फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   More than 52 percent of laborers did not get paid for working days, will organise nationwide agitation on September 23

काम किए दिनों का भी 52 फीसदी से ज्यादा मजदूरों को नहीं मिला वेतन, 23 सितंबर को करेंगे देशव्यापी प्रदर्शन

Fri, 04 Sep 2020 11:41 AM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 04 Sep 2020 11:41 AM IST
सार

  • श्रमिक संगठनों का आरोप, लॉकडाउन घोषित होते ही कंपनियों ने झाड़ लिया था पल्ला, ठेकेदारों ने मजदूरों को नहीं दिया कोई वेतन
  • सरकार से प्रति मजदूर 7500 रुपये की आर्थिक सहायता की मांग, मजदूर कानूनों में बदलाव को रद्द कराने को लेकर करेंगे प्रदर्शन

विज्ञापन
More than 52 percent of laborers did not get paid for working days, will organise nationwide agitation on September 23
Lockdown Labours - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

लॉकडाउन का सबसे गहरा असर असंगठित क्षेत्र और इसमें काम करने वाले मजदूरों पर पड़ा है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लॉकडाउन लागू होने के बाद न्यूनतम 52 फीसदी मजदूरों को मार्च, अप्रैल और मई में कम से कम एक महीने का वेतन नहीं मिला है। मजदूरों की आमदनी प्री-लॉकडाउन पीरियड की तुलना में आधे से भी कम रह गई है।

विज्ञापन


श्रमिक संगठनों का आरोप है कि लॉकडाउन घोषित होते ही कंपनियों और ठेकेदारों ने अपने गैर-पंजीकृत मजदूरों को बिल्कुल भी पैसा नहीं दिया। केवल पंजीकृत 35 फीसदी मजदूरों को ही मार्च महीने का वेतन मिल पाया है, जबकि अप्रैल और मई के दौरान इनमें से भी भारी संख्या में मजदूरों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई। मजदूरों के वेतन की मांग को लेकर श्रमिक संगठन 23 सितंबर को देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे।
विज्ञापन


द ऑल इंडिया ट्रेड यूूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने अमर उजाला को बताया कि पूरे उद्योग क्षेत्र में केवल 35 फीसदी श्रमिक ही पंजीकृत होते हैं। लगभग 65 फीसदी श्रमिक गैर-पंजीकृत होते हैं जिनमें ज्यादातर मजदूर ठेकेदारों के माध्यम से काम पाते हैं। लॉकडाउन घोषित होते ही ठेकेदारों ने मजदूरों को कोई भुगतान नहीं किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


मजदूर कुछ दिन तक पारिश्रमिक की उम्मीद में शहरों में टिके रहे, लेकिन कंपनी या ठेकेदारों से कोई भुगतान नहीं मिलता देख उन्होंने 28-29 मार्च से अपने घरों की ओर भागना शुरू कर दिया। यह त्रासदी सड़कों पर पैदल चलते मजदूरों और उनके परिवारों के रुप में दुनिया को देखने को मिली।

लॉकडाउन के बाद कंपनियां कामकाज तो शुरू कर रही हैं, लेकिन ज्यादातर कंपनियों में पूरी क्षमता से कामकाज नहीं हो रहा है। ऐसे में आज तक इन मजदूरों को कोई आर्थिक रास्ता नहीं मिल पाया है। केंद्र सरकार ने 29 मार्च को यह आदेश दिया था कि इस दौरान कंपनियां किसी कामगर को नहीं निकालेंगी और उसको पूरा वेतन देंगी।

लेकिन इस आदेश का लाभ चंद पंजीकृत श्रमिकों को ही मिल पाया है। ज्यादातर मामलों में इस आदेश का खुला उल्लंघन हुआ है। लॉकडाउन के नाम पर मजदूरों के काम के घंटे बढ़ा दिए गए और इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन भी नहीं दिया गया, जबकि इसी दौरान कंपनियां टैक्स लाभ, कर्ज में राहत जैसी अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ उठाती रही हैं।

श्रमिक संगठनों की राय है कि बड़े औद्योगिक संगठनों को तो अपने मजदूरों को स्वयं भुगतान करने का निर्देश देना चाहिए, लेकिन लघु और मध्यम स्तर की कंपनियों के मजदूरों का वेतन स्वयं केंद्र सरकार को देना चाहिए। संगठन प्रति मजदूर न्यूनतम 7,500 रुपये की मांग कर रहे हैं।

निर्माण क्षेत्र में भी काम की कमी

निर्माण मजदूर संघ के अध्यक्ष बादल खान ने कहा कि लॉकडाउन में निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध का असर सबसे पहले मजदूरों को ही भुगतना पड़ा। आरोप है कि लॉक डाउन घोषित होते ही ठेकेदारों ने मजदूरों को कोई पैसा नहीं दिया और उन्हें इसी हालत में अपने गांवों को भागना पड़ा।

सकल घरेलू उत्पाद के 23.9 फीसदी गिरने में बड़ी भूमिका निर्माण क्षेत्र में 50 फीसदी से ज्यादा की कमी आना भी रहा है। लॉकडाउन के बाद भी इस सेक्टर में काम पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है। सरकारी कार्य निर्माण क्षेत्र में काम शुरू हुआ है लेकिन इसमें भी अभी तेजी नहीं आई है।

प्राइवेट काम कराने में भी लोग हिचक रहे हैं क्योंकि वे भविष्य के लिए अपना पैसा सुरक्षित रखना चाहते हैं। लेकिन इससे गरीबों तक पैसा नहीं पहुंच रहा है, जिससे उनकी हालत खराब हो रही है तो आर्थिक गतिविधियों में कमी के कारण इस तिमाही के आर्थिक नतीजों में भी नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।

यहां मजदूरों को सबसे कम हुई परेशानी

फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया श्रमिक संगठन के शीर्ष नेता उमेश गुप्ता ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान भी एफसीआई ने अपना कामकाज जारी रखा। लेकिन वाहनों पर प्रतिबंध के कारण अनेक मजदूर आने-जाने में असमर्थ रहे और काम नहीं कर पाए। यही कारण है कि इन मजदूरों को काम और वेतन से वंचित रहना पड़ा है।

लेकिन मैनेजमेंट से उनकी बातचीत चल रही है और उम्मीद है कि ऐसे मजदूरों को भी वेतन का लाभ दिलाया जा सकेगा। लेकिन एफसीआई से जुड़े ऐसे मजदूरों की संख्या काफी कम बताई जा रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed