फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Mental health: Corona made women more mentally ill than men

अमर उजाला विशेष: महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा असर, 93 फीसदी मन की बात तक नहीं कह पातीं

Tue, 15 Jun 2021 05:25 AM IST
Amit Mandal परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली। Published by: Amit Mandal Updated Tue, 15 Jun 2021 05:25 AM IST
सार

  • तनाव, चिंता, गुस्सा और बेचैनी सबसे अधिक, खुलकर बात करना भी मुश्किल
  • अस्पतालों में मानसिक रोगियों की संख्या 500 फीसदी तक बढ़ी
  • साल 2019 और 2020 की तुलना में 200 फीसदी अधिक महिलाएं चिकित्सकों से ले रहीं परामर्श

विज्ञापन
Mental health: Corona made women more mentally ill than men
corona virus and women - फोटो : PTI

विस्तार

कोरोना महामारी ने सिर्फ संक्रमितों व मौतों के आंकड़े ही नहीं बढ़ाएं बल्कि इससे देश में मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर छोड़ा है, जिसका सबसे ज्यादा महिलाएं सामना कर रही हैं। ये मरीज नहीं बल्कि लॉकडाउन, वर्क फ्रॉम होम या घर में फंसे हुए लोग हैं। इनमें भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक असर पड़ा है। 

विज्ञापन


'अमर उजाला' के रिपोर्टर ने जमीनी हकीकत जानने के लिए स्वयं अलग-अलग क्षेत्र से 30 महिलाओं को लेकर सर्वे किया। जिसके मुताबिक, 93 फीसदी महिलाएं इतने तनाव में हैं कि वह अपने मन की बात भी नहीं कह पाती हैं। वहीं 85 फीसदी से अधिक महिलाओं ने काउंसलिंग नहीं ली। कोरोना की पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर ने महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर 200 फीसदी अधिक असर डाला है।
विज्ञापन


नीति आयोग की हाल ही में आई एसडीजी 3.0 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 8.46 फीसदी विधानसभा सीटों पर महिला उम्मीदवार होने के बावजूद प्रति एक लाख में से 62 महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मामले सामने आए हैं। वहीं 20 महिलाओं ने अपने रिश्तेदारों के द्वारा शारीरिक प्रताड़ना, क्रूर अत्याचार किए जाने के मामले दर्ज कराए हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


यूएन वुमन के साल 2020 में जारी वैश्विक डाटा के मुताबिक, कोरोना वायरस महामारी के कारण हम लैंगिक समानता में हुई बढ़ोतरी के मामले में 25 साल पुराने स्तर तक पिछड़ सकते हैं क्योंकि महिलाओं की देखभाल का जो भार बढ़ा है, उससे साल 1950 के समय की लैंगिक रूढ़ियों के फिर से कायम होने का खतरा पैदा हो गया है। 

डॉक्टरों के अनुसार तनाव, चिंता, बेचैनी, नींद न आना, सोते समय सिर में दर्द, अकेलापन और अधिक गुस्सा आने के साथ-साथ महिलाओं में चिड़चिड़ापन अधिक देखने को मिल रहा है। फोर्टिस अस्पताल की डॉ. दीक्षा आडवाणी बताती हैं कि वर्क फ्रॉम होम और स्कूल बंद होने के बाद जहां एक ग्रहिणी को परिवार को संभालना मुश्किल भरा है। 

वहीं नौकरीपेशा महिलाओं के लिए यह चुनौती और भी कठिन है क्योंकि उन्हें नौकरी के साथ-साथ पति, बच्चे, बाकी परिजनों को संभालना है। डॉ. दीक्षा अडवाणी बताती हैं कि रोजाना उनके पास पांच से छह महिलाएं काउंसिलिंग के लिए आ रही हैं। यह स्थिति पहले जैसी नहीं है। कोरोना काल से पहले हर दिन एक या दो ही ऐसे केस आते थे। जबकि महीने में करीब 10 से 12 दिन एक भी मरीज नहीं आता था लेकिन पिछले साल सितंबर के बाद से उनके यहां महिलाओं की संख्या काफी बढ़ी है।

अमर उजाला रिसर्च 
महामारी के दौरान महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य के बढ़ते मामलों का पता लगाने के लिए अमर उजाला ने राष्ट्रीय राजधानी में अलग-अलग वर्ग की 30 महिलाओं से फोन पर बातचीत की। इसमें पांच-पांच नौकरीपेशा, गृहिणी, डॉक्टर, नर्स, युवतियां और दूसरी लहर में अपने परिवार के सदस्य खोने वालीं शामिल हैं। 

इस दौरान 24 (80 फीसदी) ने स्वीकार किया कि पिछले साल लॉकडाउन लगने के बाद से उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दिनभर घर के काम और बच्चों की देखरेख में पूरा समय निकल जाता है और रात को जब सोते समय सिर में दर्द होता है। हालांकि इस दौरान अलग अलग वर्ग की महिलाओं में कारण भी कई मिले। इसी बातचीत के परिणाम....

