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Meghalaya Election: एक-दूसरे को कोसने वाली NPP-BJP क्या फिर हाथ मिलाएंगी? TMC ने ऐसे बिगाड़ा कांग्रेस का खेल

Thu, 02 Mar 2023 06:22 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Thu, 02 Mar 2023 06:22 PM IST
सार

2018 के विधानसभा चुनावों एपीपी के कोनराड संगमा के नेतृत्व में भाजपा, यूडीपी, पीडीएफ, एचपीपीडीपी और निर्दलीय विधायकों ने मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन 2023 के चुनाव चुनाव प्रचार के दौरान ही भाजपा ने एनपीपी से गठबंधन तोड़ लिया था। 

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Meghalaya Election Results NPP single largest party but TMC competes with BJP and Congress news and updates
कोनराड संगमा और हिमंत बिस्व सरमा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूर्वोत्तर के सबसे अहम राज्यों में से एक मेघालय विधानसभा के चुनाव नतीजे आ गए है। परिणामों में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। सत्ताधारी पार्टी नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) 25 सीटों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। जबकि भाजपा 3, कांग्रेस 5, टीमएसी 5 और अन्य क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारों ने 21 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। रिजल्ट आने के बाद प्रदेश में एक बार फिर एनपीपी और भाजपा के गठबंधन सरकार बनने की चर्चा शुरु हो गई है। भाजपा नेतृत्व से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद असम के सीएम हेमंत बिस्वा शर्मा एक्टिव हो गए है। 2018 के विधानसभा चुनावों एपीपी के कोनराड संगमा के नेतृत्व में भाजपा, यूडीपी, पीडीएफ, एचपीपीडीपी और निर्दलीय विधायकों ने मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन 2023 के चुनाव चुनाव प्रचार के दौरान ही भाजपा ने एनपीपी से गठबंधन तोड़ लिया था। भाजपा पूरे प्रदेश में कोनराड संगमा सरकार के भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर चुनावी मैदान में उतरी थी।
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मेघालय में कांग्रेस को इन कारणों से मिली हार
मेघालय के चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने बड़ी संख्या में ईसाइयों को टिकट दिया था। पार्टी ने यहां से मेघालय के कांग्रेस अध्यक्ष और शिलांग लोकसभा सीट से सांसद विंसेंट पाला को सीएम चेहरा बनाया था। पूर्वोत्तर के इन चुनावी राज्यों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीद मेघालय और त्रिपुरा से ही थी। बावजूद इसके पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी केवल एक एक चुनावी रैली करने ही मेघालय पहुंचे थे। 2018 के विधानसभा चुनाव में मेघालय में पार्टी के 21 विधायक चुनकर आए थे। लेकिन प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुंच सकी थी। कांग्रेस को सत्ता से रोकने के लिए एनपीपी के कोनराड संगमा ने बीजेपी, यूडीपी, पीडीएफ, एचपीपीडीपी और एक निर्दलीय के साथ मिलकर सरकार बनाई और वह राज्य के मुख्यमंत्री बने।

2018 के बाद सबसे पहले कांग्रेस ने 4 विधायक गंवाए, जिसमें एक ने इस्तीफा दे दिया जबकि तीन का निधन हो गया। वहीं 2021 में कद्दावर कांग्रेस नेता मुकुल संगमा और 11 अन्य विधायक टीएमसी में शामिल हो गए। इसके बाद पांच विधायकों ने एनपीपी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन दे दिया। फिर दो विधायक बीजेपी में शामिल हो गए। इस चुनाव में कांग्रेस अपने सियासी आधार को दोबारा से हासिल करने के लिए उतरी थी। पार्टी ने लोक लुभाने वादे कर ईसाई बहुल सीटों पर खास फोकस कर रखा था। पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में महिला सशक्तिकरण, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, ड्रग्स और बिजली कटौती मुक्त राज्य बनाने के साथ ही मेघालय को पांच सितारा राज्य में बदलने के संकल्प का जिक्र था। बावजूद इसके कांग्रेस को चुनाव में महज पांच सीट ही हासिल हो सकी।

बीफ, हिदुत्व को साइड में रख भाजपा ने इन मुद्दों पर किया फोकस
मेघालय में पीएम नरेंद्र मोदी ने दो रैलियां की। प्रचार अभियान के दौरान भाजपा का फोकस हिंदुत्व की जगह स्थानीय मुद्दों पर रहा। भाजपा ने ईसाई और गैर हिंदू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। जबकि कांग्रेस ने बड़ी संख्या में ईसाइयों को टिकट दिया। भाजपा की रणनीति विवादित मुद्दों को छोड़कर विकास के एजेंडे को भुनाना था। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए भाजपा नेताओं ने चर्च के पदाधिकारियों के साथ बैठक की और समर्थन तक मांगा। बीफ का विरोध करने वाली भाजपा के लिए मेघालय में स्थिति बिल्कुल उलट नजर आई। प्रचार के दौरान ही मेघालय भाजपा अध्यक्ष अर्नेस्ट मावरी ने बयान दिया था कि वे बीफ खाते हैं और पार्टी को आपत्ति नहीं है। पार्टी चुनाव प्रचार में एनपीपी के पिछले 5 साल में हुए  भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर मैदान में उतरी थी।

