WB Ration Scam: मंत्री ज्योतिप्रिया मलिक पर गिरी गाज, राशन घोटाले में जेल जाने के 109 दिन बाद छिने दोनों विभाग
मलिक को केंद्रीय एजेंसी ने 27 अक्तूबर की सुबह कोलकाता के पूर्वी इलाके में साल्ट लेक स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया था। उनके पास 2011 से 2021 तक खाद्य और आपूर्ति विभाग था। हालांकि, मलिक ने अपनी गिरफ्तारी को एक षड़यंत्र बताया था।
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राशन वितरण घोटाले में जेल में बंद पश्चिम बंगाल के मंत्री ज्योतिप्रिया मलिक को राज्य सरकार ने पद से हटा दिया है। ज्योतिप्रिया मलिक राज्य की ममता बनर्जी सरकार में वन मंत्री थे। राज्य सरकार ने यह जिम्मेदारी अब बीरबाहा हंसदा को सौंप दी है। हांसदा वन एवं स्वयं सहायता-स्वरोजगार समूह (स्वतंत्र प्रभार) राज्य मंत्री हैं। वहीं, सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मलिक के पास सार्वजनिक उद्यम और औद्योगिक पुनर्निर्माण विभाग भी था, जो अब पार्थ भौमिक को सौंप दिया गया है। भौमिक सिंचाई एवं जलमार्ग विभाग के प्रभारी मंत्री हैं। अधिकारी के मुताबिक, यह फैसला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सलाह पर लिया गया है।
राजभवन के एक सूत्र ने बताया कि राज्यपाल सी.वी आनंद बोस ने संविधान के अनुच्छेद 166(3) के तहत मलिक को तत्काल प्रभाव से मंत्री के रूप में उनके कर्तव्यों से मुक्त कर दिया।
27 अक्तबूर में हुए थे गिरफ्तार
मलिक को केंद्रीय एजेंसी ने 27 अक्तूबर की सुबह कोलकाता के पूर्वी इलाके में साल्ट लेक स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया था। उनके पास 2011 से 2021 तक खाद्य और आपूर्ति विभाग था। नेता फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। हालांकि, मलिक ने अपनी गिरफ्तारी को एक षड़यंत्र बताया था। उन्होंने कहा, मैं एक बड़ी साजिश का शिकार हूं।
आखिर है क्या राशन घोटाला?
पश्चिम बंगाल में यह घोटाला राशन वितरण में सामने आया था। जांचकर्ताओं और बंगाल भाजपा नेताओं का दावा है कि यह घोटाला एक हजार करोड़ से कम का नहीं है। इनका यह भी दावा है कि यह घोटाला पिछले एक दशक से अधिक समय से चल रहा है और कोविड के वर्षों के दौरान इसमें तेजी आई है। दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा सूचीबद्ध चावल मिलों और आटा मिलों को खरीदे गए गेहूं को पीसने के लिए भेजा जाता है और इसके बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत उचित मूल्य राशन की दुकानों से लाभार्थियों को बांटा जाता है।
सरकारी वितरक मिल मालिकों से गेहूं उठाते हैं और उन्हें राशन की दुकानों में आपूर्ति करते हैं। प्रत्येक वितरक के पास संचालन का एक निश्चित क्षेत्र होता है और वे कितनी दुकानों पर अनाज वितरित कर सकते हैं इसकी संख्या भी पहले से तय होती है। वितरक मिलों से कितनी मात्रा में अनाज खरीद सकते हैं, यह भी निश्चित होता है और उनकी डिलीवरी रसीदों में इसका जिक्र किया जाता है। यहीं से शुरू होती है कथित भ्रष्टाचार की कड़ी। आरोप है कि वितरकों ने मिल मालिकों के साथ मिलकर राशन की दुकानों में वितरण के लिए मिलों से निर्धारित मात्रा से कम मात्रा में राशन उठाया। जांच एजेंसियों का दावा है कि इससे राशन वितरण प्रणाली में 20-40 फीसदी तक का घाटा हुआ। इसके बाद बचे हुए अनाज को खुले बाजारों में बाजार दरों पर बेच दिया गया और इससे होने वाली आमदनी को सिंडिकेट के सदस्यों के बीच कमीशन के रूप में बांटा गया।