भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अधिकारी को केंद्र सरकार ने दी जीरो रेटिंग
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केंद्र सरकार और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार से लड़ने के बेशक लाख दावे करते हों लेकिन सरकार के कई फैसले उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर देते हैं।
ऐसा ही एक मामला है भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाकर आम जनता के हीरो बने और मैग्ससे अवार्ड विजेता आईएफएस (भारतीय वन सेवा) अधिकारी के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का, जिस पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। मामला जुड़ा है आईएफएस अधिकारी और एम्स में चीफ विजिलेंस ऑफिसर (CVO) रहे संजीव चतुर्वेदी से, जो फिलहाल अपने मूल कैडर हरियाणा में तैनात हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार एम्स में तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी महिम के कारण देशभर में चर्चित हुए संजीव चतुर्वेदी को केंद्र सरकार ने सालाना अप्रेजल में जीरो रेटिंग दी है।
खास बात ये है कि यह रेटिंग जिस अवधि के कार्यकाल के लिए दी गई है उस दौरान एम्स में अपने काम को लेकर चतुर्वेदी काफी चर्चित रहे थे। हालांकि चतुर्वेदी की सक्रियता उनके आला अधिकारियों को रास नहीं आई इसलिए उन्हें किनारे कर दिया गया।
साल 2015 में एम्स के उप सचिव रहे चतुर्वेदी ने इसकी शिकायत सुप्रीम कोर्ट में भी की थी। उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि सरकार जानबूझकर उन्हें कोई काम नहीं दे रही है, सरकार की मंशा उन्हें उनकी जिम्मेदारियों से दूर रखने की है। चतुर्वेदी की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। इस मामले को उठाकर चतुर्वेदी एक बार फिर सुर्खियों में आ गए थे।
केंद्र को कभी रास नहीं आई चतुर्वेदी की कार्यप्रणाली
केंद्र सरकार को बेशक चतुर्वेदी की काबिलियत और कार्यप्रणाली रास न आई हो लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके जज्बे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहा गया था।
इसके लिए उन्हें साल 2015 के मैग्ससे अवार्ड से सम्मानित भी किया गया। चतुर्वेदी की दिक्कत ये रही कि अपनी तेज तर्रार कार्यप्रणाली और ईमानदार छवि के कारण वह केंद्र के साथ साथ राज्यों सरकारों की आंखों में खटकते रहे।
एनडीए से पहले केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार से उनकी कभी नहीं बनी और उन्हें लगातार इधर से उधर किया जाता रहा। केंद्र में मौजूदा एनडीए सरकार से भी उनकी पटरी नहीं खाई तो उन्हें एम्स से हटाकर उनके मूल कैडर हरियाणा वापस भेज दिया गया।
इसी बीच केंद्र सरकार की ओर से उनके सालाना अप्रेजल में जीरो रेटिंग देने से फिर विवाद खड़ा हो गया है। खबर के अनुसार बीते 29 दिसंबर को फाइनल किए गए इस अप्रेजल में उन्हें एक रेटिंग दी गई है जिसका मूल्यांकन जीरो में किया जाता है।
साल 2015-16 वित्त वर्ष के लिए दी गई इस रेटिंग के दौरान चतुर्वेदी एम्स में उप सचिव के पद पर रहे थे। साल 2009 में डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) द्वारा जारी गाइडलाइन के अनुसार 0-4 अंक तक की ग्रेडिंग को शून्य, 5-7 तक सामान्य और 8-10 तक की ग्रेडिंग को शानदार माना जाएगा। इसी ग्रेडिंग के आधार पर अधिकारियों का सालाना इंक्रीमेंट, प्रमोशन और अन्य भत्ते तय होते हैं।
