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UP: सीट नहीं, जीत पर अड़ी सपा; कांग्रेस की बढ़ी महत्वाकांक्षा, क्या 2027 चुनाव में सीट बंटवारे पर फंसेगा पेच?

Fri, 29 May 2026 04:00 AM IST
Devesh Tripathi अजीत खरे
अजीत खरे Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 29 May 2026 04:00 AM IST
सार

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच सीट साझेदारी को लेकर दिलचस्प खींचतान होने के संकेत मिल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद सपा खुद को मजबूत स्थिति में मान रही है। वहीं, कांग्रेस अपनी राजनीतिक मौजूदगी कम नहीं होने देना चाहती। दोनों दल अंदरखाने अपनी रणनीति और संभावित उम्मीदवारों पर काम कर रहे हैं।

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Mission 2027 SP insists winning seats Congress ambition rise tough bargain seat sharing upcoming UP elections
यूपी में दिखेगी दिलचस्प खींचतान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/PTI

विस्तार

उत्तर प्रदेश में मिशन 2027 के लिए साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे सपा और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर कड़ी सौदेबाजी के आसार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद दोनों दल एक-दूसरे को तौलने में लगे हैं। एक ओर जहां लोकसभा नतीजों से जोश से भरी कांग्रेस की महत्वाकांक्षाएं हिलोरे मार रही हैं, वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सीट वितरण को लेकर इस बार बेहद सख्त तेवर के संकेत दिए हैं।
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सपा इस बार कांग्रेस को 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले कम से कम 25 सीटें कम देगी। लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद अखिलेश यादव खुद को यूपी में बड़े भाई की भूमिका में देख रहे हैं और सीटों के मामले में कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं। वहीं, कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी जमीन ज्यादा सिकुड़ने नहीं देना चाहती।
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सीट बंटवारे पर होगा कड़ा और दिलचस्प मोल-तोल
ऐसे में 2027 की बिसात पर दोनों सहयोगियों के बीच एक कड़ा और दिलचस्प मोल-तोल होना तय माना जा रहा है। हालांकि गठबंधन के भविष्य को लेकर अखिलेश ने साफ कर दिया है कि बात सीटों की संख्या की नहीं, बल्कि जीत की है। वह स्पष्ट कर चुके हैं कि सपा की नजर भाजपा को हराने वाले जिताऊ समीकरणों पर है।

दूसरी ओर, कांग्रेस पिछली बार की तुलना में कम सीटों पर नहीं लड़ना चाहती। साथ ही इस बार मजबूत प्रत्याशियों को तलाशने में देरी भी नहीं करना चाहती। यही वजह है कि पार्टी आलाकमान ने स्थानीय संगठन को 100 से 125 सीटों पर कद्दावर चेहरों की सूची तैयार करने को कहा है। दबाव की रणनीति के तहत कांग्रेस प्लान बी पर भी काम कर रही है। इसे तहत सभी 403 सीटों पर संगठन को मुस्तैद रहने के निर्देश दिए गए हैं।


मायावती से कांग्रेस नेताओं के मिलने की कोशिश से बढ़ी तल्खी  
इस बीच, गठबंधन के अंदर एक नया बसपा फैक्टर भी सुलग रहा है। कांग्रेस का एक धड़ा अंदरखाने बसपा के साथ तालमेल का इच्छुक है। हाल ही में कांग्रेस के दो बड़े नेताओं की बसपा प्रमुख मायावती से मिलने की कोशिशों ने सपा को खासा नाराज कर दिया। कांग्रेस ने जल्द ही इस चूक को भांपते हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की और साफ किया कि उनका गठबंधन केवल सपा के साथ ही रहेगा। दिलचस्प बात यह है कि इतनी कोशिशों के बावजूद बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेस के प्रति कोई नरम रुख नहीं दिखाया है और वह लगातार सपा-कांग्रेस दोनों को अपने निशाने पर रख रही हैं।

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साथ आने की मजबूरी व इतिहास
दरअसल, दोनों दलों को एक-दूसरे के साथ की कितनी जरूरत है। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब दोनों दल साथ लड़े तो सपा ने कांग्रेस को 105 सीटें दी थीं, लेकिन कांग्रेस महज 7 सीटों पर सिमट गई और सपा को 47 सीटें मिलीं। इसके बाद 2022 का चुनाव दोनों ने अकेले लड़ा, जहां कांग्रेस महज 2 सीटों पर सिमट गई और सपा 111 सीटें जीत पाई। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में इस गठजोड़ का जादू चला और सपा के साथ के चलते कांग्रेस को यूपी में 6 सीटें मिल गईं, जबकि सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसी एकजुटता ने भाजपा को दिल्ली की सत्ता में पूर्ण बहुमत पाने से रोक दिया था।
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