अमर उजाला से चर्चा में मेघालय भाजपा नेताओं का कहना है कि,रिजल्ट के बाद हम ऐसी पार्टियों से गठबंधन कर सकते हैं जिनके हाथ भ्रष्टाचार में न डूबे हों। हम किसी भी कीमत में टीएमसी या कांग्रेस के साथ नहीं जा सकते। 2018 के चुनाव के बाद एमडीए सरकार में भाजपा बतौर सहयोगी शामिल थी। लेकिन भाजपा के केवल दो विधायक और एक मंत्री था। मंत्रालय में हमारे पास कोई महत्वपूर्ण विभाग नहीं थे। जिन विभागों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ, वे या तो एनपीपी या उनके गठबंधन सहयोगी यूडीपी के पास थे। हम लोकल लेवल पर गठबंधन छोड़ने या बनाने का फैसला नहीं ले सकते। मेघालय के चुनाव परिणामों की जानकारी पार्टी हाईकमान को दे दी है। अब इस मामले में केंद्रीय नेतृत्व को फैसला लेना है।
 
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कांग्रेस की सियासी जमीन पर टीमएसी ने किया कब्जा
मेघालय की सियासत को बारीकी से समझने वाले पत्रकार सूरज मोहन झा अमर उजाला से चर्चा में कहते है कि, 75 फीसदी ईसाई आबादी वाले मेघालय तीन अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बंटा हुआ है। इनमें खासी, जयंतिया और गारो हिल्स शामिल है। पूरे राज्य में खासी, जयंतिया और गारो जनजातियों का गहरा आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव है। खासी और जयंतिया तो काफी हद तक भाषाई और सांस्कृतिक रूप से समान हैं, लेकिन गारो दोनों से काफी अलग है। प्रदेश की सियासत भी खासी-जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स के बीच बंटी हुई है। एनपीपी, बीजेपी, कांग्रेस और टीएमसी के चुनावी मैदान में उतरने से प्रदेश में चतुष्कोणीय लड़ाई नजर आई। इस बार चुनाव में कोई भी दल किसी के साथ नहीं था। बल्कि सभी अपने अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरे थे। भाजपा की तरफ से पीएम मोदी,अमित शाह, असम के सीएम हेमंत बिस्वा शर्मा समेत स्थानीय नेता प्रचार अभियान में नजर आ रहे थे। नॉर्थ-ईस्ट के इन राज्यों में हर दिन कोई न कोई केंद्रीय मंत्री प्रचार के लिए जरूर पहुंचता था।

सूरज मोहन झा कहते है कि, राज्य में कांग्रेस ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसके कार्यकर्ता हर गांव में है। 2018 की तरह पार्टी इस बार भी दमखम के साथ मैदान में उतरी थी। स्थानीय नेता और कार्यकर्ताओं की शिकायत यह रही कि पूरे चुनाव में कांग्रेस के सीनियर नेता प्रचार में कहीं नजर नहीं आए। इसका खामियाजा चुनाव में देखने को मिला। वहीं दूसरी तरफ मेघालय में कांग्रेस की सियासी जमीन पर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी खड़ी हो गई। टीएमसी ने शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार के साथ महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को लेकर उतरी। टीएमसी ने अपनी जीत हासिल करने के लिए पूर्व सीएम और कभी कांग्रेसी रहे मुकुल संगमा के सियासी प्रभाव को देखते हुए सीएम पद का उम्मीदवार बनाया। मुकुल का प्रभाव क्षेत्र गारो हिल्स में है। इस क्षेत्र से 24 विधानसभा सीटें आती है, जहां ईसाई मतदाता अहम है। टीमएसी ने पहले चुनाव में यहां से करीब 5 सीटें हासिल की है। प्रदेश की सियासत में कोनराड संगमा और उनकी पार्टी एनपीपी का अच्छा सियासी आधार रहा है। कॉनराड की पार्टी को इस चुनावों में कई राजनीतिक चुनौती से जूझना पड़ा है। चुनावों में भाजपा, टीमएसी और कांग्रेस ने उनकी पार्टी को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जमकर घेरा है।

संगमा बनाम संगमा का मुकाबला
मेघालय में टीएमसी नेता मुकुल संगमा (नेता प्रतिपक्ष) और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राज्य के मुख्यमंत्री और एनपीपी के कोनराड संगमा दोनों का सियासी असर गारो हिल्स के क्षेत्र में है। राजघराने से ताल्लुक रखने वाले दोनों नेता गारो समुदाय से आते है। कोनराड संगमा दिवंगत पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पूर्णो संगमा के पुत्र हैं। उनके भाई जेम्स संगमा राज्य सरकार में मंत्री हैं, जबकि उनकी बहन अगाथा संगमा गारो हिल्स से सांसद हैं। वहीं टीमएसी मुकुल संगमा ने अपनी राजनीति में खुद स्थापित किया है, लेकिन कोनराड संगमा अपने पिता की विरासत संभाल रहे हैं।

एक्टिव हुए असम के सीएम हेमंत बिस्वा शर्मा
मेघालय में किसी भी पार्टी को बहुमत मिलते नहीं दिख रहा है। प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा के आसार नजर आ रहे हैं। ऐसे में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा नतीजे आने के बाद एक्टिव हो गए हैं। पूर्वोत्तर में उनकी नजर मेघालय पर है, जहां एनपीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हेमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार की रात गुवाहाटी में मेघालय के मुख्यमंत्री और एनपीपी अध्यक्ष कोनराड संगमा से मुलाकात की थी। पूर्वोत्तर में बीजेपी की अगुवाई वाली नॉर्थ ईस्ट डेवलपमेंट अलायंस के हेमंत बिस्वा सरमा  मुखिया हैं। पूर्वोत्तर के तीनों के राज्यों का जिम्मा उनके कंधों पर है। यही वजह है कि जब हेमंत सरमा को पता चला कि कोनराड संगमा गुवाहाटी के एक होटल में ठहरे हैं तो वह होटल जाकर संगमा से मिले।
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