फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Mamata Banerjee get setback with anger of people corruption law and order issues taken toll in west Bengal

Election Analysis: ममता की हार के बाद कैसे बदलेगी इंडिया गठबंधन की स्थिति; जहां नाम कटे, वहां कैसे रहे नतीजे?

Wed, 06 May 2026 04:27 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 06 May 2026 04:27 AM IST
सार

2021 में भी ममता को मोदी-नीत भगवा पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, लेकिन तब वह कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली संस्कृति को बाहरी लोगों से बचाने की अपील के दम पर जीत हासिल करने में सफल रहीं...

विज्ञापन
Mamata Banerjee get setback with anger of people corruption law and order issues taken toll in west Bengal
पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों को स्वीकार नहीं कर पा रहीं ममता बनर्जी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार को पचा पाना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बेहद मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि उन्होंने नतीजों के एक दिन बाद अपने चिरपरिचित अंदाज में इस्तीफा देने तक से इन्कार कर दिया। हठधर्मी रहीं ममता के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी है। आखिरकार, उन्हें पूरा भरोसा था कि एसआईआर के मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को घेरना उन्हें चुनावी लाभ पहुंचाएगा, लेकिन नतीजों ने उन्हें हैरान कर दिया। उनकी तमाम कोशिशें सत्ता विरोधी लहर से उबारने में काम नहीं आईं।

विज्ञापन


चुनावों के दौरान ममता बनर्जी ने इस पर जमकर आवाज उठाई कि बंगाल में एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने आयोग पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट में जनता की याचिकाकर्ता के तौर पर दलीलें पेश करके यह साबित किया कि चाहे कोलकाता की गली हो या दिल्ली का न्यायालय, उन्होंने अंत तक लड़ने की अपनी प्रवृत्ति नहीं खोई थी। लेकिन नतीजे दर्शाते है कि एसआईआर तृणमूल के लिए सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने का हथियार साबित नहीं हुआ।
विज्ञापन


ममता शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर पार्टी सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों तक कई मोर्चों पर घिरी थीं। कानून-व्यवस्था के साथ महिला सुरक्षा का मुद्दा बड़ा था और यही तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के कारण भी बने। 2021 में भी ममता को मोदी-नीत भगवा पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, लेकिन तब वह कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली संस्कृति को बाहरी लोगों से बचाने की अपील के दम पर जीत हासिल करने में सफल रहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस बार उन्होंने युवा साथी योजना (21 से 40 वर्ष की आयु के बेरोजगार दसवीं पास छात्रों के लिए 1,500 रुपये की मासिक सहायता) शुरू की और महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार योजना के लिए आवंटन 1,200 रुपये से बढ़ाकर 1,500 रुपये प्रति माह कर दिया। बंगाल के 81 लाख से अधिक (मतदाताओं के 10% से अधिक) लोगों ने युवा साथी योजना में पंजीकरण कराया, लेकिन मतदान केंद्रों पर पहुंचने पर उन्हें यह योजना शायद तृणमूल को वोट देने के माकूल नहीं लगी।

इंडिया गठबंधन में भी बदलेगी स्थिति
अप्रत्याशित राजनीतिक बदलाव के गवाह बने बंगाल ने उनके लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के सपने को तोड़ दिया। अगर तृणमूल इस बार जीत हासिल करती, तो ममता सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला मुख्यमंत्री का तमगा हासिल कर लेतीं। यही नहीं, विपक्षी गठबंधन इंडिया की मजबूत स्तंभ के तौर पर उनकी भूमिका को भी बल मिलता। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि खुद ममता को अपने गढ़ भवानीपुर में भी हार का सामना करना पड़ा।

40% वोट शेयर ही तृणमूल के लिए राहत
भाजपा ने बंगाल में 207 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को पटखनी दी है, लेकिन तृणमूल सुप्रीमो के लिए यही बात थोड़ा राहत देने वाली है कि पार्टी 40 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल करने में सफल रही है। बहरहाल, इस हार ने 71 वर्षीय जुझारू नेता को फिर उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उन्होंने राजनीति शुरू की थी। अब देखना होगा कि उम्र के इस पड़ाव पर वह सड़क की राजनीति को किस मुकाम तक ले जा सकती हैं।

तथ्य यह भी : जिन 20 सीटों पर कटे सबसे ज्यादा नाम, उनमें 13 सीटें तृणमूल ने जीतीं
बंगाल के नतीजों में एसआईआर की भूमिका क्या रही, इस पर शुरुआती विश्लेषण यही बताता है कि जिन 20 सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाताओं के नाम कटे थे, उनमें 13 तृणमूल के खाते में आई हैं। वहीं, छह सीटों पर भाजपा और एक पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। एक अन्य रुझान से पता चलता है कि जिन 187 सीटों पर 5,000 से अधिक नाम हटाए गए, उनमें से भाजपा 119 पर जीती। इन 187 निर्वाचन क्षेत्रों में से 47 में हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर या बढ़त से अधिक थी। टीएमसी ने इन 187 सीटों में से 65 सीटें जीतीं, जिनमें 18 पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत का अंतर से अधिक रही।



23 में से 9 जिलों में तृणमूल कांग्रेस साफ, भाजपा ने जीतीं सभी 68 सीटें
भाजपा ने पश्चिम बंगाल के 23 जिलों में से 9 जिलों में तृणमूल का पूरी तरह सफाया कर यहां सभी 68 सीटों पर कब्जा जमा लिया। इन नौ जिलों में तृणमूल एक भी सीट नहीं जीत सकी। बंगाल में भाजपा की बढ़त उत्तर बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर दक्षिण बंगाल के कई हिस्सों' तक फैली रही। उत्तर बंगाल के प्रमुख जिलों, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी व अलीपुरद्वार में तृणमूल का खाता नहीं खुला जहां भाजपा ने 54 में से 40 सीटें जीत लीं।

जंगलमहल में भी टीएमसी का पूरी तरह सफाया
पश्चिम बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र के पुरुलिया, बांकुड़ा और झाड़ग्राम इन तीनों जिलों की सभी 25 सीटों पर तृणमूल हार गई है। भगवा पार्टी की ओर कुड़मी-महतो समुदाय के वोटों के झुकाव को इस क्षेत्र में, तृणमूल कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।


औद्योगिक क्षेत्र में नहीं मिला खास समर्थन
पश्चिम बर्दवान जिले में भी तृणमूल का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। भाजपा ने 9 में से 6 सीटें जीतकर इस जिले में अपना दबदबा बना लिया है। तृणमूल के कार्यकर्ता संगठन की कमजोरियों, स्थानीय नेताओं की असंतोषजनक छवि और प्रशासनिक नाराजगी को पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed