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दो सालो में विदेशी मीडिया में कितना छाए मोदी?

Thu, 26 May 2016 01:19 PM IST
ब्रजेश उपाध्याय/ बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
ब्रजेश उपाध्याय/ बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन Updated Thu, 26 May 2016 01:19 PM IST
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- फोटो : PTI

कुर्सी संभालने के दो ढाई महीने बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब न्यूयॉर्क के जानेमाने मैडिसन स्कवेयर गार्डन पहुंचे तो शहर में मोदी-मोदी के नारे गूंज रहे थे। टाइम्स स्कवेयर की विशाल टीवी स्क्रीन पर उनकी तस्वीरें दिखाई जा रही थीं और शहर का ट्रैफिक मानो हिलने का नाम नहीं ले रहा था।

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अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट ने लिखा "आप सोच रहे होंगे कि आज किस ‘पेन इन द ऐ**’ स्पोर्ट्स स्टार या संगीतकार की वजह से ट्रैफिक रूका पड़ा है? दरअसल, आज तो एक राजनेता, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रदर्शन हो रहा है।" इस भाषा पर पत्रिका ने दो दिन बाद एक माफीनामा भी पेश किया जिसमें कहा गया, "दी इकॉनॉमिस्ट मिस्टर मोदी को “पेन इन द ऐ**” नहीं मानता। हमने तो ट्रैफिक जाम पर न्यूयॉर्क में रहने वालों की किस तरह की प्रतिक्रिया होती है ये दर्शाने की कोशिश की थी।"

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कुछ लोगों को लगा कि पत्रिका के माफीनामे में भी एक कटाक्ष था। काफी हद तक ये भाषा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मोदी को लेकर जो असहजता थी, उसी की एक झलक थी। उनकी जीत के फौरन बाद वाशिंगटन पोस्ट ने मुख्य संपादकीय में उनकी एक बडी सी तस्वीर प्रकाशित की थी और उसमें सवाल था, मोदी भारत में चीन जैसी तरक्की का महत्वाकांक्षी सपना दिखा रहे हैं लेकिन वो भारत के डेंग शाओपिंग बनेंगे या फिर व्लादीमिर पुतिन?

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टाइम पत्रिका ने मोदी को कहा प्रधान सुधारक

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यानी वो डेंग की तरह आर्थिक सुधार के चैंपियन बनेंगे या पुतिन की तरह निरंकुश और राष्ट्रवादी नीतियां अपनाकर अर्थव्यवस्था की गाडी को पटरी से उतार देंगे। चुनाव से पहले और जीत के बाद भी शायद ही कोई अखबार या टीवी चैनल था जो मोदी का जिक्र करते हुए गुजरात दंगों की बात नहीं कर रहा हो। उसके बाद के महीनों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने भाषणों, मेक इन इंडिया जैसे नारों, स्मार्ट सिटीज, बुलेट ट्रेन्स, योग दिवस, स्वच्छ भारत और अपने कपडों की वजह से भी मोदी सुर्खियों में बने रहे हैं।

 

भारत के प्रति उसी तरह की उम्मीद दर्शाई गई है जैसी मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में नजर आती थी। टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में रखा और राष्ट्रपति ओबामा ने उन पर लेख लिखा जिसका शीर्षक था "रिफॉर्मर इन चीफ यानी प्रधान सुधारक"।

विदेशी मीडिया में जब विकास की जगह कन्हैया की होने लगी बातें

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ओबामा ने लिखा "जब वो वाशिंगटन आए थे, तो नरेंद्र और मैं, डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग के स्मारक पर गए थे, वहां हमने किंग और गांधी की बात की और ये बात भी हुई कि हमारे देशों की जो विविधता है, अलग-अलग पृष्ठभूमि और धर्मों की, वो हमारी ताकत है और हमें उसे बचाना है।" लेकिन गुजरते दिनों के साथ इन अच्छी खबरों पर असहिष्णुता, गोमांस, धर्मांतरण से जुडी सुर्खियां हावी होने लगी हैं। विकास की जगह कन्हैया की बातें होने लगी हैं।

 

वाशिंगटन पोस्ट में राजस्थान के स्कूल पाठ्यक्रम से नेहरू को हटाए जाने की चर्चा होती है, न्यूयॉर्क टाइम्स में धार्मिक स्वतंत्रता से जुडी संस्था के सदस्यों को वीजा नहीं दिए जाने की बात हो रही है, द इकॉनोमिस्ट कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवादी राजनीति मोदी के विकास के एजेंडा पर हावी हो रही है।

 

वाशिंगटन के ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट में इंडिया प्रोजेक्ट की डायरेक्टर तन्वी मदान कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अभी भी भारत को उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है लेकिन घरेलू मीडिया की जो बहस है उसकी छाप भी अक्सर नजर आती है।

विदेशी मीडिया की खबरों को लेकर क्या कहा अरूण जेटली ने

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तन्वी कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय मीडिया सामाजिक मामलों पर उनकी नीतियों को काफी गौर से परख रहा है और खासतौर से उनके गुजरात के इतिहास की वजह से उनके सामाजिक एजेंडा पर पहले की सरकारों के मुकाबले ज्यादा पैनी नजर रखी जा रही है।" वे कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उम्मीद की जाती है कि जब इस तरह की घटनाएं हों तो मोदी उस पर बोलें, अपनी नीति स्पष्ट करें जो उन्होंने की भी है।

 

लेकिन एक दूसरे थिंक टैंक के भारतीय मूल के जाने-माने विश्लेषक, जो इस मामले पर अपना नाम नहीं देना चाहते, उनका कहना था कि डर इस बात का है कि ये सुर्खियां मोदी सरकार के कई अच्छे कामों को दबा देंगी और इसके लिए सरकार को सचेत रहने की जरूरत है। ऐसा इसलिए ताकि दुनिया के सामने पूरे देश को साथ लेकर चलने का जो वादा किया है उन्होंने, वो नजर भी आए।

 

हाल ही में वाशिंगटन के दौरे पर आए भारतीय वित्त मंत्री अरूण जेटली से बीबीसी ने एक खास बातचीत के दौरान ये पूछा कि जो सरकार विकास के मुद्दे पर सत्ता में आई थी, वहां से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में विकास की जगह कन्हैया की खबरें क्यों आ रही हैं?

जेटली ने कहा, "कुछ विषय पत्रकारों को ज्यादा समझ में आते हैं।" उनका कहना था, "जमीन पर कोई इंटॉलरेंस नहीं है। अगर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के भाषण पढ लिए जाएं तो उसकी तुलना में हमारे यहां बहुत अधिक संयम है।"

मीडिया से एक दूरी सी बना रखी है मोदी ने

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नरेंद्र मोदी

जेटली का ये भी कहना था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस तरह की सुर्खियों से विदेशी निवेश पर कोई असर नहीं पडा है।

 

मोदी के कई समर्थक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर मोदी के खिलाफ एक पक्षपातपूर्ण रवैया रखने का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि ये भारत को पश्चिमी देशों के बराबर खडा होता नहीं देखना चाहते और इसलिए ज्यादातर नकारात्मक खबरें ही सुर्खियां बनती हैं। लेकिन इन्हीं अखबारों के संपादकीय भारतीय लोकतंत्र की कामयाबी, जलवायु और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की भी बात करते हैं।

 

कुछ लोगों का ये भी कहना है मोदी ने सत्ता संभालने के बाद से मीडिया से एक दूरी सी बना रखी है। विवादास्पद घरेलू मु्ददों पर भी वो अकसर हफ्तों महीनों तक चुप नजर आते हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ भी उन्होंने दो साल पहले अमरीका दौरे से पहले सीएनएन के फरीद जकारिया से बात की थी और उसके बाद वो शायद ही कहीं नजर आए हैं।

 

विशलेषकों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र हो, विश्व बैंक हो या फिर दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंच, भारत को अगर असरदार तरीके से अपने हितों की बात करनी है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ संवाद बनाने की जरूरत होगी और वहां तीखे सवालों के लिए भी तैयार रहना होगा।

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