गृहिणी
पांच में से चार महिलाओं ने कहा, स्कूल और वर्क फ्रॉम होम की वजह से उनका काम कई गुना बढ़ गया है। 
सभी महिलाओं ने स्वीकार किया कि अपनी तकलीफ उन्होंने पति तक से साझा नहीं की। 
सभी महिलाओं ने कहा, खुद के लिए नहीं मिलता समय। टीवी तक देखने को नहीं मिलता। 
चिकित्सीय परामर्शः एक भी नहीं 

युवतियां/छात्रा
पांच में से चार युवतियों ने कहा कि घर में रहते हुए उन्हें बैचेनी होने लगी है। इसे दूर करने के लिए वे घूमने जाना चाहती हैं। 
तीन युवतियों ने कहा कि घर में रहकर उन्होंने और भी कई काम सीखे हैं। 
पांच में से चार युवतियों को कमर और गर्दन में दर्द, 14 से 15 घंटे तक इंटरनेट पर व्यस्त। 
चिकित्सीय परामर्शः केवल एक ने ऑनलाइन लिया। 

डॉक्टर/नर्स
10 में से आठ स्वास्थ्य कर्मचारियों ने स्वीकारा, घर जाकर करना पड़ता है काम। 
सभी ने कहा- दिन भर रहता है तनाव, घर पहुंचकर भी नहीं मिलता सुकून। 
चिकित्सीय परामर्शः समय नहीं मिलता। 

नौकरीपेशा
सभी (पांच) ने कहा-वर्क फ्रॉम होम के साथ परिवार को मैनेज कर पाना काफी मुश्किल। 
पांच में से चार ने कहा, रात को नहीं आती नींद, सिर में होता है दर्द, लेनी पड़ती है नींद की दवा। 
पांच में से दो ने स्वीकारा, पति भी परिवार को संभालने में कर रहे मदद। 
चिकित्सीय परामर्शः तीन ने ऑनलाइन लिया। 

हर आयुवर्ग के मरीज आ रहे सामने
मुंबई के डॉ. हरीश शेट्टी ने बताया कि हर आयुवर्ग में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समस्याएं देखने को मिल रही हैं। पुरुष और महिलाएं दोनों ही मानसिक रुप से परेशान होने के चलते अस्पताल आ रहे हैं लेकिन महिलाओं की स्थिति अधिक गंभीर है क्योंकि वे अपने मन की बात बताने में सहज नहीं होती हैं। उन्होंने कहा कि दूसरी लहर के बाद से इन मरीजों की संख्या 500 फीसदी तक बढ़ी है। 

बड़ी आबादी को मुसीबत में डाला 
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. नंद कुमार का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर काफी कम जागरुकता है। इस विषय पर चर्चा करना अब और जरूरी हो चुका है क्योंकि महामारी ने संक्रमण के अलावा एक बड़ी आबादी को इस मुसीबत में डाल दिया है। 

75 फीसदी महिलाओं ने कहा, उनके परिवार ने खो दिया रोजगार
वैश्विक सर्वेक्षण ‘फाइंडिंग होप’ के अनुसार बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं कोविड-19 की वजह से मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं, हिंसा और आय की दिक्कतों का सामना कर रही हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, नई दिल्ली, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु के 5671 लोगों का सर्वे, साक्षात्कार, वेबिनार और सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि 75 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उनके परिवार के कमाने वाले सदस्य ने लॉकडाउन के दौरान रोजगार खो दिया। सर्वे में सिफारिश की गई है कि कोविड के बाद के आर्थिक सुधार को लैंगिक व्यवस्था के अनुसार निष्पक्ष और समावेशी होना होगा। 

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति

  • इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिसेटिव 2018 के अनुसार, वर्ष 1990 से 2017 के बीच मानसिक रोगों के मामले 2.05 से बढ़कर 4.7 फीसदी तक दर्ज किए गए हैं। 
  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, मेंटल हेल्थ से पीड़ित लगभग 80 फीसदी लोगों को समय पर इलाज नहीं मिलता है। 
  • मई 2021 में 'द लैंसेट साइकेट्री' में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, महामारी के पहले छह माह के दौरान नौ में से एक व्यस्क मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहा था। 
  • 12 जून 2021 को जारी बयान में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने शुरुआती तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि किशोरों और युवाओं के मानसिक अवसाद, बेचैनी, ऑनलाइन उत्पीड़न, शारीरिक और यौन हिंसा का शिकार बनने की आशंका ज़्यादा है।
  • यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थकेयर पॉलिस एंड इनोवेशन के जरिए मार्च 2020 में किए सर्वे के अनुसार व्यस्कों के मानसिक स्वास्थ्य और नींद पर महामारी का ज्यादा असर हुआ है। चार में से एक वयस्क कोरोना काल के पहले की तुलना में अब ज्यादा बैचेन और चिंतित है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed