रोजगार के लिए मुस्लिमों ने भी छोड़ा कैराना, घर अभी भी वहीं है मौजूद
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रोजगार की खातिर मुस्लिमों ने भी कैराना छोड़ा, मगर अपने मकान नहीं बेचे। ऐसे लोगों की संख्या भी काफी है, जिनके मकान कैराना में हैं मगर उन पर ताले लटके हुए हैं। इस पर लोगों का कहना है कि परिवार की तरक्की खातिर रोजगार और शिक्षा के लिए शहर छोड़ना पड़ जाता है, मगर उसे पलायन का नाम नहीं दिया जा सकता।
मोहल्ला खैल कला निवासी जहूर हसन ने बताया कि उनका रिश्तेदार नफीस मोटा जामा मस्जिद के पास रहता था। लगभग 10 साल पहले नफीस रोजगार के कारण कैराना छोड़कर दिल्ली के कर्दमपुर इलाके में जाकर बस गया। उन्होंने एक साल पहले ही अपना मकान बेचा है।
मोहल्ला खैलकला निवासी आस मौहम्मद ने बताया कि उनका पड़ोसी इमरान 12 साल पहले मकान बंद करके रोजगार के लिए सहारनपुर में जाकर रहने लगा है। उनका मकान आज भी बंद पड़ा है।
मोहल्ला खैलखुर्द निवासी अफसरून ने बताया कि उनके मोहल्ले में ही रहने वाला हनीफ मकान छोड़कर पानीपत में जाकर व्यापार कर रहा है। हनीफ पानीपत में आठ साल पहले चला गया था।
जामा मस्जिद निवासी मौहम्मद साकिब ने बताया कि उनके पड़ोस में रहने वाले डॉ. सालिम एक साल पूर्व बिजनेस के कारण सहारनपुर जाकर रहने लगे है। उनका मकान आज भी बंद पड़ा है।
कैराना के सच से वाकिफ रहे ब्यूरोक्रेट्स
पलायन पर सियासत के दावे कुछ भी हों, लेकिन सूबे की ब्यूरोक्रेसी दो दशक पहले से कैराना के सच से वाकिफ रही है। कुंद हो चुकी कानून व्यवस्था और पसरे खौफ ने अपना घर छोडने पर मजबूर कर दिया। तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने बाकायदा शासन को गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें एक जाति और धर्म विशेष के अफसरों की जिले में तैनाती नहीं करने तक के लिए कह दिया था। खौफ के संदर्भ में ऐसा ही इशारा पूर्व डीएम एसपी सिंह भी कर चुके हैं।
कैराना का लावा भले ही अब फूटा हो, मगर जमीनी हकीकत से अफसर पहले भी अनभिज्ञ नहीं रहे हैं। शामली जब पृथक जिला नहीं था। मुख्यालय से कैराना की दूरी 50 किलोमीटर से ज्यादा रही। यही वजह है कि तहसील होने के बावजूद भी डीएम और एसएसपी के लिए कैराना के लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखना चुनौती बना रहा। हरियाणा से जुड़े कैराना में क्राइम कभी कंट्रोल नहीं हो पाया। थाने में हिस्ट्रीशीट और दर्ज बेगुनाहों की हत्या गवाह है।
नकली नोट, हथियारों की तस्करी से लेकर रंगदारी, हत्या, दुष्कर्म, अवैध कब्जे और अन्य संगीन अपराधों ने यहां के जनजीवन को तबाह कर दिया। पाकिस्तान में बैठे इकबाल काना के रिश्ते कैराना से जुड़ते रहे। खुफिया एंजेंसी भी इस बात को स्वीकार कर चुकी हैं। इकबाल काना ने कैराना में अपराध का ऐसा चक्र शुरू किया कि पाकिस्तानी खुफिया एंजेंसी में उसको ओहदेदार बना दिया गया। कैराना की बर्बादी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बेखौफ अपराधियों को सियासत की पनाह मिलती रही।
कृषि आधारित इस इलाके में अपराध के बाद जरायम के कारिंदे हरियाणा के पानीपत, करनाल, सोनीपत और कुरुक्षेत्र में छिपते रहे हैं। कुख्यात मुकीम काला के गुर्गों की इन्हीं शहरों से हुई गिरफ्तारी बात को पुख्ता करती है। पुलिस प्रशासन ने कैराना की हकीकत पर परदा डालते हुए सियासतदाओं की चाकरी में ही नौकरी गुजार दी। शासन तक कभी कैराना का सच पहुंच नहीं पाया। तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने हिम्मत की तो सूबे में बवाल खड़ा हो गया।
फरवरी 1999 में चौबे ने शासन को एक गोपनीय रिपोर्ट भेजी, जिसमें जिले की कानून व्यवस्था के लिए एक जाति और विशेष धर्म के अफसरों एवं पुलिस कर्मियों की तैनाती नहीं करने के लिए कहा। रिपोर्ट लीक हो गई और हंगामा खड़ा हो गया। विधानसभा में चौबे के खिलाफ अवमानना का प्रस्ताव लाने की बात उठी। सरकार ने घबराकर 26 फरवरी को डीएम चौबे का तबादला कर दिया। इससे पहले वर्ष 1995 में केवल छह माह जिले के डीएम रहे वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह भी कैराना के मसले पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं।
सिंह के मुताबिक कैराना के कई मोहल्लों में दिन में घुसना भी पुलिस के बूते की बात नहीं थी। गुंडागर्दी, अवैध असलहे, पशु तस्करी आदि अपराधों को कैराना में खुला राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। एक पूर्व सांसद के घर से ही कलक्टर रहते तस्करी का 25 किलो सोना और कई कुंतल चरस बरामद की गई थी। ब्यूरोक्रेट्स की मानें तो अपराध पिछले दो दशक से कैराना में पलता रहा है। असुरक्षा और मखौल बन चुके कानून की वजह से पलायन का परिणाम सामने है। यह अलग बात है कि भाजपा सांसद बाबू हुकुम सिंह का उठाया गया मुद्दा सियासी रंग ले रहा है।