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मैमोग्राफी को लेकर पुराना डर कितना सही?: ओवरडायग्नोसिस का जोखिम पांच फीसदी से कम, नए अध्ययन ने बदली तस्वीर
Sun, 27 Sep 2026 06:02 PM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: शिवम गर्ग
Updated Sun, 27 Sep 2026 06:02 PM IST
सार
नए अध्ययन के मुताबिक मैमोग्राफी से होने वाले ओवरडायग्नोसिस का जोखिम 5 फीसदी से कम हो सकता है। पुराने अध्ययनों में यह आंकड़ा 30 से 50 फीसदी तक बताया गया था।
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मैमोग्राफी ओवरडायग्नोसिस
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
स्तन कैंसर की जांच के लिए की जाने वाली मैमोग्राफी को लेकर लंबे समय से एक सवाल बना हुआ है,क्या जांच के दौरान ऐसे कैंसर भी पकड़ में आ जाते हैं, जो महिला को पूरी जिंदगी कोई नुकसान नहीं पहुंचाते? अगर ऐसा होता है तो क्या बेवजह इलाज और चिंता का सामना करना पड़ता है?अब एक नए अध्ययन ने इस सवाल पर पुरानी तस्वीर को चुनौती दी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मैमोग्राफी से होने वाले ऐसे ओवरडायग्नोसिस का खतरा पहले बताए गए 30 से 50% की तुलना में 5% से कम हो सकता है।
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ओवरडायग्नोसिस क्या है?
इसे आसान भाषा में समझें। किसी महिला के शरीर में बहुत छोटा स्तन कैंसर मौजूद है, लेकिन वह इतना धीमा बढ़ता है कि महिला की पूरी जिंदगी में उससे कोई परेशानी नहीं होती। अगर जांच के दौरान वह कैंसर पकड़ में आ जाता है और उसका इलाज शुरू हो जाता है, तो इसे ओवरडायग्नोसिस कहा जाता है।यानी समस्या यह नहीं कि जांच में गलत बीमारी पकड़ ली गई, बल्कि यह कि ऐसी बीमारी पकड़ में आ गई जिसकी वजह से शायद महिला को कभी नुकसान नहीं होता।इसी वजह से कई वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि कहीं स्तन कैंसर की जांच के फायदे के साथ अनावश्यक इलाज का नुकसान तो नहीं जुड़ा है।
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नए अध्ययन में क्या मिला?
डेनमार्क के यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न डेनमार्क और दूसरे संस्थानों के शोधकर्ताओं ने स्तन कैंसर की जांच पर किए गए 8 बड़े पुराने अध्ययनों के आंकड़ों का दोबारा विश्लेषण किया।शोधकर्ताओं का कहना है कि पहले किए गए कुछ आकलनों में एक महत्वपूर्ण बात पूरी तरह ध्यान में नहीं रखी गई थी।जांच शुरू होने के बाद कैंसर के मामलों की संख्या तुरंत बढ़ जाती है।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैमोग्राफी उन कैंसर को भी जल्दी पकड़ लेती है, जो सामान्य स्थिति में कई साल बाद सामने आते।इसलिए शुरुआत में कैंसर के मामले ज्यादा दिखाई देते हैं। लेकिन बाद के वर्षों में इनमें कमी आनी चाहिए, क्योंकि जिन कैंसरों का पता सामान्य तौर पर बाद में चलता, उनका पता पहले ही चल चुका होता है।शोधकर्ताओं के अनुसार अगर अध्ययन पर्याप्त लंबे समय तक नहीं चलता तो शुरुआत में दिखने वाली यह बढ़ोतरी गलत तरीके से ओवरडायग्नोसिस मानी जा सकती है।
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डेनमार्क से मिला महत्वपूर्ण संकेत
शोधकर्ताओं ने डेनमार्क के उन क्षेत्रों के आंकड़ों को भी देखा, जहां अलग-अलग समय पर स्तन कैंसर की नियमित जांच शुरू हुई थी।इससे उन्हें यह देखने का मौका मिला कि जांच शुरू होने के बाद कैंसर के मामलों में क्या बदलाव आया और कई वर्षों बाद तस्वीर कैसी रही।शोधकर्ताओं का कहना है कि डेनमार्क के वास्तविक आंकड़ों और पुराने बड़े अध्ययनों को समय के अंतर को ध्यान में रखकर देखने पर ओवरडायग्नोसिस का स्तर 5% से कम दिखाई देता है।
तो क्या मैमोग्राफी से डरने की जरूरत नहीं?
इस अध्ययन का सीधा मतलब यह नहीं है कि मैमोग्राफी से जुड़ा हर जोखिम खत्म हो गया है।मैमोग्राफी में कभी-कभी ऐसी गांठ या बदलाव भी सामने आ सकते हैं जिनकी आगे जांच करनी पड़ती है। कुछ मामलों में अतिरिक्त जांच या बायोप्सी की जरूरत पड़ सकती है और इससे महिला को चिंता भी हो सकती है।लेकिन इस नए अध्ययन का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मैमोग्राफी से ऐसे कैंसर पकड़ में आने की समस्या, जिन्हें कभी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती, शायद पहले माने गए स्तर से बहुत कम है।
महिलाओं को क्या करना चाहिए?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अध्ययन को मैमोग्राफी कराने या न कराने का व्यक्तिगत फैसला मानकर नहीं देखा जाना चाहिए।किस उम्र में स्तन कैंसर की जांच शुरू करनी है और कितनी बार करानी है, यह महिला की उम्र, परिवार में स्तन कैंसर का इतिहास, व्यक्तिगत जोखिम और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर कर सकता है।अगर किसी महिला को स्तन में गांठ, निप्पल से असामान्य स्राव, स्तन के आकार या त्वचा में बदलाव जैसी समस्या महसूस होती है, तो केवल नियमित स्क्रीनिंग की तारीख का इंतजार नहीं करना चाहिए। डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
अपनी उम्र और जोखिम के लिहाज से डॉक्टर की सलाह जरूरी
इस अध्ययन ने मैमोग्राफी के खिलाफ लंबे समय से चले आ रहे एक प्रमुख तर्क की दोबारा जांच की है। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि पुराने अध्ययनों में समय और स्क्रीनिंग के तरीके को पूरी तरह ध्यान में नहीं रखने से ओवरडायग्नोसिस का खतरा जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई दे सकता था।आम महिला के लिए इसका सबसे सरल अर्थ यह है कि स्तन कैंसर का जल्दी पता लगाने का फायदा महत्वपूर्ण है और मैमोग्राफी से होने वाले ओवरडायग्नोसिस का जोखिम शायद पहले बताए गए आंकड़ों से काफी कम है।हालांकि, स्क्रीनिंग का सही समय और तरीका हर महिला के लिए एक जैसा नहीं होता। इसलिए अपनी उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराना सबसे उचित रास्ता है।