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गांधी के सेवाग्राम में तीन दिन - भाग एक
सेवाग्राम
Updated Tue, 21 Aug 2018 04:43 PM IST
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बापू कुटी, सेवाग्राम
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जिस दिन तय हुआ कि फिल्म के लिए सेवाग्राम जाना है, रात भर नींद नहीं आई। बिस्तर पर लेटे-लेटे बचपन से सेवाग्राम के बारे में लिखा-पढ़ा सब आंखों में तैर रहा था। होश संभालते ही राष्ट्रपिता को किताबों में पढ़ते आए थे, उनके आश्रम को देखने जा रहा था। फिर दो दिन तक लगातार गांधी और सेवाग्राम की किताबें पाताल से निकाल कर लाया। एक-एक पंक्ति पढ़ी और कैमरा टीम के साथ जा पहुंचा था सेवाग्राम। फिल्म के लिए चित्र, साक्षात्कार कैमरे ने कैद किए और मैंने अपनी आंखों में। लौट तो आया लेकिन समूचा सेवाग्राम मेरे साथ आया। यादों में। फिर सेवाग्राम मुझे बुलाता रहा। मैं बार-बार जाता रहा। इस बार विकास संवाद के न्यौते पर गया। सत्रह से उन्नीस अगस्त तक। तीन दिन की डायरी का हिस्सा आप सबके लिए प्रस्तुत है।
सत्रह अगस्त, दो हजार अठारह
नागपुर एयरपोर्ट वर्धा रोड पर ही है। वहां से सेवाग्राम तक का सफर करीब डेढ़ घंटे का। कुल सत्तर किलोमीटर। नौ बजे निकले। डेढ़ बजे पहुंच गए। गाड़ी की रफ्तार पचास-साठ किलोमीटर के आसपास, लेकिन मेरी यादों की रफ्तार कई गुना तेज भागती हुई। दोनों तरफ हरियाली। बोर अभयारण्य का घना जंगल। वह बिंदु भी दिखा, जहां पच्चीस बरस पहले मैंने अपनी फिल्म का पहला दृश्य लिया था। अदभुत और मनोरम लेकिन उससे मनोरम नहीं, जो फिल्म मेरे दिमाग के परदे पर चल रही थी।
चित्र उभरा- गांधी तेज चाल से जा रहे हैं। साबरमती आश्रम पीछे छूट रहा है। एक मिनट के लिए आंखें नम हुईं। फिर चेहरा एक तरफ कहीं छिपा लिया। कोई साथी आंखों की नमी को कमजोरी न मान ले। फिर रुके। ऐलान किया- इस आश्रम में तभी लौटूंगा, जब देश आजाद हो जाएगा। वह उन्नीस सौ तीस का मार्च महीना था। गांधी नमक सत्याग्रह के लिए दांडी मार्च पर निकले थे। वही से जेल चले गए। साल भर बाद रिहा हुए और गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने कांग्रेस की तरफ से लंदन चले गए। लौटे तो निराश- सम्मेलन नाकाम रहा था। एक बार फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस गैर कानूनी संगठन घोषित हो चुकी थी। गांधी की अगुआई में आंदोलन चरम पर था।
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उन्नीस सौ चौंतीस में आंदोलन समाप्त हो गया। गांधी पूरे देश में आजादी की अलख जगाने निकल पड़े। अप्रैल में नागपुर के पास वर्धा पहुंचे थे। जमनालाल बजाज के घर ठहरे। दिल में कहीं न कहीं यह विचार भी था कि साबरमती में लिए संकल्प के तहत अब वापस तो लौटना नहीं है। नक्शा देखा तो पाया हिंदुस्तान के करीब-करीब केंद्र में वर्धा बसा है। बस सेगांव में आश्रम बनाने का फैसला किया। जमनालाल बजाज ने तीन सौ एकड़ जमीन दिलवाई। गांधी और कस्तूरबा की कुटियाएं बन गईं। अनुसूचित जाति के कुछ सहयोगियों को भोजन और अपनी प्रार्थना की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस तरह आश्रम शुरू हो गया। वह 1936 का साल था।
हमारी गाड़ी अब सेवाग्राम से सिर्फ सात या आठ किलोमीटर दूर है। चाय पीने की इच्छा हो रही है। ड्राइवर ने साफ सुथरा ढाबा देखकर चाय का ऑर्डर दे दिया। मेरे साथ मित्र रज्जू राय, पत्रकार पीयूष बवेले और रवींद्र कुमार भी हैं। ढाबे वाला गर्व से ज्ञान देता है- आपको मालूम है, गांधीजी यहां से पैदल गए थे सेवाग्राम। आज तो कोई एक फर्लांग भी पैदल नहीं चलता। उससे थोड़ा और ज्ञान लेकर हम चल दिए सेवाग्राम। फुहारें गिर रही हैं। दिल्ली की सीजनल और सियासी गर्मी से दूर ठंडा मौसम अच्छा लग रहा है।
