि राज्य में नौकरशाही के भरोसे चलने वाला राष्ट्रपति शासन है। उत्तर प्रदेश के लोग आज भी मोतीलाल वोरा के कार्यकाल और कामकाज को याद करते हैं।
जून 1995 में जब सपा-बसपा गठबंधन टूटा और बसपा ने मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन वापस लिया। फिर उसके बाद राज्य अतिथिगृह कांड की अराजकता से उत्पन्न कानून व्यवस्था के संकट के मद्देनजर राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मुलायम सिंह यादव की अल्पमत में आ चुकी सरकार को बर्खास्त करके मायावती के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ किया। बताया जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने वोरा की ही सलाह पर मायावती को मुख्यमंत्री बनवाने का फैसला किया था।
मायावती के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भी किस तरह बसपा नेताओं के भीतर सपा के दबंगों का आतंक था इसका किस्सा खुद वोरा ने कई बार मुझे और तमाम पत्रकारों को सुनाया था। बाद में जब जैन हवाला डायरी में मोतीलाल वोरा का भी नाम आया और अदालत में उन पर आरोपों का संज्ञान लिया गया तो उन्होंने तत्काल राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वह लगातार कांग्रेस संगठन में सक्रिय रहे और फिर कोषाध्यक्ष बने। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को उनकी ईमानदारी निष्ठा और वफादारी पर इस कदर भरोसा था कि जब यूपीए सरकार के दौरान कई बार उन्हें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल बनाने की चर्चा चलती थी तो उनके जैसा दूसरा विकल्प न होने की वजह से सोनिया उन्हें कोषाध्यक्ष पद से मुक्त करने को राजी नहीं हुईं।
कांग्रेस बीट कवर करने वाले पत्रकारों के लिए सबसे सहज सुलभ अगर कोई होता था तो वह थे मोतीलाल वोरा। वह रोजाना 11 से 11.30 बजे तक कांग्रेस मुख्यालय आ जाते थे और दोपहर दो बजे तक बैठते थे। फिर दोपहर के भोजन के लिए घर जाते थे और शाम चार बजे तक फिर आ जाते थे। इसके बाद रात आठ साढ़े आठ बजे तक अपने कार्यालय में मौजूद रहते थे। पत्रकारों के लिए तत्कालीन मीडिया विभाग के प्रभारी महासचिव जनार्दन दिवेदी और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के साथ बैठकर गपशप करना और चाय पीना लगभग रोज का काम होता था। खबरें मिलें या न मिलें लेकिन इनके साथ बातचीत करके एक समझदारी जरूर विकसित हो जाती थी।
देशभर के कांग्रेस कार्यकर्ता जब सब जगह से निराश हो जाते थे उनके लिए मोतीलाल वोरा के कमरे के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे। कोई भी कार्यकर्ता अपनी किसी भी समस्या के लिए उनके पास जाकर निवेदन कर सकता था। वोरा निराश नहीं करते थे। जहां फोन करने से बात बन सकती थी वहां फोन कर देते थे और जहां जरूरी होता था वहां पत्र लिख देते थे। यूपीए सरकार के मंत्री अकसर उनके पास आकर उनका आशीर्वाद लेते थे। कांग्रेस के हर छोटे बड़े कार्यक्रम में मोतीलाल वोरा अपनी गांधी टोपी के साथ अलग नजर आते थे और सोनिया गांधी व राहुल गांधी अकसर उनसे मंत्रणा करते दिख जाते थे।
भारतीय राजनीति में कांग्रेस और समाजवादियों की गांधीवादी संस्कृति और जीवन शैली को पूरी तरह अपने व्यक्तित्व में उतारने वाले मोतीलाल वोरा को 2019 के आम चुनावों में कांग्रेस की पराजय के बाद हुए सांगठनिक फेरबदल में कोषाध्यक्ष पद से मुक्त कर दिया गया था। उनके गृह राज्य छत्तीसगढ़ में हालांकि 2018 में कांग्रेस को अपार बहुमत मिला इसके बावजूद इस बार वोरा को उनकी अधिक उम्र और अवस्था के कारण राज्यसभा में नहीं भेजा गया। लेकिन वोरा की कांग्रेस नेतृत्व के प्रति निष्ठा और सम्मान में कोई कमी नहीं आई।
अपने जीवन के अंतिम पहर तक वह सक्रिय रहे और कांग्रेस ही नहीं देश की राजनीति सहजता, सरलता और वैचारिक परिपक्वता की जिस संस्कृति का इन दिनों अभाव हो चला है, उसके वह प्रतीक थे और उनके चले जाने से उस राजनीतिक संस्कृति का एक और प्रतीक चला गया।