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आज भी रेल पटरियों पर दौड़ रहे है 20 साल से अधिक पुराने डिब्बे

Tue, 22 Nov 2016 06:11 AM IST
नवनीत शरण/ नई दिल्ली
नवनीत शरण/ नई दिल्ली Updated Tue, 22 Nov 2016 06:11 AM IST
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more than 20 year old railway coach are still running on track
कानपुर रेल हादसा ने रेलवे की कलई खोल दी है। रेलवे पटरियों पर यूं ही मौत की रेल नहीं चल रही है। इसके पीछे कई कारण है जो हादसे को अंजाम दे रहे है। जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी सात हजार के करीब ऐसे सवारी डिब्बे रेलवे ट्रैक पर दौड़ रहे है जो 20 साल से अधिक पुराने है। लिहाजा हवा से बातें करने वाली बुलेट ट्रेन चलाने के मंसूबे भी एक नजर में हवा हवाई साबित होते दिख रहे है। बात करें अगर पटरियों में दरार आने की तो इस साल जुलाई महीने तक 394 दरारें देखी गई। इसके वजह से 28 ट्रेन पटरी से उतर चुकी है। पिछले साल 3164 पटरियों में दरार का मामला दर्ज था जिसके चलते 65 ट्रेन पटरी से उतरी थीं।
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केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी संसद को बताया कि पुरानी तकनीक पर आधारित आईसीएफ कोच आज भी रेलवे ट्रैक पर चल रही है। रेलवे बजट के दौरान भी संसद को इससे अवगत किया गया था। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इसमें सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए। आकड़े बताते है कि सवारी डिब्बों की होल्डिंग के अनुसार 20 वर्षो से अधिक पुराने सवारी डिब्बे, जो अभी भी गाड़ियों में लगाए जा रहे है उसकी संख्या 6739 है। इनमें सबसे अधिक उत्तर रेलवे की ट्रेनों में 821 कोच इस्तेमाल किया जा रहा है। बता दें कि उत्तर रेलवे जोन में जम्मू-कश्मीर से लखनऊ तक का रेल ट्रैक आता है। पूर्वी रेलवे की बात करें तो इस जोन में 20 साल से अधिक उम्र के 718, मध्य रेलवे में 718, पूर्व मध्य रेलवे में 375 कोच का इस्तेमाल किया जा रहा है। बता दें कि लिंक हॉफ मैन बुश (एलएचबी) वाले महज 3800 कोच ही पटरियों पर दौड़ रहे है। इनमें भी ज्यादातर एसी श्रेणी वाले ही कोच है।
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हैरानी की बात यह भी है कि गतायु हो गए कोच जो 25 साल से पुराने हो गए है उसे भी ट्रैक पर दौड़ाया जा रहा है। ये अलग बात है कि इसे एक्सप्रेस ट्रेन में नहीं चलाकर यात्री सवारी डिब्बे में इस्तेमाल किया जा रहा है। बता दें कि यात्री सवारी ट्रेन की औसत रफ्तार भी 30-50 किलोमीटर प्रतिघंटे की होती है। इस संबंध में रेलवे की दलील है कि आयु एवं हालात के आधार पर सवारी डिब्बों को बदलना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। सवारी डिब्बे का कोडल लाइफ 25 साल है और एलएचबी डिब्बे का 35 साल।
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अल्ट्रासोनिक ब्रोकेन रेल डिटेक्शन सिस्टम से ट्रैक की जांच होगी
पटरियों में दरार आने के कारण रेल हादसे भी कम नहीं हुए है। बावजूद अभी तक रेलवे तकनीक को ही इजाद करने में जुटा है। पिछले दिनों ही पटरियों व वेल्डिंगों की अल्ट्रासोनिक जांच के लिए यह काम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्था (आईआईटी) मद्रास को दिया गया था। लेकिन विकसित प्रणाली उपयुक्त नहीं पाई गई। अब यह काम अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) को सौंपा गया है।


आरडीएसओ ने रेलपथ पर कार्य कर रही पटरी/वेल्डिंग की विफलता का पता लगाने के लिए अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम (यूबीआरडी) का परीक्षण करेगा। रेलवे मंत्रालय ने हाल में ही प्रणाली की खरीद और संस्थापना के लिए आदेश दे दिए है। जल्द ही परीक्षण शुरू किए जाएंगे। इस तकनीक से उत्तर रेलवे व उत्तर मध्य रेलवे के प्रत्येक 25 किलोमीटर रेलपथ का अवलोकन किया जाएगा। अब देखना होगा कि यह तकनीक कितना प्रभावशाली साबित हो पा रही है।
 
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