दाहिने तरफ पवनार दिख रहा है। एक और पावन आश्रम। गांधी के शिष्य महान सर्वोदयी विनोबा भावे का आश्रम। विनोबा का चित्र उभरते ही सेवाग्राम की फिल्म फिर प्रारंभ हो गई- गांधी जी ने कहा था, सब कुछ वैसा ही बनाओ, जैसे यहां गांव के घर बनते हैं। उन दिनों यहां कुछ भी तो नहीं था। डाकघर भी नहीं। सेगांव में ही संत गजानंद महाराज का आश्रम भी था। डाक वर्धा से आती थी। डाकिया बेचारा गांधी बाबा की डाक गजानंद महाराज के आश्रम दे आता था। दो आश्रमों में धोखा हो जाता। इसलिए फिर 1940 में आश्रम का नाम हो गया सेवाग्राम। डाकिया खुश था।
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सत्रह अगस्त, दो हजार अठारह
नागपुर एयरपोर्ट वर्धा रोड पर ही है। वहां से सेवाग्राम तक का सफर करीब डेढ़ घंटे का। कुल सत्तर किलोमीटर। नौ बजे निकले। डेढ़ बजे पहुंच गए। गाड़ी की रफ्तार पचास-साठ किलोमीटर के आसपास, लेकिन मेरी यादों की रफ्तार कई गुना तेज भागती हुई। दोनों तरफ हरियाली। बोर अभयारण्य का घना जंगल। वह बिंदु भी दिखा, जहां पच्चीस बरस पहले मैंने अपनी फिल्म का पहला दृश्य लिया था। अदभुत और मनोरम लेकिन उससे मनोरम नहीं, जो फिल्म मेरे दिमाग के परदे पर चल रही थी।
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चित्र उभरा- गांधी तेज चाल से जा रहे हैं। साबरमती आश्रम पीछे छूट रहा है। एक मिनट के लिए आंखें नम हुईं। फिर चेहरा एक तरफ कहीं छिपा लिया। कोई साथी आंखों की नमी को कमजोरी न मान ले। फिर रुके। ऐलान किया- इस आश्रम में तभी लौटूंगा, जब देश आजाद हो जाएगा। वह उन्नीस सौ तीस का मार्च महीना था। गांधी नमक सत्याग्रह के लिए दांडी मार्च पर निकले थे। वही से जेल चले गए। साल भर बाद रिहा हुए और गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने कांग्रेस की तरफ से लंदन चले गए। लौटे तो निराश- सम्मेलन नाकाम रहा था। एक बार फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस गैर कानूनी संगठन घोषित हो चुकी थी। गांधी की अगुआई में आंदोलन चरम पर था।
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उन्नीस सौ चौंतीस में आंदोलन समाप्त हो गया। गांधी पूरे देश में आजादी की अलख जगाने निकल पड़े। अप्रैल में नागपुर के पास वर्धा पहुंचे थे। जमनालाल बजाज के घर ठहरे। दिल में कहीं न कहीं यह विचार भी था कि साबरमती में लिए संकल्प के तहत अब वापस तो लौटना नहीं है। नक्शा देखा तो पाया हिंदुस्तान के करीब-करीब केंद्र में वर्धा बसा है। बस सेगांव में आश्रम बनाने का फैसला किया। जमनालाल बजाज ने तीन सौ एकड़ जमीन दिलवाई। गांधी और कस्तूरबा की कुटियाएं बन गईं। अनुसूचित जाति के कुछ सहयोगियों को भोजन और अपनी प्रार्थना की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस तरह आश्रम शुरू हो गया। वह 1936 का साल था।
हमारी गाड़ी अब सेवाग्राम से सिर्फ सात या आठ किलोमीटर दूर है। चाय पीने की इच्छा हो रही है। ड्राइवर ने साफ सुथरा ढाबा देखकर चाय का ऑर्डर दे दिया। मेरे साथ मित्र रज्जू राय, पत्रकार पीयूष बवेले और रवींद्र कुमार भी हैं। ढाबे वाला गर्व से ज्ञान देता है- आपको मालूम है, गांधीजी यहां से पैदल गए थे सेवाग्राम। आज तो कोई एक फर्लांग भी पैदल नहीं चलता। उससे थोड़ा और ज्ञान लेकर हम चल दिए सेवाग्राम। फुहारें गिर रही हैं। दिल्ली की सीजनल और सियासी गर्मी से दूर ठंडा मौसम अच्छा लग रहा है।
दाहिने तरफ पवनार दिख रहा है। एक और पावन आश्रम। गांधी के शिष्य महान सर्वोदयी विनोबा भावे का आश्रम। विनोबा का चित्र उभरते ही सेवाग्राम की फिल्म फिर प्रारंभ हो गई- गांधी जी ने कहा था, सब कुछ वैसा ही बनाओ, जैसे यहां गांव के घर बनते हैं। उन दिनों यहां कुछ भी तो नहीं था। डाकघर भी नहीं। सेगांव में ही संत गजानंद महाराज का आश्रम भी था। डाक वर्धा से आती थी। डाकिया बेचारा गांधी बाबा की डाक गजानंद महाराज के आश्रम दे आता था। दो आश्रमों में धोखा हो जाता। इसलिए फिर 1940 में आश्रम का नाम हो गया सेवाग्राम। डाकिया खुश था।