एम्स में अपनी कार्यप्रणाली से आ गए थे सबके निशाने पर
खबर के अनुसार बीते वित्त वर्ष में एम्स के डिप्टी डायरेक्टर (प्रशासन) रहे वी श्रीनिवास ने चतुर्वेदी को शून्य ग्रेडिंग के लिए उनकी कार्यप्रणाली मसलन, मीडिया में लीक की गई रिपोर्ट, मुकदमेबाजी, झूठे आरोप और अपने पद से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने का दोषी माना था। मामले में उसे संस्थान के अध्यक्ष के खिलाफ अनावश्यक मुकदमेबाजी का दोषी भी माना गया।
बीते 31 जनवरी को सेवानिवृत्त होने वाले एम्स के डायरेक्टर एमसी मिश्रा ने श्रीनिवास की अनुशंसा के बाद चतुर्वेदी को एक ग्रेडिंग दी थी। दोनों अधिकारियों की टिप्पणी बीते 29 दिसंबर को एक ही दिन की गई थी।
इसके अगले दिन संस्थान के अध्यक्ष और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उसी पर अपनी मुहर लगाते हुए चतुर्वेदी को एक ग्रेडिंग देकर फाइल आगे बढ़ा दी। इस संबंध में नड्डा का कहना था कि मैंने उसी रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगाई जिसे सक्षम अधिकारियों की ओर से मेरे समक्ष प्रस्तुत किया गया था। क्योंकि मैंने खुद इस संबंध में सीधे निगरानी नहीं की थी और न ही मैं उस पद पर था जिसमें उक्त अधिकारी पर अपनी राय रखी जा सके इसलिए मैंने उसके वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दी गई रिपोर्ट पर ही अपनी सहमति व्यक्त की।
बता दें कि बीते वर्ष की रिपोर्ट में सरकार से शून्य ग्रेडिंग पाने वाले संजीव चतुर्वेदी की इससे पूर्व के पांच वर्षों की रेटिंग शानदार रही है। इस दौरान वह एम्स और हरियाणा में विभिन्न पदों और जिम्मेदारियों पर नियुक्त रहे हैं। इस अवधि में उनके उच्च अधिकारियों ने उन्हें 9.5 ग्रेडिंग दी है।
जेपी नड्डा ने खत लिखकर की थी चतुर्वेदी की शिकायत
वहीं, एम्स में निदेशक रहे मिश्रा मानते हैं कि संजीव चतुर्वेदी साधारण, ईमानदार और कर्तव्यशील व्यक्ति रहे हैं। वह किसी भी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी और क्षमताओं से निभाते हैं। कई बार तो वह अपनी रूटीन ड्यूटी से इतर भी किसी जिम्मेदारी को निभाने में पीछे नहीं हटते हैं।
एम्स में तैनाती के दौरान भी उनका कार्यकाल शानदार रहा है, उन्होंने अतिक्रमण और अवैध कब्जों को हटाने में शानदार कार्य किया है। उन्होंने एम्स परिसर में सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करने में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है।
बता दें कि इसी कार्यप्रणाली और एम्स में भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने लिए चतुर्वेदी को साल 2015 के मैग्ससे अवार्ड से सम्मानित किया गया था। 2012-2014 तक एम्स के सीवीओ रहे चतुर्वेदी ने संस्थान में चल रहे भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया था। इसके अलावा हरियाणा में तैनाती के दौरान फर्जी पौधरोपण और पेडों की अवैध सहित वन विभाग में चले भ्रष्टाचार के कई मामलों का खुलासा किया था।
खास बात ये है कि चतुर्वेदी को साल 2014 में तब एम्स के सीवीओ पद से हटा दिया गया था जब उन्होंने भाजपा के महासचिव और राज्यसभा के सांसद जेपी नड्डा के केंद्र सरकार के लिखे खतों को उजागर कर दिया था। एक खत में नड्डा ने चतुर्वेदी की शिकायत करते हुए उन पर अभद्रता करने और अनियमितताओं का आरोप लगाया था। एक अन्य खत में नड्डा ने चतुर्वेदी द्वारा की गई सभी जांचों, अनुशासनिक सिफारिशों को स्थगित करने की मांग की थी।