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मंजिलें और भी हैं: इस पाठशाला में पशुओं से सीखें जीवन के सबक

Wed, 24 Apr 2019 12:32 AM IST
गौरव द्विवेदी संजीव पेडनेकर
संजीव पेडनेकर Published by: गौरव द्विवेदी Updated Wed, 24 Apr 2019 12:32 AM IST
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Manzilein aur bhi hain: Learn from animals in this school lesson of life
संजीव पेडनेकर (फाइल फोटो)

उन दिनों मैं स्कूल में ही था। हमारे स्कूल में एक पशु विशेषज्ञ को पशुओं के बारे में बात करने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने मुझसे एक मगरमच्छ को अपने कंधे पर रखने के लिए कहा। शुरू में मुझे डर लगा, लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे अच्छा लगने लगा। मैं मगरमच्छ के शरीर पर हाथ फेर रहा था और मेरा भय दूर हो चुका था। इस तरह पशुओं से मेरे प्रेम की शुरुआत हुई। इसके बाद मैं स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान अनेक पशु कल्याण एजेंसियों से जुड़ता चला गया और स्वैच्छिक कार्यकर्ता की तरह काम भी करने लगा। मैंने सरीसृप विज्ञान की पढ़ाई की, जिससे मुझे पशुओं के बारे में नई जानकारियां मिलीं। 

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पशु कल्याण से जुड़ी संस्थाओं के साथ काम करते हुए मैं जान पाया कि हादसे का शिकार होने वाले पशुओं को बचाने का काम कितना संवेदनशील है। इसी पृष्ठभूमि के साथ मैंने प्राणी- पेट सैंक्चुरी (पालतु पशुओं का अभयारण्य) की स्थापना की। यह बंगलुरू में कनकपुरा रोड पर द आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। असल में यह कोई चिड़ियाघर या अभयारण्य नहीं है, बल्कि ऐसे पशुओं का घर है, जिन्हें किसी हादसे या संकट से बाहर निकालकर यहां लाया गया है। 
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हमने करीब एक एकड़ जमीन में चालीस पशुओं के साथ 2017 में इसकी शुरुआत की थी। पर्यावरणविद कार्तिक प्रभु सहित हमारी टीम में आज 16 और लोग हैं। हमारी सैंक्चुरी में आज तीन सौ जानवर हैं, जिनमें गधे, कुत्ते, खच्चर, सांप, खरगोश, बत्तख, भेड़ और बकरी आदि हैं। इसकी स्थापना इतनी आसान नहीं थी। पालतू जानवरों की इस सैंक्चुरी की स्थापना के लिए मैंने वित्तीय मदद के लिए अनेक लोगों से संपर्क किया था, मगर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। मैं तब 27 वर्ष का था और किसी को मेरा काम गंभीर नहीं लग रहा था। आखिरकार मेरे परिजनों ने मुझे मेरा सपना पूरा करने के लिए वित्तीय मदद दी। हम सब पशुओं से प्रेम करते हैं, इसके बावजूद लगता है कि हम पशुओं के बारे में बहुत कम जानते हैं। 
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आज जो पीढ़ी बड़ी हो रही है, स्कूल में उस पर पढ़ाई का काफी बोझ लाद दिया जाता है। उन्हें पशुओं के बारे में कम जानकारियां होती हैं। उन्हें पशुओं को देखने-समझने और उनके साथ वक्त गुजारने के भी कम मौके मिलते हैं। अनेक बच्चे भेड़ और बकरी में फर्क नहीं कर पाते। कुछ लोग कह सकते हैं कि इससे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन वास्तव में हमारा अस्तित्व पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर टिका हुआ है। मनुष्य के अस्तित्व के लिए पशुओं की जरूरत है। प्रकृति और पशुओं से संपर्क और उनसे संबंधित जानकारियां बच्चों के विकास में सहायक हो सकती हैं। 


प्रकृति से बड़ा कोई और क्लासरूम नहीं हो सकता। हम ऐसा क्लासरूम विकसित करना चाहते थे, जहां बच्चे पशुओं के बारे में जान सकें, उनके साथ वक्त गुजार सकें। सरकारी स्कूल के बच्चों से यहां कोई शुल्क नहीं लिया जाता। निजी स्कूल के लिए हमने यहां शुल्क रखा हुआ है। यहां आने वाले बच्चों और पर्यटकों को हमारे विशेषज्ञ जानवरों के बारे में जानकारियां देते हैं। यहां आने वाले पर्यटक पशुओं को नहला सकते हैं, उन्हें चारा या भोजन खिला सकते हैं। यहां के हर जानवर की अपनी कहानी है, जिन्हें किसी संकट से बाहर निकालकर यहां लाया गया है। मेरा सपना है कि देश के हर हिस्से में ऐसा अभयारण्य होना चाहिए।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित  

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